गुणानंद जखमोला/अशोक पांडे
वाइब्रेंट विलेज बसाए जा रहे हैं। एम्स एयर एम्बुलेंस का नगाड़ा देश भर में बज रहा है। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो रहा है। इस बजट में भी 4763 करोड़ का भारी भरकम प्रावधान किया है। पिछले वर्ष के मुकाबले 7 प्रतिशत अधिक। आयुष्मान के सहारे 1300 करोड़ रुपये से अधिक के बिलों का भुगतान और दावे किये जा रहे हैं। पूरा तिलिस्म सा है सरकार द्वारा किया जा रहा दावा कि स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार हो रहा है। जबकि हकीकत यह है कि कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को हर्निया जैसे मामूली आपरेशन के लिए भी दिल्ली जाना पड़ता है। यह सरकारों का नंगा सच है कि पहाड़ में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार हो रहा है। यदि ऐसा होता तो गणेश मर्तोलिया की नानी और बहन यूं नहीं दम तोड़ देती। इसलिए कह रहा हूं कि आओ, हम सब मिलकर पहाड़ की बेबसी पर छाती पीटें और दहाड़ मार कर रोएं।
गजब हाल हैं। हिट गाने ‘पंचाचूली देश’ के गायक गणेश मर्तोलिया पर सड़े-गले सिस्टम के कारण दुखों के गहरे बादल बरस रहे हैं। सिस्टम ने गणेश की बहन दिया और नानी कुंती देवी की जान ले ली। न कोई एफआईआर और न कोई सुनवाई। सब दोष किस्मत पर। पहाड़ की यह कैसी बेबसी है।
मुनस्यारी इलाके के धापा गांव में गणेश का ननिहाल है। उसकी नानी 70 वर्षीय कुंती देवी और छोटी बहन 28 वर्षीय दिया गर्मियों की छुट्टी बिताने के लिए गये थे। शनिवार रात को दोनों ने जंगली मशरूम खा लिया; वे जहरीले निकले और दोनों की तबीयत बिगड़ गयी। मुनस्यारी के सरकारी अस्पताल में उन्हें दाखिल किया गया। गणेश का आरोप है कि वहां उस अस्पताल में न तो डाक्टर था और न ही नर्स। सुबह जब हालत नहीं सुधरी तो दोनों को पिथौरागढ़ अस्पताल रेफर कर दिया गया। फिर वहां से हल्द्वानी। तब तक दोनों की हालत और बिगड़ गयी।
जानकारी के मुताबिक गणेश ने हल्द्वानी से एयर एम्बुलेंस की व्यवस्था करने के लिए हाथ-पैर मारे पर मौसम खराबी से यह व्यवस्था भी नहीं हुई। बहन को एंबुलेंस से देहरादून लाया जा रहा था, नानी को टैक्सी से. सितारगंज और हल्द्वानी के बीच बहन ने आखिरी सांस ली। दिया की शादी की तैयारियां हो रही थी और उसकी सांसें एम्बुलेंस में थम गयी। दूसरे दिन सुबह नानी भी चल बसी।
गणेश ने अपनी प्रोफाइल में लिखा है
अभी शेष है बहुत कुछ,
दुख भी,सपने भी
इस भुरभुरी ज़मीन पर
फिर भी हम उगा लेंगे
एक घास भरा मैदान।
पर बताओ, ऐसी सड़ी गली व्यवस्था में कैसे उगेगी घास, कैसे बसेगा पहाड़? आओ, खूब रोएं पहाड़ और वहां रहने वाले लोगों की बेबसी पर।
जानेमाने ब्लॉगर और अद्भुत रचनाकार अशोक पांडे ने इस प्रकरण पर अपनी व्यथा कुछ इस तरह व्यक्त की है।
“गणेश मतलब मेरा प्रिय मित्र और उत्तराखंड की सबसे मीठी आवाज़ों में से एक गणेश मरतोलिया . वही जिसका गाया ‘पंचाचूली देश’ इन दिनों अपार लोकप्रियता हासिल कर रहा है.
गणेश के परिवार का ताल्लुक उस जोहार-मुनस्यारी से है सदियों से जिसकी प्राकृतिक सुन्दरता को “सौ संसार एक मुनस्यार“ जैसी किंवदंतियों में जगह मिली है.
मुनस्यारी इलाके के धापा गाँव में गणेश का ननिहाल है जहाँ पिछले कुछ हफ्तों से उसकी नानी और छोटी बहन गर्मियों के महीने बिताने की नीयत से आए हुए थे. दो-तीन दिन पहले बदक़िस्मती से दोनों ने जो जंगली मशरूम खाए वे जहरीले निकले और दोनों की तबीयत बिगड़ना शुरू हुई.
