शेखर पाठक
प्यारे मंटू (15 जून 1960-28 अप्रैल 2025) से मेरी गहरी दोस्ती नहीं रही। पर अनेक व्यक्ति मुझे भले और भोले यानी चाहने लायक लगते रहे। मंटू उनमें से एक था। उसकी संगीत प्रतिभा और सांस्कृतिक बेचैनी के बारे में सखा दाज्यू, गिर्दा और देहरादून के कुछ साथी बता चुके थे। महफिलों में न जा पाने के कारण मैं संगीत की दुनिया को कम जानता था। तब यूट्यूब नहीं आया था। राज्य आन्दोलन के दौर में 1 अक्टूबर 1994 या उससे एक दिन पहले हम कुछ साथी अल्मोड़ा, रानीखेत, गोपेश्वर, श्रीनगर, टिहरी, उत्तरकाशी, मसूरी होकर देहरादून पहुंचे थे। वहां के साथियों ने प्रभातफेरी के गीतों बाबत बताया और जगमोहन जोशी का नाम लिया। क्षणभर को नहीं समझा, तभी एक साथी ने कहा, मंटू! और ‘इकॉनोमी हाउस‘ की दुकान का काउण्टर और मुस्कुराता मंटू मेरे सामने आ गया।
मंटू की शिक्षा-दीक्षा नैनीताल में हुई। संगीत भरा परिवार और माहौल था। नैनीताल शास्त्रीय गायकी और होली की विरासत में कुछ नया जोड़ रहा था। खेलों में भी झण्डे गाड़ रहा था। हरि कीर्तन सभा, शारदा संघ, गीत नाटक प्रभाग, युगमंच तथा अन्य नाट्य तथा सांस्कृतिक संस्थाओं के कारण आये दिन विभिन्न कार्यक्रम होते रहते थे। डीएसबी कालेज में तीन दिन का नाट्य उत्सव होता था। शरदोत्सव होता था। चन्द्र शेखर पंत, विश्वम्भरनाथ शाह ‘सखा’, देवीराम, हरकिशन साह, केके साह, विजयकृष्ण, नलिन ढोलकिया, नवीन चन्द्र साह, प्रभात गंगोला, रमेश जोशी, नेपाली आदि कितनों ही ने क्लासिकल संगीत का सक्रिय माहौल बनाये रखा। युगमंच, रामसेवक सभा, शारदा संघ और नैनीताल समाचार आदि ने बैठी तथा खड़ी होली को प्रयोग, प्रस्तुति तथा हिस्सेदारी के स्तर पर आगे बढ़ाया।
गीत, लेखन, संगीत रचना, नाटकों में योग देना यह सब मंटू करता रहता था। होली और रामलीला से कौन बचा? मंटू की मूल दुनिया तबले से जुड़ी थी। विजयकृष्ण से ज्यादा इसीलिए भी छनती थी! फिर 1990 के आसपास या आगे पीछे वह देहरादून गया। वहां वह कर्नल ब्राउन स्कूल में संगीत शिक्षक बना। अपने विद्यार्थियों के साथ कक्षा और बाहर वह आकंठ डूबा रहता। साथ ही देहरादून के सांस्कृतिक सर्किल में भी उसकी उपस्थिति थी।
1994 में देहरादून में मंटू की सामाजिकता और सांस्कृतिक बेचैनी उजागर हो ही गई। वह अपने को छिपाता था। उसका संगीत उसे प्रकट कर देता था। वह नहीं भी दिखता था तो उसकी बनाई धुन सुनाई पड़ती थी। दरअसल सृजनशीलता बारोमासी स्रोत की तरह होती है और निरन्तर प्रकट होती रहती है। समाज सिर्फ अपने ज्यादा धड़कने के दौर में उसे पकड़ पाता है। क्या कारण रहे मुझे पता नहीं पर वह देहरादून छोड़कर नैनीताल आ गया। अनेकों बार लगा कि वह एक गैर सांगीतिक कार्य यानी दुकानदारी में जुट गया है पर सच यह था कि यह दुकान सदा संगीतमय रही। कुछ ऊपर की मंजिल से भी निथरता आता था। यानी दोनों मंजिलों में संगीत बसता था। यह वैसा ही था जैसे जहूर आलम की दुकान में नाटक और शायरी की मौजूदगी। मंटू की सक्रियता कायम रही। वह गीत, संगीत, साहित्य और दर्शन ही सोचता था, जीता था। आज की देश-दुनिया और अपने इलाके के हालात पर भी उसकी खुली आंख जा टकराती थी। अनेक बार वह बेचैनी प्रकट करता था। अनेक बार वह असहजता को करीब पाता था। पर खुली आंखों और खुले दिमाग वाला वह अंत तक बना रहा।
