राजेन्द्र धस्माना
नये उत्तराखण्ड को माफिया, राजनेता और नौकरशाह की टिकडी से बचाने के लिये जरूरी है कि यहाँ ई-गवर्नेन्स का सूझबूझ के साथ उपयोग किया जाये। राजधानी का मुद्दा टालने के लिये जो फालतू बहाने बनाये जा रहे हैं कि इतने सौ करोड़ का खर्चा कहाँ से आयेगा, उसका जवाब भी ई गवर्नेन्स से ही दिया जा सकता है। आज सन् 2000 में राजधानी का भारी भरकम होना कतई जरूरी नहीं है। राजधानी बनाने का काम दीर्घकालीन योजना बनाकर चरणबद्ध रूप में किया जा सकता है। विधान सभा में जो बहस होती है, सरकार जो नीतियाँ और कार्यक्रम तय करती है, उसे मदर कम्प्यूटर में फीड कर लिया जाये। अगर दूर संचार से कनेक्टिविटी मिलने में कोई दिक्कत होती है तो फ्लॉपियों के जरिये उस सूचना को ब्लॉक स्तर तक भेज दिया जाये। अगर किसी ग्रामीण को किसी सूचना की जरूरत हो तो उसे ब्लॉक कार्यालय से मामूली दर पर उस सूचना का प्रिण्ट उपलब्ध करवा दिया जाये । यह प्रिण्ट एक रिकॉर्ड भी होगा और तब ग्रामीण अपने जन प्रतिनिधि से जवाबतलब कर सकता है कि वह इतना नाकारा क्यों रहा। अब तक प्रिण्ट मीडिया अपने स्थान की सीमा या इलैक्ट्रॉनिक मीडिया अपने समय की सीमा के कारण इन सूचनाओं को बहुत संक्षिप्त और सम्पादित कर प्रकाशित करता है। ई गवर्नेन्स से ये सूचनायें अविकल रूप से नागरिकों को प्राप्त हो सकेंगी। भ्रष्टाचार का एक बड़ा स्रोत भूमि सम्बन्धी दस्तावेज होते हैं। पटवारी तक गरीब व्यक्ति का खूब शोषण करता है। देहरादून स्थित इंडियन इस्टीट्यूट ऑफ रिमोट सेंसिंग से दूर संवेदी लेकर उन्हें जी.आई.एस. (ज्योग्रेफिकल इन्फॉर्मेशन सिस्टम) के साथ देखकर भूमि के एकदम स्पष्ट और प्रामाणिक दस्तावेज बनाये जा सकते हैं। खेत की मुँडेर और किनारे के पेड़ व झाड़ियाँ तक इन चित्रों में एकदम स्पष्ट आ जाते हैं।
फिलहाल फालतू बहसें चल रही हैं कि नये राज्य में इतने आई.ए.एस./आई.पी.एस० चाहिये। इससे तो हमारा सारा योजनागत आबंटन तनख्वाह और भत्ते बाँटने में ही खर्च हो जायेगा। ई गवर्नेन्स इन बातों का जवाब भी है कि इससे छोटे स्तर के बहुत कम कर्मचारियों को लेकर पूरी पारदर्शिता के साथ राजकाज चलाया जा सकता है।
अन्तरिम राजधानी को लेकर खींचतान चल रही है। नैनीताल की डी.एम. ने कहा कि सिर्फ 50 करोड़ रुपये मिल जायें तो रंग-रोगन, फर्नीचर आदि की व्यवस्था कर यहाँ राजधानी बनाई जा सकती है। देहरादून की डी.एम. ने कह दिया मैं पाँच करोड़ में ही बना दूँगी। बनायेंगे कैसे ? एफ.आर.आई. (फॉरेस्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट) को अगर विधान सभा बना रहे हैं तो एफ.आर.आई. का सारा सामान सड़क पर फेंक देंगे क्या ? दुबारा एफ.आर.आई. बनाने में अरबों-खरबों रुपये लग जायेंगे। जिन 38 शानदार मकानों को आप खाली कराने की बात कर रहे हैं, उनमें एक तो सैकड़ों जीवित वृक्ष प्रजातियों वाला हिमालया हेरिटेज सेंटर ही है, जिसे आप दुबारा किसी कीमत पर नहीं बना सकते। आप को सिर्फ राजधानी चाहिये, अपना इतिहास, अपनी विरासत कुछ नहीं चाहिये ? फिर, जिस शहर में आप जहाँ राजधानी बनायेंगे, वहाँ का मुख्य काम तो चैपट हो जायेगा। नैनीताल तो पर्यटकों के लिये नहीं रह जायेगा फिर।
