लाल सिंह चौहान
किसी भी देश अथवा प्रदेश के ऐसे क्षेत्र जिनके भौगौलिक क्षेत्रफल का अधिकांश भाग पर्वतीय क्षेत्र के उच्च, मध्यम और निम्न हिमालयन श्रेणी में विभक्त हो तो निश्चित ही उस क्षेत्र में ग्लेशियर, नदियां,नाले बहुतायत में पाए जायेंगे। स्वाभाविक है कि ऐसे भू-भागों की सतही संरचना अत्यधिक तीव्र अथवा मध्यम असमान ढाल वाली ही होंगी। ऐसे भू-भागों पर जब वर्षा जल की बरसात होती है तो इस वर्षा जल की अधिकतम मात्रा अपवाह रनआफ के रूप में बहकर निकल जाती है तथा साथ में ले जाती है उस क्षेत्र की छॉप सॉयल जिसका की पौधों को उगाने में सबसे अधिक महत्व होता है।
प्रायः देखने में आता है कि इसी वर्षा जल के रनआफ के रूप में बहने के कारण भूमि की ऊपरी सतह के साथ—साथ एक फिट की गहराई तक की भूमि बहने तथा रिल, गली, नाले, गधेरे और नदियों के माध्यम से क्षेत्र में Land slide/Land slip की घटनाएं घटित होती हैं जिस कराण मैदानी क्षेत्रों में बाढ़ की विभीषिकाओं की घटनाओं का हमें गवाह बनना पड़ता है। इसका प्रारंभिक प्रभाव यह पड़ता है कि रिज लाइन के दोनों ओर के भू-भाग पर मिट्टी की गहराई कम हो जाती है फलत: वानस्पतिक आच्छादन में प्रायः कमी देखने को मिलती है एवं वर्षा की बूंदों का प्रपात वेग इस जगह पर ही सर्वाधिक होता है क्योंकि रिजलाइन की ऊंचाई सर्वोच्च होती है।
जाहिर है कि वर्षण करने वाले बादलों से दूरी कम होने के कारण रिज लाइन की मिट्टी और वर्षा जल तीव्रता से निचली सतह की तरफ को दौड़ लगाता है जिसके कारण मिट्टी की संरचना में बनी कैपेलरी ट्यूब (छोटे छोटे छिद्र) वर्षा जल में घुले बहुत बारीक मिट्टी के कणों के जमा होने से बन्द हो जाते हैं इससे जल की सतह के नीचे जाने की प्रक्रिया बाधित होती है। अन्तोतगत्वा भूमिगत जल, उपसतही जल की मात्रा में कमी हो जाती है जिसका सीधा असर उस क्षेत्र में नौले,धारे, हैण्ड पम्प और ट्यूबवेल से की जाने वाली पेयजलापूर्ति पर पड़ता है और गर्मियों के पीक सीज़न (अप्रैल से जून) में पेयजलापूर्ति सम्बन्धी दुश्वारियों का समाज को सामना करना पड़ता है।
दूसरी ओर रिज लाइन की नंगी हुई चट्टानों पर सूर्य की सीधे किरणें पड़ने की वजह से वाष्पीकरण की दर बहुत बढ़ जाती है। इससे भी पारिस्थितिकीय तंत्र असन्तुलित हो जाता है। समस्याएं हैं तो समाधान भी चाहिए। इसके लिए ऐसे क्षेत्रों में प्रारम्भिक सर्वेक्षण कर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सम्बन्धित क्षेत्र में चूने और गन्धक की मात्रा कितनी है। चूने और गंधक की मात्रा ज्यादा होने पर ऐसे स्थानों पर स्वस्थानिक नमी संरक्षण के कार्यक्रम उपयुक्त नहीं होते क्योंकि पानी के सम्पर्क में आने पर इनमें क्रिया होती जिससे हानि होने की सम्भावना प्रबल होती है।