मुनस्यारी के इकलौते सरकारी अस्पताल में, जहाँ उन्हें ले जाया गया, इलाज की पर्याप्त सुविधाएं नहीं रही होंगी. इसके बावजूद उन्हें दो दिनों तक कामचलाऊ उपचार के सहारे वहीं में रखा गया. जिस रात दोनों अस्पताल के वार्ड में भर्ती थे, गणेश बताता है, वहाँ डाक्टर तो छोड़िए एक नर्स भी न थी जो उन्हें लगाई गई ड्रिप तक को ठीक से देख पाती.
जैसी कि समूचे राज्य के सुदूर पहाड़ी क्षेत्रों की परंपरा बन चुकी है, कल सुबह जब अस्पताल के कर्ताधर्ताओं को यह समझ में आया कि दोनों की हालत बहुत नाज़ुक हो चुकी है तब जाकर उन्हें पिथौरागढ़ रेफर किया गया. फिर पिथौरागढ़ से हल्द्वानी.
तब तक बहुत सारा बेशकीमती समय जाया किया जा चुका था.
कल देर दोपहर हल्द्वानी में रह रहे गणेश ने अपने तमाम साथियों-परिचितों को फ़ोन करना शुरू किया कि किसी भी तरह एयर एंबुलेंस की व्यवस्था करने में उसकी मदद करें. मौसम ख़राब होने के हवाले से सभी ने हाथ खड़े कर दिए.
बहन को एंबुलेंस से लाया जा रहा था, नानी को टैक्सी से. सितारगंज और हल्द्वानी के बीच कहीं बहन ने आख़िरी साँस ली. आज सुबह नानी भी चल बसी.
आज सुबह जब मेरी उससे आखिरी बार बात हुई, गणेश देर रात से सुबह तक अस्पताल और थाने के चक्कर लगा रहा था कि किसी तरह कोई सरकारी अधिकारी इस बात की इजाज़त दे दे कि दोनों के शरीर बगैर पोस्टमार्टम के उसे सौंप दिए जाएँ.
हर भावुक बेटे की तरह उसे अपने साथ रहने वाली अपनी माँ की फ़िक्र है कि उसे एक साथ अपनी माँ और बेटी के चीरे-फाड़े शरीर देखने की यातना न भोगनी पड़े. उसके पिता इस वक़्त जोहार घाटी के अपने सुदूर पैतृक गाँव मरतोली में हैं जहाँ, कोई फ़ोन नहीं चलते. दयालु फ़ौजियों के वायरलेस तंत्र की मदद से उन तक यह दुःखभरी खबर पहुँचाने की कोशिश चल रही है.
मुझे नहीं मालूम गणेश और उसका परिवार जीवन भर “यूँ होता तो क्या होता“ जैसे कितने पछतावों से अभिशप्त रहेगा. मुझे नहीं मालूम इस खबर से किसी भी व्यवस्था में कोई बदलाव आएगा या नहीं क्योंकि यह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है. मुझे यह भी नहीं मालूम कि दोष किसका है – मुनस्यारी और धापा जैसी अनगिनत जगहें हमारे राज्य में छितरी पड़ी हैं जहाँ से हर घंटे कोई न कोई मरणासन्न मरीज़ हायर सेंटर में रेफर किया जा रहा है. मुझे नहीं मालूम अगर गणेश के परिवार में कोई ऊँची रसूख रखने वाला सदस्य होता क्या तब भी हेलीकॉप्टर की व्यवस्था नहीं हो पाती?
मुझे इतना पता है कि गणेश की नानी मुनस्यारी से दिखने वाली पंच चूली की उन चोटियों और इलाके के असंख्य सदानीरा धारों को कभी नहीं देख सकेंगी जिनके अतुलनीय सौन्दर्य और संपन्नता के चलते यह मुहावरा चलता है कि सारी दुनिया एक तरफ़ और अकेला मुनस्यार एक तरफ़ और जिसका लैण्डस्केप ख़ुद गणेश के गीतों का विषय बनता है.
उसकी प्यारी बहन के लिए बनवाया गया दुल्हन का वह जोड़ा देख कर परिवार कितने गहरे ग़म में डूब जाएगा जिसे इस बरस जाड़ों में पहनने की हौस उस युवा लड़की के मन में उजाला भर देती थी.
अपार दुख की इस घड़ी में हम सब तुम्हारे साथ खड़े हैं, प्यारे गणेश!
आख़िरकार हम सब ने हारना है. इकट्ठे हारेंगे।”

































