राजेन्द्र भट्ट
स्वस्तिश्री सर्वोपमा-योग्य नैनीताल-समाचार के संपादक जी, कर्मठ प्रकाशकीय परिवार और देश भर की तीन पीढ़ियों में फैले नै.स. कुटुंब के सभी अपनों को यथायोग्य प्रणाम, शुभाकांक्षा, आशीर्वाद पँहुचे। यहाँ कुशल सब भांति सुहाई। तहां कुशल राखें रघुराई।
राजीव’दा का आदेश है कि अबकी बार नै.स. के हरेले के तिनड़े के साथ आशीर्वचन लिखूँ। नालायक बच्चे का बस्ता भारी। पूरी जिंदगी कोई गिनाने लायक काम नहीं, योगदान नहीं, और यह जिम्मेदारी! तो स्मृतियों का सहारा लेता हूँ, और इनकी ‘टेक’ यानी ‘की वर्ड’ हैं – ‘डर’, आतंक’, ‘खतरा-साजिश कथाएँ’, ‘नफरत’ आदि।
15 अगस्त 1977 को नै.स. जन्मा – हमारे जैसे नव-तरुणों के लिए कितनी आस-उल्लास ले कर। और उसी साल नवंबर में वनों की नीलामी के अंधेर-लालच की आग में नैनीताल का शैले हॉल स्वाहा हो गया। दिल्ली से हताश हो कर, मैं अपने अभाव, भूख, शून्य भविष्य, हताशा-मंडित नव-तारुण्य के साथ अल्मोड़ा पढ़ने आ गया था और एक सीलन-भरी कोठरी में रहता था। भाव-विह्वल किस्म का लेखन ठहरा। तो, अज्ञात प्रेरणा के नाम ‘एक पत्र’ लिखा, जिसमें असुरक्षा थी, व्यवस्था के प्रति क्षोभ था, प्रेम था, उम्मीद थी और क्रांति का परचम था। नै.स. और अल्मोड़ा-नैनीताल के राजीवदा, गिरदा, शेखरदा, शमशेरदा जैसे ‘दा’ लोगों का खूब आशीर्वाद इस ‘किशोर-रचना’ को मिला। तब से जन-पक्षीय राजनीति से, आंदोलनों से मन जुड़ गया।
तब भी उजड्ड शाखा-मृग थे लेकिन उन्हें साधने, डपट देने वाले वाले ऐसे संजीदा शाखा वाले भी थे, जैसे विवाह के दौरान द्वाराचार में पूछते हैं – ‘किं गोत्रस्य, किं शाखिनौ….’ मतलब, वर महाराज का कुटुंब किन खास परम्पराओं का, ज्ञान-अध्ययन की विशिष्ट ‘शाखा’ का अनुगामी है, कि उन्हें कन्या-रत्न के लिए ‘श्रेष्ठ वर’ माना जाए। मतलब, मत-विरोध, संघर्ष – सब कुछ थे, पर विवेक-सदभाव से समझने-समझाने वाले सभी पक्षों में थे। जैसे ऊपर ‘टेक’ बताई – राह चलते ‘आतंक’ नहीं लगता था। यह तो स्वयं-सिद्ध लगता था कि सामने वाला भी तो अपना जैसा ही इंसान है, उसके अपने दुख-सुख हैं, ‘एक्दम ही’, खून का प्यासा, कटखना ‘भिषौण’ थोड़े ही है।
उससे पहले, स्कूल के दिनों, मसें भीगने के काल में ही, ‘इमर्जेंसी’ की याद है। मैं तो अपने लंबे बाल रखने को ही ‘विद्रोह’ और बाबूजी को ( उन्हें कटाने की मुहिम के चलते) ‘इमर्जेंसी’ मानता था। फिर दिल्ली आया तो लोग फुसफुसा कर बात करते थे। लेकिन यह ऊपर के सत्ता वालों से नीचे वालों का ‘वर्टिकल’ डर था। यह अपने जैसे लोगों के बीच – समानान्तर डर नहीं था। सभी डरे हुए बंधु थे। अपने घर-परिवार के लोगों से, पड़ोसी से, सहयात्री से – किसी धर्म-जाति के हों – डर-नफरत नहीं थी।
‘फास्ट फॉरवर्ड’ करते हैं। 2013 में, ‘अच्छे दिनों’ की बिसात बिछ रही थी। मेरे एक भोले, आदर्शवादी ‘विरोधी मित्र’ (तब यह संभव था) ने मुझे ताना मारा कि बैठे-बैठे संशय करने की बजाय कुछ योगदान करो, कष्ट करो और (दिल्ली में) रामलीला मैदान जा कर देखो। अपनी ईमानदार पक्षधरता साबित करने के लिए छुट्टी के दिन रामलीला मैदान पंहुच गया। वहीं से दोस्त को बताया, “मेरी संजीदगी प्रमाणित हुई।…. बट नॉट इंप्रेस्ड। ये धूर्त हैं, बौने कद के हैं।”