नये उत्तराखण्ड राज्य में अन्तरिम सरकार तो हो सकती है, लेकिन राजधानी अन्तरिम नहीं हो सकती। राजधानी को तो स्थायी ही बनना चाहिये। अन्तरिम सरकार को तो सिर्फ दो काम तो करने हैं। एक्ट में ये काम करने के लिये समय की कोई सीमा नहीं है, लेकिन हमारे सांसद भी मानते हैं कि ये काम तो चार महीने में ही किये जा सकते हैं। मान लें कि ये काम करने में एक साल का समय लगता है। पहला काम अन्तरिम सरकार को जो करना है, वह है विधानसभा क्षेत्रों का परिसीमन, जो वह चुनाव आयोग के साथ मिलकर करेगी। दूसरा काम उत्तर प्रदेश की जो परिसम्पत्तियाँ और उसके ऊपर जो 78 हजार करोड़ का ऋण है, उनके बँटवारे का है। अब यह बँटवारा कैसे हो ? क्षेत्रफल के हिसाब से 10 प्रतिशत पर हो या आबादी के हिसाब से 45 प्रतिशत। यह अन्तरिम सरकार तय करेगी। सिर्फ इस काम के लिये मंत्रियों की फौज खड़ी करने की जरूरत नहीं है। सिर्फ छः महीने या एक साल के लिये बने मुख्यमंत्री के लिये विधायकों का तुष्टीकरण जरूरी नहीं है। एक साल बाद तो उसे चुनावों में जाना ही जाना है। वह इतना करे कि इन दो कामों के लिये आधे-आधे विधायकों को दो समितियों में बाँट दे और उनके दो अध्यक्ष बना दे। चाहे तो उन्हें मंत्री नाम दे दे। अब जहाँ 16-17 मंत्री बनना चाहते थे, सिर्फ तीन मंत्रियों का खर्च है। 13-14 मंत्रियों का एक साल का वेतन-भत्ता बच सकता है। मंत्री भी सादगी से रहें। क्या जरूरी है कि आपको पहले दिन से ही कमाण्डो, बंगले और एअरकंडिशंड गाडियाँ मिलने लगे ? सामान्य आदमी की तरह क्यों नहीं रह सकते आप ? यदि सादगी बरत सकें तो आप पहले साल में ही बीस से तीस करोड़ रुपया बचा सकते हैं। इस धनराशि को राजधानी विकसित करने में लगाइये।
नये राज्य में पैकेजों के रूप में पैसा खूब मिलेगा, क्योंकि यहाँ और केन्द्र में एक ही पारटी की सरकार है। लेकिन त्रिपुरा के अनुभव से सबक सीखना चाहिये। नया राज्य बनने पर जब तक वहाँ के लोग होश सम्हालते, माफिया, राजनेता और नौकरशाहों की तिकडी ने आपस में मिल बाँट कर सब कुछ हजम कर लिया। कुछ भी नहीं बचाया। इस मामले में उत्तराखण्डवासियों को बहुत सावधान रहने की जरूरत है।
