जगदीश जोशी
नैनीताल की उत्तर वाहिनी शिप्रा नदी व रामगाढ़ नदी मानसून में भी पानी की कमी से जूझ रही हैं। प्रदेश के गैर हिमनी नदियों में पिछले कुछ सालों से यही हालात बन रहे हैं। पर्यावरण के लिए संवेदनशील व इस क्षेत्र में शोध कर रहे वैज्ञानिक इसको चिॆता का विषय बता रहे हैं। इस कार्य में पिछले तीन दशक से शोधरत प्रो. जीवन सिंह रावत का कहना है कि ऐसी सभी नदियों के पुनर्जनन के लिए जल्द कदम नहीं उठाए गए तो हालात खासे बद्तर होने से कोई नहीं रोक सकता है। प्रो.रावत कुमाऊं विवि के भूगोल विभागाध्यक्ष व नेशनल जियो स्पेशल चेयर प्रोफेसर रहे हैं।
प्रो. रावत ने कोसी का उदाहरण देते हुए बताया कि वर्ष 1992 में गर्मियों में यहां पानी का प्रवाह 790 लीटर प्रति सेकेंड था जबकि इस बार 48 लीटर प्रति सेकेंड रहा है। प्रो. रावत ने इसी माह जागेश्वर धाम की जटागंगा का भी व्यौरा लिया। यहां मानसून के दौर में केवल 19 लीटर / सेकंड पानी उपलब्ध हो रहा है।
प्रो. रावत ने 18 अगस्त को शिप्रा व रामगाढ़ नदी क्षेत्र का दौरा किया है। यहां भी मानसून की पीक अवधि में इन नदियों की बहुत कम जल निकासी क्षमता प्राप्त हुई है। प्रो. रावत के अनुसार रामगढ़ नदी :495 ली प्रति सेकेंड तथा शिप्रा नदी का 1009 प्रति सेकेंड मिला। प्रो. रावत का कहना है कि राज्य की अन्य गैर-ग्लेशियल( हिमानी) बरसाती नदियों की हालत लगभग शिप्रा और रामगढ़ नदियों जैसी ही है।
प्राकृतिक जल स्रोत व ग्रेविटी स्कीम प्रभावितप्रो. जेएस रावत का कहना है कि प्रदेश में प्राकृतिक जल स्रोत नौले तेजी से घट रहे हैं। वहीं ग्रेविटी वाली पानी की योजनाएं भी प्रभावित हो रही हैं। ऐसे में नदियों से लिफ्ट योजनाएं शुरु हो गई हैं। नदियों में पानी घटने पर आखिर भविष्य में लिफ्ट योजनाएं भी बाधित हो सकती हैं। आखिर इसके बाद हमारे पास विकल्प होगा।
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प्रो. रावत के सुझावः प्रो. जेएस रावत कहना है कि गंगा नदी में उत्तराखंड से लेकर पश्चिम बंगाल तक देश की 60 प्रतिशत आबादी निर्भर है। इसके जल में 80 प्रतिशत पानी उत्तराखंड की गैर हिमानी नदियों से जाता है। जबकि 20 प्रतिशत सहयोग हिमनद से निकलने वाली नदियों का रहता है। गैर हिमनद नदियों में पानी का संकट बन रहा है। इसको देखते हुए नदी के संरक्षण के लिए उसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल संचयन के माध्यम से भूजल संवर्धन के लिए बड़े पैमाने पर नदी कायाकल्प यांत्रिक/जैविक उपचार के उपाय जल्द शुरू करने की जरुरत है। अन्यथा गैर हिमानी नदियों के अल्पकालिक धारा में परिवर्तित होने का पूरा खतरा है। प्रो. रावत ने प्रदेश सरकार से राज्य में नदी कायाकल्प का अलग मंत्रालय गठित करने की मांग की है।
प्रदेश में गैर हिमानी नदियांःगढ़वाल: पू.नय्यर, प.नय्यर, प.रामगंगा, मंडल, सोना, पलेन, रिस्पना, सोंग, बिन्दल, आसन, खोह, फीका आदि।कुमाऊं की गैर हिमानी नदियाँ:कोसी, सरोत, कुंजगड, रामगाड़, शिप्रा, राई, गगास, स्वाल, पनार, लोहवती, गन्डक, गरुड गंगा, गोमती, दाबका, बौर, बागजाला, कल्याणी, गौला कालसा, नंधौर आदि