लेकिन, तब भी बिलकुल डर नहीं लगा – अपने अजाने भाव-विह्वल सहयात्रियों सेय इस बात से कि मँझोले दर्जे का सरकारी अफसर भी हूँ, और विरोधी दलों के आयोजन में जा रहा हूँ। मतलब, कभी ख्याल ही नहीं आया कि अपने साथी, पड़ोसी, रिश्तेदार मुझसे नफरत कर सकते हैं, दुश्मनी निभा सकते हैं।
पर उसके बाद तो ‘अच्छे दिनों’ में डर ही डर, नफरत ही नफरत का सैलाब फैल गया। सरकारी नौकरी में रोज के ‘मौखिक-लिखित’ हुक्मनामों का डरय अपने ही घर-परिवार-रिश्तेदारी में ‘नफरत-मूढ़ता-गर्व-कथाओं’ से प्रेरितों के डर, संशय और कटुताएँ – लगने लगा कि अब तक जो भावात्मक सहारा देते थे या फिर उदासीन भी थे, वे सभी जाति, धर्म, नई कथाएँ और सनसनियाँ लेकर – सोशल मीडिया के रथ पर गंडासे-बल्लम लिए खड़े हैं। समाज तो क्या, घर-कुटुंब-पड़ोस में व्हाट्सएप बमबारियों के बीच अबोले, दुश्मनियां होने लगीं। अखबार डराने लगे – राह चलते मार-पीट, हत्या, धमकी, प्रार्थना के शब्दों में उन्माद – जाने क्या-क्या। हम युगांडा, इथोपिया और ‘बनाना रिपब्लिक्स’ की तानाशाहियों, उन्मादों, अराजकताओं, आम जनों पर बर्बताओं के बारे में सुनते थे, हम ‘1984’ उपन्यास के भयावह अकेलेपन, हताशा और ‘बिग ब्रदर’ की सर्वव्यापी कुदृष्टि के बारे में पढ़ते थे – पर हमने सोचा भी नहीं था कि अपने – गांधी-नेहरू के देश में जिसके नेताओं ने प्रचंड लोकप्रियता के बावजूद तानाशाह बनने के ‘शॉर्ट कट’ की बजाय लोकतंत्र को पुख्ता किया – उस देश में ऐसा थोड़े ही होगा, अपना परिपक्व, उदार समाज इसे स्वीकार थोड़े ही करेगा।
पर हो गया। सत्ता के साथ, लोक-समाज भी बदल गया। लोकतान्त्रिक, विवेकपूर्ण, मानवीय मूल्यों की नींव कच्ची निकली।
बहुत ‘देसी’ बात हो गई, बंधुओ। अब पहाड़ की तरफ रुख करें।
बचपन से ही अपने उत्तराखंड के बारे में यह पक्की धारणा थी कि ‘देसी बुलाना’ बेशक नहीं आता हो, चाल-चतुर न हों, गरीब होंय पर पहाड़ के लोगों में विद्या के प्रति अनुराग, सिधाई और उदारता स्वाभाविक होते हैं। जरा-सा रास्ता पूछने वाले, खास कर किसी ‘देसी’ को हम सड़क तक छोड़ देने वाले ठैरे। लखनऊ-इलाहाबाद में पहाड़ियों ने ही ज्ञान के परचम उठा रखे ठैरे। पंत-इलाचंद, डॉ, हेम जोशी, पीतांबरदत्त बड़थ्वाल, शैलेश मटियानी, शेखर जोशी, चन्द्रसिंह गढ़वाली, भक्तदर्शन, पंडित सुंदरलाल, बद्रीदत्त जोशी, गोविंद बल्लभ पंत, हेमवतीनन्दन बहुगुणा, मोहन उप्रेती, बी एम साह, डॉ. डी. डी. पंत, डॉ. वल्दिया जैसे सैकड़ों नाम। इतना-सा साधनहीन गरीब पहाड़ और हर क्षेत्र में ऐसे दिग्गज- और सभी पर सरस्वती की कृपा! भला-सा लगता था कि हम पहाड़ी स्वभाव से उदार, विद्या-प्रेमी, मेहनती और सौम्य होते हैं।
