प्रयाग पाण्डे
हिंदी पत्रकारिता आज 199 वर्ष की यादगार यात्रा तय कर चुकी है। आज से 199 वर्ष पूर्व 30 मई, 1826 को श्री जुगल किशोर सुकुल जी ने गैर हिंदी भाषी प्रान्त बंगाल से ‘उदन्त मार्तण्ड’ नाम से हिंदी साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन शुरू किया था। श्री जुगल किशोर सुकुल जी हिंदी पत्रकारिता के जनक थे।
श्री जुगल किशोर सुकुल जी का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर में हुआ था। वे आजीविका की तलाश में कलकत्ता चले गए थे। उन्होंने 16 फरवरी, 1826 को सरकार से अखबार निकालने का लाइसेंस प्राप्त कर 30 मई, 1826 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ नाम से हिंदी साप्ताहिक का प्रकाशन प्रारंभ कर दिया था। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के मुद्रक और मैनेजर श्री मन्नू ठाकुर थे। ‘उदन्त’ का अर्थ- समाचार, वृतांत या रिपोर्ट होता है। जबकि ‘मार्तण्ड’ का अर्थ होता है- सूर्य। इस दृष्टि से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का अर्थ हुआ- ‘समाचार सूर्य’ या ‘समाचार का उदय।’
‘उदन्त मार्तण्ड’ के कुल 79 अंक प्रकाशित हुए। आर्थिक संकट के कारण श्री जुगल किशोर जी को दिसंबर, 1827 को ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बंद करना पड़ा। श्री जुगल किशोर जी ने ‘उदन्त मार्तण्ड’ के अंतिम अंक में लिखा था:-
“आज दिवस लौउग चुक्यो मार्तण्ड उदन्त।
अस्ताचल को जात है दिन कर दिन अब अंत।”
‘उदन्त मार्तण्ड’ बेशक भारत में हिंदी भाषा का पहला समाचार – पत्र था लेकिन इससे पहले भारतीय भाषाओं में अखबार प्रकाशित होने लगे थे। भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता के जनक थे – लाला राममोहन राय जी। वे 4 दिसंबर, 1821 को बंगला साप्ताहिक ‘संवाद कौमुद’ का संपादन एवं प्रकाशन प्रारंभ कर चुके थे। लाला राममोहन राय जी ने 12 अप्रैल, 1822 को ‘मिरातुल’ नामक फ़ारसी भाषा का एक और अखबार का प्रकाशन/ संपादन शुरू कर दिया था। 1823 में मुंशी सदा सुखलाल जी के संपादन में ‘ जामे जहाँनुमा’ नाम से उर्दू भाषा का पहला पत्र निकल चुका था। श्री हरिहर दत्त जी ‘जामे जहाँनुमा’ के प्रकाशक थे।
‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशित होने से 46 वर्ष पूर्व भारत में आधुनिक पत्रकारिता की शुरुआत हो चुकी थी। जनवरी, 1780 में एक अंग्रेज नागरिक जेम्स ऑगस्टन हिकी ने कलकत्ता से ‘बंगाल गजट एंड कलकत्ता जरनल एडवाइजर’ नाम से अंग्रेजी भाषा का अखबार निकालना प्रारंभ कर दिया था। यह अखबार ‘बंगाल गजट’ या ‘हिकी गजट’ के नाम से ख्यात हुआ। इस दृष्टि से जेम्स ऑगस्टन हिकी को भारत में आधुनिक पत्रकारिता का जनक कहा जाता है। जेम्स ऑगस्टन हिकी ने ‘बंगाल गजट’ के द्वारा भारत की भावी पत्रकारिता के न्यूनतम आदर्श तय कर दिए थे। हिकी ने अत्यंत अल्पावधि में तटस्थ एवं निर्भीक पत्रकारिता की मिसाल पेश की। वे ब्रिटिश सरकार की आलोचनाएं एवं निंदा करने से नहीं चूके। हालाँकि उन्हें इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। ‘बंगाल गजट’ पर सरकारी छापे पड़े। जुर्माने हुए। अंग्रेज सरकार ने ‘बंगाल गजट’ का प्रकाशन बंद करा कर हिकी को जेल में बंद कर दिया। आखिरकार उन्हें भारत छोड़ने के आदेश दे दिए गए। समुद्री यात्रा के दौरान जहाज में ही उनकी मृत्यु हो गई। जेम्स ऑगस्टन हिकी ने अपनी मृत्यु से पहले कहा था- “अपने मन और आत्मा की स्वतंत्रता के लिए अपने शरीर को बंधन में डालने में मुझे आनंद मिलता है।”