अब पहली निर्वाचित सरकार की बारी आती है। यह देखा गया है कि विधान सभायें 60 प्रतिशत काम फालतू ले लेती हंै। सड़क, मकान, शौचालय, पुल, स्कूल, पुस्तकालय बनवाने जैसे काम विधानसभा क्यों करे ? हमारे संविधान में 243 (छ) और 243 (ब) के तहत यह प्रावधान है कि नगर निकाय और ग्राम पंचायतें ये काम कर सकती हैं। लेकिन ये काम उन्हें दिये ही नहीं जाते। क्योंकि इसमें नौकरशाहों, राजनेताओं और माफिया की तिकड़ी का स्वार्थ है, जो विकास का सारा पैसा हजम करना चाहती है। अतः यह आरोप लगा दिया जाता है कि पंचायतों में भ्रष्टाचार होता है। जबकि होता यह है कि बीच में बनाये गये जिला व ब्लॉक के दो फालतू स्तर विकास का अधिकाश पैसा खा जाते हैं। गाँव वाला जब देखता है कि इन ऊपर वालों को इतना खिलाना पड़ा तो थोड़ा वह भी खा लेता है। लेकिन सच्चाई यह है कि विकास के जो काम स्थानीय निकाय और पंचायतें कर सकते हैं, उन्हें उसका दस प्रतिशत भी नहीं दिया जाता। केरल में इस क्षेत्र में अद्भुत प्रयोग किया गया है। सन् 96-97 में वहाँ पंचायतों को सिर्फ 20 करोड रुपया दिया गया था। सन् 97-98 में 1,025 करोड़ और 98-99 में 1175 करोड़ रुपये दिये गये। वहाँ कायाकल्प हो गया। तीन चैथाई काम पूरा हो गया है। 250 पंचायतें तो वहाँ ऐसी हैं, जो सुविधाओं की दृष्टि से योरोप और अमेरिका के किसी भी गाँव के समकक्ष रखी जा सकती हैं। यह प्रथा हमें उत्तराखण्ड में भी लागू करनी चाहिये। इससे विकास के पैसे का सही उपयोग होगा और हम पैसा बचा पाये तो वह राजधानी विकसित करने में लगा सकते हैं। फिर अभी तो अस्थाई राजधानी को लेकर विवाद उठाया जा रहा है। स्थाई राजधानी के विकास के लिये तो पैकेज मिलना ही है। रेल और हवाई मार्गों के लिये पैसा केन्द्र सरकार ही देगी। हमारे सामान्य आदमी को तो इनकी बहुत जरूरत है नहीं।
राजधानी के लिये मुख्य जरूरतें विधानसभा भवन, सचिवालय, उच्च न्यायालय, आवासीय भवन और जिला मुख्यालयों से जुड़ने वाले द्रुत राजमार्गों की है। इनमें से भी हम नहीं चाहते कि मंत्री राजधानी में एश करें। 13 जिलों के 13 मंत्री हों और वे हर जिले में वैसे ही रहें, जैसे जिलाधिकारी रहता है। राजधानी में एक साइबर क्लब हो, जिसके जरिये जिला मुख्यालयों में बैठे सारे मंत्री कम्प्यूटरों से आपस में और मुख्यमंत्री से जुड़े रहें। सिर्फ विधानसभा सत्र के दौरान वे राजधानी में आयें। विधानसभा तो कामचलाऊ रूप में किसी स्कूल के हॉल में भी काम कर सकती है। एक स्कूल के हॉल में 70 लोग नहीं बैठ सकते क्या ?
संक्षेप में यदि हम सादगी अपनायें, ई गवर्नेन्स और पंचायती राज व्यवस्था का सहारा लें और जल्दबाजी न करें तो बगैर किसी भारी भरकम मदद के गैरसैण जैसी किसी जगह को राजधानी के रूप में विकसित कर सकते हैं। मेरा मानना है कि शुरूआती दौर में इस काम में 80 लाख रुपये से ज्यादा की जरूरत नहीं रहेगी।
(’गांधी वाङ्मय’ के पूर्व सम्पादक और दूरदर्शन के पूर्व समाचार सम्पादक राजेन्द्र धस्माना से हरीश पंत, महेश पाण्डे और पेमा गेकिल सिथर के साथ रिकॉर्डेड बातचीत के आधार पर)
(यह आलेख राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 15 नवम्बर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)





























