- राजीव लोचन साह
हरेला हमारी संस्कृति से जुड़ा हुआ पर्व है, मगर अब इसे और अधिक गहराई से समझा और व्यापक रूप से मनाया जाना चाहिये। जब हरेले की परम्परा शुरू हुई होगी, तब पारिस्थितिकी और पर्यावरण जैसे भारी-भरकम शब्द मौजूद न होने के बावजूद मनुष्य प्रकृति के साथ अपने रिश्ते को बेहतर ढंग से समझता था। तभी अनाज के दानों को श्रद्धापूर्वक बो कर उगे हरेले के तिनकों को कृतज्ञता के साथ सिर पर धारण करता था और हरीतिमा की समृद्धि के लिये उपयोगी प्रजातियों के पौधे रोपता था। कमजोर हिमालय में प्रकृति तब भी यदा-कदा दुर्वासा बन कर टूटती थी, मगर अविचलित मनुष्य धैर्य से उसके क्रोध का शमन करता था। प्रकृति को उत्तेजित कर विनाश को आमंत्रित करने की मूर्खता उसकी ओर से नहीं होती थी। मगर विज्ञान के विकास के साथ मनुष्य में इतना अहंकार जगा कि वह अनावश्यक रूप से प्रकृति को चुनौती देने लगा। विकास के लिये प्रकृति के साथ छिटपुट नोंक-झोंक तो संगठित कृषि के जन्म के साथ ही शुरू हो गई होगी, मगर तकनीकी दक्षता प्राप्त करने के साथ-साथ मनुष्य का दुस्साहस विवेक की सीमा का अतिक्रमण करने लगा, जिसका परिणाम हम ग्लोबल वार्मिंग तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के रूप में देखते हैं। इसीलिये हरेला जैसे पर्वों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। मगर विडम्बना इतने अजीब ढंग से सामने आती है कि उत्तराखंड में जहाँ हरेला पर्व को सरकार की मान्यता मिल गई है, वहीं नदियों पर बड़े बाँधों के निर्माण, ऑल वैदर रोड और केदारनाथ की तंग घाटी में हैलीकाॅप्टर उड़ाने जैसे कामों से हम प्रकृति के विनाश पर तुले हैं। हर साल चातुर्मास पर हरेले के उत्साह के साथ नहीं, प्राकृतिक आपदाओं के आतंक के साथ जीवन जीते हैं। अभी ही हम हिमाचल प्रदेश के साथ उत्तराखंड के कुछ क्षेत्रों में भयंकर विनाश देख रहे हैं। मगर इसके बावजूद न तो हमारा विकास का सोच बदल रहा है और न ही हम प्रकृति के साथ अपनी आत्मीयता बढ़ा पा रहे हैं।

