नैनीताल लौटकर वह सक्रिय तो रहा पर धीरे-धीरे शायद अकेला पड़ता गया। 1994-95 में जब वह देहरादून में था तो उसने अतुल शर्मा के गीतों को संगीत दिया था। नैनीताल आकर नाटकों में परामर्श और संगीत देता रहा। रवि के माध्यम से भी उसकी सृजनशीलता फूटती थी। चाचा-भतीजे की यह जोड़ी अपनी तरह की थी। लगातार लगता है रवि में ‘मंचा’ का एक बड़ा हिस्सा धड़क रहा है। बल्ली सिंह चीमा के गीत ‘बर्फ से ढक गया’ को मंटू ने बहुत सजावट दे दी थी। इसी तरह नदियों के लिए बेचैन अपने गीत ‘जवाब दो कि नदी पूछती है सवाल’ को उसने एक अलग तरह की उदास पर आह्वान भरी धुन दी।
मंटू छिपे-छिपे रहने के बाद भी अनेक दोस्तियां निभाने वाला भी रहा। उसके ज्यादातर दोस्त उसकी ही तरह फकीरी और इन्सानियत दोनों में विश्वास करने वाले रहे हैं। मैं सिर्फ दो का जिक्र कर रहा हूं। उसकी सबसे गहरी दोस्ती मुकुल शिवपुत्र से थी। मुकुल को कुछ लोग कुमार गंधर्व की बिगड़ी संतान भी कह देते हैं पर असलियत यह है कि उनकी संगीत विरासत को अपनी तरह से बनाये रखने में मुकुल पीछे नहीं रहे। जैसे कोई दूसरा कुमार गंधर्व नहीं हो सकता वैसे ही कोई दूसरा मुकुल शिवपुत्र भी संभव नहीं है।
मंटू का दूसरा दोस्त है आशुतोष उपाध्याय। जो अपनी सोच, समझ और व्यक्तित्व में मंटू की ही तरह है। अंतिम सालों में मंटू की सबसे ज्यादा करीबी आशुतोष से रही। कहा जा चुका है कि संगीत रचना-गायन में मंटू की यह करीबी भतीजे रवि जोशी के साथ रही। कितने ही और दोस्त रहे होंगे! पुराने दोस्त मिथिलेश पाण्डे, हेमन्त बिष्ट, प्रभात गंगोला, जहूर आलम। विजयकृष्ण तो शिक्षक थे और साथी भी।
एक प्रसंग। सीआरएसटी में पहाड़ का कोई कार्यक्रम हो रहा था। मैं स्वागत हेतु मंच पर था। मंटू आता हुआ दिखा। उसके साथ एक आकर्षक पर बेतरतीब दिखने वाला व्यक्ति था। मैं सोचता रहा कौन होगा? कार्यक्रम समाप्ति के बाद मैं मंटू के पास गया। पूछा कि साथ कौन था? वह बोला मुकुल शिवपुत्र। मैंने आश्चर्य से अपनी जानकारी अनुसार कहा कि क्या कुमार गंधर्व जी के पुत्र? मंटू मुस्कुराया। मैंने कहा, रोका क्यों नहीं तो वह बोला उन्हें रोकना असंभव है। अभी मैं भी नहीं जानता कि शाम को लौटेंगे या महीनों के बाद। मुकुल फिर फिर मुटू के पास आते रहे।
मंटू खुशमिजाज, तीमारदार, मददगार, जल्दी द्रवित हो जाने वाला और मोहिला मनुष्य था। एक ‘जोगैन’, एक फकीरी की फितरत उसमें थी। सादगी और सद्भाव भरपूर था। साहसी भी वह बहुत था। उसका अंतिम साहस तब प्रकट हुआ जब डेड़ेक साल पहले स्वास्थ्य परीक्षण कर डाक्टरों ने उसकी भोजन नली में कैंसर पाया। डाक्टरों ने कहा कि अगर अभी इलाज हो तो चार-पांच साल की जिन्दगी मिल सकती है। मंटू ने सहजता से पूछा कि अगर यह सब न करूं तो? डाक्टरों ने कहा कि दो-तीन साल ही संभव होगा। मंटू ने दूसरा विकल्प चुना।
बहुत बार मुझे लगता था कि मंटू के रूप में जैसे एक कस्तूरा मृग ऊंचे हिमालयी एकांत से किसी शहर में आ गया हो। और उसका स्वयं को अपने एकांत से दूर बनाये रखना कितना कठिन रहा होगा! वह वहीं कहीं गया होगा।
उसकी खूशबू हमारे बीच है।

































