राजीव लोचन साह
उत्तराखण्ड राज्य के गठन की संक्रान्ति के ऐतिहासिक अवसर पर जिन महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत होनी चाहिये थी, दुर्भाग्य से वे नदारद हैं। राजधानी, हाईकोर्ट, मुख्यमंत्री जैसे मसलों पर ही बातचीत सिमट कर रह गई है। उत्तराखण्ड के संसाधनों को लेकर अकादमिक बहसें बहुत सारी होती रही हैं। उन्हें शोध प्रबन्धों और सेमिनारों की कार्रवाहियों से बाहर ले आया जाये, तो सचमुच इस वक्त बड़ी काम आयेंगीं। लेकिन चिन्ताजनक बात यह है कि आजाद भारत की पचास साला गुलामी के संस्कारों को सन् 1994 का विराट जनान्दोलन भी ध्वस्त नहीं कर पाया। गुलामी का वह भाव इस वक्त अत्यन्त खतरनाक ढंग से सामने आ रहा है। कमाण्डो और गाड़ियों के भारी भरकम काफिले से घिरे वीआइपियों के चलने का रास्ता बनाने के लिये पुलिस के डंडे खाने के हम इतने अभ्यस्त हो गये हैं कि यह भूल जाते हैं कि इस धरा पर ऐसे अच्छे भले देश मौजूद हैं, जहाँ के प्रधानमंत्री सामान्य जन की तरह बसों में चलते हैं और सादा जीवन व्यतीत करते हैं। जब हम इस तथ्य से चिन्तित होने लगते हैं कि उत्तराखण्ड के लिये 120 आई.ए.एस., 82 आई.पी.एस. और 150 आई.एफ.एस. अधिकारी चाहिये मगर 42 आई.ए.एस., 14 आई.पी.एस. और 70 आई.एफ.एस. अधिकारियों से ज्यादा आने-को तैयार नहीं हैं, तब यही गुलामी का भाव हमारे मन में होता है। पचास साल पहले हम उत्तर प्रदेश में पुलिस का एक आई.जी., वन विभाग का एक चीफ कंसरवेटर और पी.डब्ल्यू.डी. का एक चीफ इंजीनियर देखते थे। पचास साल बाद हम इन ‘एकों’ के स्थान पर ‘दर्जनों’ शीर्ष अधिकारी देखने के इतने आदी हो गये हैं कि इन अधिकारियों के न आने की चिन्ता से हमारी नींद उड़ गई है। अपने क्षुद्र स्वार्थ सिद्ध करने के लिये इसी आई.ए.एस. नौकरशाही ने उत्तर प्रदेश में एक खर्चीला और जन विरोधी ढाँचा तैयार किया, जिसके परिणामस्वरूप आज हम सामान्य राजकाज चलाने के लिये भी विश्व बैंक से भीख माँगने को अभिशप्त हैं। हमारे मूढ़मति राजीतिज्ञों की असहायता के चलते वही ढाँचा उत्तराखण्ड में थोपे जाने का षडयंत्र चल रहा है और हम उसे पाने को लालायित हैं। इसी को कहते हैं गुलामी!
आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. काम क्या करते हैं, यह हम बहुत ज्यादा नहीं समझ पाये। छोटे और मझोले अधिकारियों को दौड़ते-भागते देखा जा सकता है, ये शीर्षस्थ लोग तो अधिकांशतः हुक्म चलाते, नोटिंग या दस्तखत करते ही देखे जाते हैं। छोटे अधिकारियों को हुक्म खाने की इतनी आदत पड़ गई है कि छोटे-छोटे मामलों में निर्णय लेने में भी वे स्वविवेक का इस्तेमाल नहीं करते। मानो वे मानव नहीं, मशीन हों। नये राज्य में हमें इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश करनी चाहिये। इस संक्रान्ति काल में ही कुछ हो गया तो हो गया, अन्यथा यह कलंक हमारी आने वाली पीढियाँ भी ढोती रहेंगीं। हम तो सोचते हैं कि जितने भी आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. अधिकारी नये राज्य में स्वेच्छा और सेवाभाव से आयें, उन्हें लिया जाये, भले ही वे मूलतः इस क्षेत्र के रहने वाले हों या न हों। औपनिवेशिक अंग्रेजी प्रशासकों में तक कितने ही ऐसे हैं, जिन्हें हम आज भी इज्जत से याद करते हैं। आज भी गैर पहाड़ी मूल के बहुत से कर्मठ और ईमानदार अधिकारी हमारे बीच में हैं और आगे भी बने रहना चाहते हैं। हम उन्हें अपनायें। आरक्षण का दुरुपयोग कर शीर्ष स्थानों पर पहुँचे और अब अपनी पिछड़ी मातृभूमि से आँखें चुराने वालों की खुशामद भी क्यों करनी है ? बाकी काम हम अपना एक नया प्रादेशिक कैडर विकसित कर करें। इन नये अधिकारियों को हम हेकड़ी का नहीं, विनय और संवेदना का पाठ पढ़ायें। प्रशासनिक परीक्षाओं में उत्तराखण्ड के युवकों का शानदार रिकॉर्ड रहा है, भले ही उनमें अनेक बाद में लुटेरों में तब्दील हो गये हों। लेकिन बेहतर शिक्षा और प्रशिक्षण से हम आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. की कमी को ज्यादा बेहतर ढंग से पूरा कर लेंगे। सवाल सिर्फ साफ दृष्टि और संकल्प का है। आई.ए.एस., आई.पी.एस. और आई.एफ.एस. अधिकारियों की अनिच्छा को लेकर रोने की जरूरत नहीं है। आजादी से पूर्व हम ऑनरेरी मजिस्ट्रेट नियुक्त कर काम नहीं चलाया करते थे क्या ?
(यह आलेख राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 1 अक्टूबर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)





