यह निर्विवाद सत्य है कि पत्रकारिता और समाज का सदैव घनिष्ट संबंध रहा है। अतीतकाल में भारतीय पत्रकारिता ने समाज को सही राह दिखाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान पत्रकारों ने कलम को तलवार से कहीं अधिक ताकतवर बना कर अंग्रजी शासन की नींव हिला कर रख दी थी। कलम की इस शक्ति को देखकर ही अकबर इलाहाबादी ने लिखा होगा:-
” खींचो न कमानों को न तलवार निकालो।
जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।”
भारत की आजादी के आंदोलन में स्वाधीनता संग्राम सेनानियों ने पत्रकारिता को ढाल के रूप में इस्तेमाल किया। 1907 में ‘ जू उन करनींन’ नाम के एक अखबार के लिए संपादक की खोज में प्रकाशित विज्ञापन के द्वारा स्वाधीनता संग्राम के दौर की आत्मोत्सर्ग की पत्रकारिता के सरोकार और समर्पण को बख़ूबी समझा जा सकता है। श्री शांति भूषण भटनागर जी इलाहाबाद (अब प्रयागराज) से साप्ताहिक ‘स्वराज’ का प्रकाशन करते थे। उन्हें ‘स्वराज’ के लिए एक संपादक की आवश्यकता थी। इसके लिए उन्होंने ‘जू उन करनींन’ नामक अखबार में एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया। जिसका मजमून था:-
” एक जौं की रोटी और एक प्याला पानी, यह तनख़्वाह है, जिस पर ‘स्वराज’ इलाहाबाद के वास्ते एक एडिटर मतलूब है। यह वह अखबार है, जिसके दो एडिटर बगावत आमेज़ मज़ामीन (विद्रोहात्मक लेखों) की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुके हैं। अब तीसरा एडिटर मुहैया कराने के लिए इश्तहार दिया जाता है। उसमें जो तनख़्वाह ज़ाहिर की गई है, के वास्ते एडिटर दरकार है, जो अपने ऐशोआराम पर जेलखाने में रहकर जौं की रोटी और एक प्याला पानी को तरज़ीह दे।”
पत्रकारिता का बुनियादी लक्ष्य है -शिक्षा, सूचना और ज्ञान। कालांतर में इसमें मनोरंजन भी जुड़ गया। आजादी से पहले भारत में देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत आत्मोत्सर्ग की पत्रकारिता थी। तब पत्रकारिता को समाज की वाणी और मष्तिष्क समझा जाता था। उस दौर के पत्रकार समाज के सूक्ष्म दृष्टा थे। स्वाधीनता पूर्व पत्रकारिता मिशन थी, इसे कला, वृत्ति एवं जनसेवा का माध्यम माना जाता था। तब पत्रकार समाज के सजग प्रहरी थे, उन्हें लोक शिक्षक कहा जाता था। राष्ट्र और समाज के विकास के लिए जनमत तैयार करना और सर्वहितकारी राष्ट्रीय एजेंडा बनाना पत्रकारिता का धर्म था। तब अख़बार जनता के शिकवे-शिकायत के खुले मंच थे। जन शिक्षण का कारगर औजार थे। सत्य के प्रति आग्रह और विश्वनीयता, पत्रकारिता की अमूल्य निधि होती थी। पत्रकारिता को सनातन विपक्ष माना जाता था। राजनीति और पत्रकारिता में तनाव का रिश्ता होता था। यही तनाव पत्रकारिता के पेशे को जनपक्षधरता एवं विश्वसनीयता प्रदान करता था। सतही और सनसनीखेज़ खबरों को पीले रंग की स्याही में अलग से छापा जाता था, ताकि ऐसी घटनाओं का समाज में दुष्प्रभाव नहीं पड़े। इसे ‘पीत पत्रकारिता’ कहा गया। कालांतर में ‘पीत पत्रकारिता’ का अभिप्राय ब्लैकमेलिंग के संदर्भ में किया जाने लगा।
स्वाधीनता पूर्व पत्रकारिता समाज की गतिविधियों का दर्पण थी। पत्रकारिता का लक्ष्य बृहत्तर समाज था। पत्रकार सामाजिक मूल्यों के नियामक की भूमिका में थे। आजादी से पूर्व और आजादी के बाद वैश्वीकरण का दौर प्रारंभ होने तक जन संचार माध्यम शिक्षा, सूचना ज्ञान और मनोरंजन के महत्वपूर्ण माध्यम थे। तब तक जन संचार माध्यमों की जड़ें हमारे समाज के मूल्यों और संस्कृति से पूरी तरह उखड़ी नहीं थीं। आधुनिक युग में नई संचार प्रौद्योगिकी ने संचार के क्षेत्र में एक क्रांति ला दी।