30% से अधिक ढालदार स्थानों पर भी नमी संरक्षण के कार्यक्रम प्रभावी नहीं होते। स्वस्थानिक नमी संरक्षण, सम्वर्द्धन, एवं प्रबन्धन के कार्यक्रमों को कृषि भूमि, अकृषि भूमि एवं बसासत के आधार पर सर्वेक्षित, नियोजित एवं सम्पादित ऐसे किया जाना चाहिए जिससे घर का पानी घर में, खेत का पानी खेत में, जंगल का पानी जंगल में और क्षेत्र का पानी क्षेत्र में ही रुक जाए और गाहे-बगाहे हमारी पेयजलापूर्ति, सिंचाई सुविधाओं और औद्योगिक विकास में सहायक बने।
पर्वतीय क्षेत्रों में छोटी-छोटी परियोजना क्षेत्रों को ऊपरी, मध्यम एवं निचले क्रम के जलागमों में विभक्त कर समस्त कार्यवाही की जानी चाहिए। ऊपरी जलागम क्षेत्र की अकृषि भूमि में घासरोपण, कन्टूरफरों, फिल्टर स्ट्रीप,आगरिंग पिट, रिचार्ज पिट, कन्टूर खंत्तियां आदि का चयन स्थल की उपयुक्तता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। मध्यम जलागम की अकृषि भूमि में जहां से आपको लगे कि यहां पर से छोटी छोटी रोलियां,नाले अथवा गधेरे बनने लगे हैं, ठीक उनके मुंह पर रामबांस, केले, बांस, रिगांल, इना, किना, झिटालूं, हिसालु, घिंघारू, किलमोडा़ अथवा नैपियर घास से वानस्पतिक बांध बनाया जाता है। अगर बगल के क्षेत्र में छोटे-छोटे पौण्ड भी निर्मित किए जाते हैं, इससे नीचे गिरी चीड़ की पत्तियों को प्लास्टिक के बोरे में भरकर अथवा गोले की रस्सी के जाल में भरकर वानस्पतिक बांध के नीचे की साईड में एक और बांध का निर्माण किया जाता है जो स्पीड़ ब्रेकर छनित बांध का कार्य करता है। अब इसके नीचे लूज बोल्डर की चैकवाल बनाए जाते हैं। इसके नीचे जी आई तार जाल में मध्यम आकार के बांध बनाए जाते हैं। इससे नीचे सीमेन्ट बांधों का निर्माण किया जाता है।
इन सबके स्थान और संख्या का चयन उपयुक्तता एवं आवश्यकता के आधार पर किया जाता है।
यहां ये माना जाता है कि पानी की जो खेती हमने ऊपरी और मध्यम जलागम में की है उसका इस स्थान जिसपर सीमेंट बांध बनाया गया है, पानी का उत्पादन शुरू हो जायेगा। कृषि भूमि में सिंचाई के लिए यहां से ही जल को चैनेलाइजेशन किया जाता है। अब हम आ गये जलागम के उस क्षेत्र में जहां पर कृषि भूमि के साथ-साथ स्थानीय लोगों के घर मकान और पशुशाला भी बनी होती है।
घरों के आसपास आंगन या किचन गार्डन में जहां पर पक्की जगह हो वहां पर अपनी छत के आकार एवं आवश्यकतानुसार अन्डरग्राउन्ड या ओवर ग्राउंड जैसी पानी इकट्ठा करने की जगह का निर्माण आपके किचन गार्डन की तस्वीर बदल देंगे। रसोई एवं बाथरूम के पानी के लिए सोख्ता पिट जरूर बनाएं। अब आ गये हम खेतों में जिनमें खेतों के ढाल को ठीक करना, टूटे पुस्तों का निर्माण करना, मेड़बन्दी करना, खेतों को गर्मी में गहरी जुताई करना, मिट्टी की दशा सुधारने के लिए कम्पोस्ट का प्रयोग करना, खेतों के किनारे प्लास्टिक के छोटे पौण्ड बना कर वर्षा जल संग्रहण करना, फसलों को रोटेशनल आधार पर उगाना आदि कार्यों से नमी संरक्षण, सम्वर्द्धन एवं प्रबन्धन के कार्यक्रम कार्यान्वयन में आशातीत सफलता प्राप्त करने में जरूर सफलता मिलेगी।

