हमारे किसी राष्ट्रीय स्तर के कद्दावर नेता को ‘पहाड़ी भुस्स’ होना अपने कद और परिवार से छोटा लगा और उन्होंने बता दिया, कि हमको ‘ऐसा-वैसा ना समझो’, हम तो पेशवा वाले ‘चितपावन’ हैं – तो भी हमें अच्छा ही लगा, गर्व हुआ। बुरा लगना चाहिए था, फालतू का गर्व था – क्योंकि अगर अपने पहाड़ी नेता इतने बड़े चितपावन नहीं होते, उनका कद यूपी बराबर नहीं, पहाड़ बराबर होता, तो क्या पता, हम आजादी के बाद ही, हाथ पकड़ के सहारा देने लायक केंद्र-शासित राज्य या एजेंसी हो जाते। क्या पता, हम जंगलियों को जंगली होने का कुछ आरक्षण-टाइप मिल जाता, और हमारी कुछ पीढ़ियाँ ‘होटल वाली’ न रहकर, इज्जतदार नौकरियाँ पा जातीं।
खैर, ये विषयांतर हो गया। रात गई, बात गई। बात पहाड़ियों की सौम्यता, उदारता की हो रही थी जो पढ़ा-लिखा होने पर और मँजती थी। अल्मोड़ा में अपना एक साथी था- छैला, सजा-धजा। लड़कियों में भी ‘पॉपुलर’ टाइप। तबकी सीधी-सरल किल्लोल में उसका (पहाड़ी) मुसलमान होना किसी नथुने फुलाने वाली कुरूप साजिश का हिस्सा नहीं लगता था। मुझे जो मजेदार बात याद है कि वह तब बढ़िया ‘इस्टाइल’ के दस्तखत बनाने की प्रैक्टिस में रमा रहता था। उसने जो मुझसे दिक्कत शेयर की, वह थी —-अंसारी लिखूँ, या ……तिवारी। उस लड़के को, जो पहाड़ी पहले था, अपने दोनों तरह के पुरखों से अनुराग था ( गर्व नहीं, तब बात-बात पर ‘गर्व से’ नहीं कहने लगते थे।) ऐसी ही अपनी एक पहाड़ी मुसलमान बहन बनी। उसने मुझ ठन-ठन गोपाल के लिए एक स्वेटर बुनी। तब ‘विमल’ का एक सुंदर विज्ञापन आता था -‘स्त्रियाँ अपनी मनोभावनाएँ कई रूपों में व्यक्त करती हैं, ‘विमल’ उनमें एक है।‘ स्वेटर बुनना भी ‘उनमें एक’ था। मैंने उसे कुछ नहीं दिया, देने को कुछ था भी नहीं – बस, स्वेटर ‘डाँठ’ ली।
पहाड़ में इतनी सारी ‘मजार’ होती हैं, या अपना मासूम हीरो ‘तिवारी-अंसारी’ कोई ‘जिहाद’ करेगा – अपनी शब्दावली, स्मृति में ऐसा था ही नहीं।
मेरी जात बामण की जरूर थी पर खिमदा, जैतदा जब काम पर आते तो मुझे तो वे भी अपने रंदे-आरी के साथ अलौकिक लगते। ईजा उन्हें चाय देती तो ‘लियो खिमराम’ कहती, खिमदा के चाय पीने के बाद, मेरे दुनियादारी में मूर्ख, तरक्कीपसंद पिता -उनकी ‘खखोलने’ की मुद्रा को ताड़ कर डपटते -‘रख गिलास वहीं पर।‘ बीच-बीच में खिमदा, काम छोड़ कर, पिता को ताश की बाजी में ‘कंसल्टेंसी’ भी देते रहते और हम पिता की सिधाई पर हँसते-किलसते।
तो ऐसा था अपना पहाड़। भोला, पढ़ा-लिखा, सुमित्रानंदन-सा कोमल-कोमल – चन्द्रसिंह-सा दृढ़प्रतिज्ञ। देश के बाकी हिस्सों में जब हम दहेज, सांप्रदायिकता, जातीय दंगे वगैरह के बारे में सुनते तो लगता, हम पहाड़ी सही मायने में उदार थे । किताबी लोग, एकदम भारत के लोकतन्त्र के सपने में फिट आने वाले।
तो जब अपना राज्य- जैसे भी मिला तो थोड़ा आस जागी। ऐसे विद्वानों, बड़े कद के नेताओं का, शिक्षित-उदार लोगों का पहाड़ी राज्य तो कहाँ पंहुच जाएगा! इनमें से कोई तो भोले पहाड़ियों वाले हिमाचल प्रदेश सा ‘विजनरी’ विद्वान, वैज्ञानिक मुख्यमंत्री – डॉ. परमार होगा जो पहाड़ी संसाधनों के साथ ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को जोड़कर अनूठा ‘हिल स्टेट’ बना देगा!
