गणेश मर्तोलिया
मैं आज तक हिमालय को सुकीली सुंदर कहते आया था, लेकिन अंदर से वह कितना टूटा, दु:खी और बेबस है वह अब महसूस कर रहा हूँ जब मैं टूट चुका हूँ, बेबस हो चुका हूँ, बेसहारा हो चुका हूँ..
मेरे आँखो के सामने जो हर दिन नास्टैल्जिया में सफेद पंचचूली तैरता था, उन तैरते सफेद बर्फ की चादर को अपने गीत में उतारता था मुझे वह बिल्कुल काला नजर आ रहा है, गोरी नदी से लाल खून बहते हुई नजर आ रही है.. डफ़िया मुन्याल, न्योली वन पक्षी की रोने की आवाज़ सुन रहा हूँ..
मेरी भूली दिया और मयाली नानी की मृत्यु के साथ ही हिमाल को सुंदर बताने वाली मेरी आवाज की भी मृत्यु हो चुकी है, यह आवाज अब कभी न्ही सुनायी देगी, जब तक कि टूटे—बिखरे, लाचार हिमाल की बात को कोई धरती के निर्दयी, निर्मम कर्ता-धर्ता सुन ना ले …यह संभव भी नहीं है कि उसकी आवाज सुन ली जाय और यह संभव भी नहीं कि अब मेरी आवाज कोई सुन पाये..
24 घंटे तक मेरी भूली और नानी उस इंसानी मौत के लिए बनी बिल्डिंग में तड़पती रही और अगले 12 घंटे में मेरी भूली नानी ने साँसे छोड़ दी..
मैं और मेरा परिवार नहीं चाहते की इस क्षति का आरोप उस मौत के लिए बनाई गई बिल्डिंग में कार्यरत डॉक्टर्स, नर्स और कार्यकर्ताओं पर पड़े.. उनके पास जिस तरह के भी संसाधन, सोच, समझ और अनुभव था उनका उन्होंने इनका इस्तेमाल किया, भले वह दोनों की जान बचाने के लिए पर्याप्त नहीं थे ..
मुनस्यारी में स्थित उस सरकारी हास्पिटल को मौत का बंगला इसलिए कह रहा हूँ इसलिए की ऐसा किस तरह का वह हॉस्पिटल है जहाँ पर रात में मरीजों के साथ उनकी देखरेख के लिए एक चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी को तैनात किया जाता है, मालूम चला कि उसका काम यह है कि मरीज और तीर्मदराज के छटपटाहट के बाद ही वह रात को जाकर नर्स और डॉक्टर के दरवाजे को खटखटाता है …
मेरा आग्रह है की उस मौत के बंगले के बाहर एक नोटिस चिपका दे की “रात्रि में स्वास्थ सेवा उपलब्ध नहीं है, कृपया मरीज अपने स्वास्थ और जीवन की जिम्मेदारी स्वयं ले।” जिससे की उस रात मरीज अपने जीवित रहने की बहूत बड़ी गलफ़हमी में ना पड़े ..
इस घटना से मैं जुड़ा हुआ हूँ तो इस तरह के हालात से आप लोग जान पा रहे है, वहाँ के ऐसे न जाने कितने तमाम बाशिंदे होंगे जिन्होंने भरोसे के लिए एक रात उस मौत के बिल्डिंग में बितायी होंगी और अगली रात उन्हें जीवन में नसीब नहीं हुआ होगा और आगे भी यह जारी रहेगा..
खैर मैं वहाँ तैनात डॉक्टर्स और अन्य कर्मचारियों पर किसी भी तरह के लापरवाही के लिए उन्हें दंडित करने की मांग नहीं कर रहा हूँ, मैं फिर उस बात को दोहरा रहा हूँ कि जितने संसाधन, जितनी समझ, जितना अनुभव और जितना स्टाफ़ वहाँ मौजूद होगा उन्होंने अपनी कोशिशें ज़रूर की होंगी ..
बस शासन-प्रशासन एक छोटा सा काम कर दे कि ऐसे दुर्गम क्षेत्रों में रात के अनुपलब्धता के लिए एक नोटिस बोर्ड जरूर चिपका दे, क्योंकि मेरी बहन जो 29 साल की थी अभी उसने आधे से ज़्यादा उम्र बितानी थी और मेरी नानी जिसने मुझे अभी और दुआ देनी थी उन्हें रात के वह 12 घंटे की क़ीमत अपनी ज़िंदगी से चुकानी पड़ गई..
शासन वाक़यी कितना लाचार है, ग़रीब है, असहाय है कि उसके पास रात की तैनाती के लिए एक नर्स तक रखने के लिए धन नहीं है..
मुझे माफ़ करना भुली दिया और नानी मैंने उस अस्पताल के भरोसे पर तुम्हें एक आसान सी मौत दिला दी, भुली तुम तो जानती हो ना कि मैं कितना ज़िद्दी हूँ लेकिन समय रहते तुम्हें वहाँ से निकालने की ज़िद मैं उनसे नहीं कर पाया..
भुली मैं तुम्हारे बेहतर भविष्य के लिए तुम्हें इस छोटी से सफ़र में प्यार देने से ज़्यादा डाँट पटक करते रहा, तुमसे कितना प्रेम था उसे जता भी नहीं पाया, उसकी कसक में ताउम्र मेरा प्राण गलते रहेगा, दुखते रहेगा, मुझे माफ कर देना मेरी भुली..
मैं इस दर्द को शायद धीरे—धीरे भुला लूँगा, लेकिन भुली तुम जहाँ भी हो एक काम कर देना माँ और पिताजी तुम्हारी याद में जिस तरह परहोश है उन्हें ताक़त दे देना ..
नानी तुम तो बिल्कुल एक नटखट बच्चे की तरह थी..तुम्हें चटक हरे रंग की साड़ी पसंद थी, तुम पुराने किस्से कहानी को मेरे पास आकर सुनाती थी, तुम अपने आधे से ज़्यादा टूट चुके दाँतो से बात—बात पर ठहाके लगाते हुए दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री दिखती थी.. तुम्हारी खुरदरी हथेलियों को अभी भी मैं अपने गालों में महसूस कर रहा हूँ नानी..
अब इससे ज़्यादा आगे तुम दोनों को याद नहीं कर पाऊँगा भुली दिया और नानी..और याद करूँगा तो टूट जाऊँगा ..
तुम जहाँ भी रहो ख़ुश रहना, भुली दिया इस छोटे से जीवन की तुम्हारी सारी अधूरी ख्वाहिशें अगले जीवन में पूरी हों मेरी दुआऐं हैं..
अब क्या लिखूँ यार !!!

