प्रत्येक नई टेक्नोलॉजी के साथ सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों पक्ष अनिवार्य रूप से जुड़े होते हैं। नई टेक्नोलॉजी अपने साथ कोई मूल्य और संस्कृति भी लाती है। वैश्वीकरण और नई संचार प्रौद्योगिकी अपने साथ घोर बाजारवाद और उपभोक्तावाद लाई। उपभोक्तावाद और बाजारवाद ने संचार माध्यमों के मूल चरित्र को आमूल चूल परिवर्तित कर दिया। निजी न्यूज चैनलों की हड़बड़िया पत्रकारिता ने इस मिशनरी पेशे को लाभ-हानि के विशुद्ध व्यापार में बदल दिया है। जिसके दुष्परिणाम हम सबके सामने हैं।
आज पत्रकारिता के पेशे में सामाजिक दायित्वों पर मुनाफाखोरी हावी हो गई है। आज की पत्रकारिता राष्ट्र का एजेंडा नहीं बना रही है, बल्कि अपने निहित व्यावसायिक स्वार्थों का एजेंडा चला रही है। पत्रकारों ने सनातन विपक्ष की भूमिका खो दी है। आज पत्रकारिता सीधे तौर पर दो धड़ों में बंटी नज़र आती है। अंधभक्ति और अंधविरोध के इस द्वंद्व में आम आदमी से जुड़े मुद्दे नदारत हैं। पाठक, स्रोता, दर्शक, सब ठगा- सा महसूस कर रहे हैं। अब अख़बार और टीवी न्यूज चैनल सोशल मीडिया से प्रभावित होने लगे हैं। जन संचार के ये दोनों प्रभावशाली माध्यम सोशल मीडिया का अनुसरण करने लगे हैं। इन्हें भी डिजिटल मीडिया के शरणागत होना पड़ रहा है। इधर कुछ वर्षों से अखबारों के चौथे- पांचवें पन्नों से मास्टर हैड लगने लगे हैं। अखबारों के मुख्य पृष्ठ विज्ञापनों ने हड़प लिए हैं। अखबारों से साहित्य धीरे-धीरे गायब होने लगा है। अधिकांश समाचार – पत्रों में संपादक के नाम पत्र के कॉलम बंद हो गए हैं। इसके चलते आम आदमी की अखबारों तक पहुँच नहीं रही।
रोज रात को निजी टीवी चैनलों के स्टूडियो में होने वाली अर्थहीन बहसों को देखकर लगता है कि जैसे पुराने जमाने के नबाव मुर्गे लड़ा रहे हों। खबरिया चैनलों की आधुनिक पत्रकारिता के वर्तमान दौर में एक जुमला आम है कि ‘हमारा चैनल अमुक वीडियो की सत्यता की पुष्टि नहीं करता।’ सवाल है कि जब तुम्हारा चैनल पुष्टि नहीं करता है तो ऐसे अपुष्ट वीडियो को दिखा कर समाज में सनसनी क्यों फैला रहे हो? पहले से सनसनी फैलाने वाली ऐसी अपुष्ट सूचना देने को ही पीत पत्रकारिता कहा जाता था।
पत्रकारिता का दायित्व है कि समाज में वैज्ञानिक सोच पैदा हो। आज की पत्रकारिता समाज में अंधविश्वास, कुरीतियों एवं कुप्रथाओं का प्रसार कर रही है।
संचार माध्यमों में घोर व्यावसायिकता है। विज्ञापन और समाचारों में भेद करना असंभव हो गया है। पहले संचार माध्यमों में प्रकाशित/ प्रचारित ख़बरों की तटस्थता एवं सत्यता असंदिग्ध होती थी। अब खबरों से सच खोजना पड़ता है। खबरों में झूठ की जबरदस्त मिलावट है। आधा सच और आधा झूठ परोसा जा रहा है। कई मौकों पर तो निरा झूठ फैलाया जा रहा है।
अपनी पेशेवराना जिम्मेदारियों से बचने के लिए ‘सूत्र’ महत्वपूर्ण हथियार बन गए हैं। ‘सूत्र’ ही समाचार संस्थानों को संचालित कर रहे हैं। जिसके चलते निगहबान और चारण के बीच का फर्क ख़त्म हो गया है।
आज से करीब पचास साल पहले भारत के ख्यातिप्राप्त कवि, लेखक एवं मूर्धन्य पत्रकार पंडित माखनलाल चतुर्वेदी जी ने कहा था-
“बुद्धि के ऐरावत पर म्युनिसिपल का कूड़ा ढोने का जो अभ्यास किया जा रहा है अथवा ऐसे प्रयोगों से जो सफलता प्राप्त की जा रही है,उसे मैं पत्रकारिता नहीं मानता।”
नैराश्य के इस वातावरण में पत्रकारिता का बेहद उजला पक्ष अब भी मौजूद है। पूर्वाग्रही पत्रकारिता के मौजूदा दौर में भी अनेक अख़बारों, न्यूज चैनलों एवं अन्य समाचार संस्थानों में उच्च कोटि की अच्छी प्रतिभाएं हैं। यू-ट्यूब ने अनेक प्रतिभाशाली पत्रकारों को पुनर्जन्म दिया है। लिहाजा- “न दैन्यं न पलायनम।”

