पर अहा रे! हमें तो ज्यादातर लघुप्राण ही मिले, जो एक-दो महाप्राण लगते थे, उनके भाग जब उत्तराखंड से जुड़े तो वे उनका विकास-पुरुष वाला नहीं, बल्कि प्रणय-परिणय या लूट-खसोट के दलदल में डूबने का काल था। ‘हिल-स्टेट’ का सपना मर चुका था, पूरी पैन-पहाड़ी पट्टी में। जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल तक। हम सबसे कम पहाड़ी राज्य रहे। लूट-खसोट के चरागाह बन गए।
थोड़ा भरोसा बचा था। हम उदार, शिक्षित, शांतिप्रिय, सौम्य जन हैं। पर पिछले दस साल से, हम उत्तरोत्तर जितने अपढ़, संकीर्ण, नफरती किस्म के धार्मिक हो रहे हैं, उससे सिर शर्म से झुक जाता है। साँप जैसे अंधेरी बांबियाँ ढूँढता रहता है, हम दुर्गम पहाड़ों में वहाँ मजार ढूंढ रहे हैं, जहां वीआइपियों की अवैध सैरगाह बन चुकी हैं। जहां डग्गामार टैंपोओं की तरह हैलीकॉप्टर गिर रहे हैं, रास्ते-गाँव-कस्बे धंस रहे हैं। हम पढे-लिखे, विवेकवान पहाड़ियों के वंशज – जनसंख्या के धार्मिक अनुपात बिगड़ने के मूढ़, घनघोर आंकड़ों से लोगों को कंपा रहे हैंय और असली बाशिंदे पलायन कर रहे हैं, या अवैध खरीदारों के आगे पहाड़ की भूमि, जल, जन, खन, वन संपदा सुलभ बनाने में लगे है। क्या तो साहित्यिक गदगदाया दृश्य है। अहा रे! एकदम ‘परदे की इज्जत परदेसी के हाथ बिकानी थी’ वाला समा बंधा है।
तो जिस कदर नफरती नरेटिव गढ़ने वाला, अपढ़, उजड्ड बातें करने वाला, दलितों, वंचितों, असहायों, अकेलों को मारने वाला आज उत्तराखंड अग्रणी राज्य हो गया है, उसपर शर्म आती है। शर्म आती है, दारू, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, चोरी-चकारी, चाटुकारिता के बेहया मद में डूबे छुटभैयों और उनके पोषक बड़भैयों की जुबान सुन कर, करम देख कर। पहाड़! अब दिल्ली में बैठकर मैं तुझे प्रेम-आदर की ‘नराई’ से नहीं, ‘उदेख’, ‘शरम’ के साथ-ही देख पा रहा हूँ। हे शुभ्र हिमवान, हे कल-कल नदी-धारो, हे ग्वेल देवता, तुम्हारी निर्मल भूमि का अगर यह अमृतकाल है, तो घृणा-अज्ञान का हलाहल-काल क्या होगा!
थोड़ा फिटकार अपने जैसों को भी लगाए बिना बात पूरी नहीं होगी। हम जो, दशकों पहले, हिमालय की शुभ्रता मन में लिए, मजबूरी-समझौते में ‘देस’ आ गए तो फिर धीरे-धीरे पहाड़ की सुध लेना भूल गए। नै.स. जिसका प्रतीक था, वह पहाड़, हमारे वहाँ टिके दिदी-दाज्यू, ईमानदार विरोध की अलख जगाए रहे। हमारे दाज्यू लोग बुढ़ापे में भी बेहया गुंडों की धक्का-मुक्की और अकेलापन झेलते रहे, और मेरे जैसे कई ‘हम’? हम, अपने-अपने जीवन के भाभर में, दुख-नराई के क्षणों में, पहाड़ी चिड़िया की तरह, बस ‘जुंहो’ कह पाए, और सुविधाओं-व्यस्तताओं की ‘भोल जाला’ सुनकर चुप हो गए। अपने सात्विक आवेश की पहाड़ी चिड़िया मरी नहीं तो मृतप्राय तो हो ही गई। हे पहाड़! हे इष्ट देवता! लज्जित हैं हम।
पर यह फिटकार-धिक्कार का पर्व तो नहीं है। कितना भी दुख हो जीवन में, मंगल की आस में हम जीते हैं। तो सब ददा-दिदी, भुला-भुली सिर पर रखते हैं हरेले के तिनड़े। हमें किसी राजनैतिक चिलम-उठाऊ से थोड़ी सीखना है कि यह ‘प्रदेश पर्व’, पर्यावरण पर्व है। अरे, ये छाबड़ी में हरेला बोना, सींचना, काटना, द्वार पर लगाना, अशीषना तो हमारे प्रकृति के साथ, परिवार-समाज के साथ सीधे-सरल पहाड़ी जीवन का ‘यावतगंगाकुरुक्षेत्रः’ का एक-सार हिस्सा है। हमारे ‘यावतरामकथालोके’ के राम तो अपने गाँव की रामलीला के सीधे-सरल राम हैं,वही ‘रघुराई’ जिनसे कुशल की कामना इस लेख के शुरू में की गई है। ये ऐसे वाला मद-मत्सर-युक्त चीत्कार थोड़ी है, कि ‘श्री’ साँप के सीत्कार सा ‘सी….’ लगे। और हाँ, हम पहाड़ी सीधे सही, पर हमारे त्यार, हमारे निखालिश पहाड़ी संस्कार, हमारा धर्म। हाथ में अविश्वास और हिंसा का गंडासा लिए सबको मारने और खुद मर जाने को हवा-हवाई देश-जाति के लिए बलिदान मानने वाला ‘बौल्याट’ जो थोड़ी सिखाने वाला ठैरा बल। हम हिमवान-संतान, गौरा के बंधु आत्महंता, मृत्युकामी नहीं, जीवनकामी हैं। हम तो ‘जांठी टेक-टेक कर’ भी निवृत्त हो सकने में समर्थ हो कर जीते रहने की कामना करने वाले ठैरे -अपने लिए भी, सबके लिए भी।
तो आज हम सब – हम सबों को आशीर्वाद दें। पाँव से अशीषना शुरू करते हुए, मंगल-कवच की तरह रक्षा करने वाले हरेले को सिर पर धारण करें। जी रहें। जाग रहें। अपने-अपने गांव-धारे-धुर-धार- नौल- ताल- -गाई- भैंसी- सार-पतार और हवा-पानी-बयार की सार-संभाल के लिए सब ‘पधान’ बनें। हमेशा – लाग हर्याव, लाग चैत, लाग बग्याव, लाग दसें – जी रयों, जागि रयों। दूब जस पगुर ज्यों, पाती जस फूली ज्यों।…
और जो उत्तराखंड बड़ौना लिजी हमार पुरखोंल जांठी-गोली खाईं, ऊ पहाड़ी पछाण वाल उत्तराखंड हम, हमार नान-तिन बणें सकें। तैतीस कोटि दैण है जें, ग्वेल ज्यू, नौ लाख कत्यूर दैण है जें,…. हम ऊ दिन ऊ मास भेटि सकों… भेटनें रै जों।
और हम सबका प्रेरणा-पीठ ‘नैनीताल समाचार’ भी जी रहे, हमारा पथ आलोकित करता रहे। जीवे लाख बरीस- जीवेगा, हो जीवेगा।
































