राजीव लोचन साह
भारत की न्यायपालिका इन दिनों विचित्र, बल्कि अनेक बार तो स्तब्ध करने वाला व्यवहार कर रही है। पिछले कुछ समय से लोकतंत्र पर अभूतपूर्व संकट है। सांवैधानिक संस्थायें अनेक तरह के दबावों से गुजर रही हैं। ऐसे में न्यायपालिका से उम्मीद की जाती है कि जरूरी मामलों में वह स्वतः संज्ञान लेकर लोकतंत्र की रक्षा के लिये सन्नद्ध हो। मगर वह किंकर्तव्यविमूढ़ अवस्था में पड़ी हुई है। सर्वोच्च अदालत के मुख्य न्यायाधीश पर जूता उछालने वाले आरोपी के यों ही छूट जाने से न्यायपालिका पर हमलावर होने वाले लोगों के हौसले ही बुलन्द हुए होंगे। एक जज के घर पर करोड़ों रुपये मिलने की गुत्थी का भी अब तक न सुलझ पाना न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर सवाल पैदा कर रहा है। ऐसे में न्यायालय से निकले अटपटे फैसले और ज्यादा हैरान किये दे रहे हैं। केन्द्र सरकार की एक परिभाषा, जिसमें सिर्फ 100 मीटर से ऊँची पहाड़ियों को ही अरावली पर्वत माना गया है, को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्वीकार कर लिये जाने से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आदि इलाकों में जबर्दस्त आक्रोश फैल गया है। असंतुष्ट लोगों को लगता है कि इससे अभी ही अरावली में हो रहा खनन बहुत ज्यादा है और यह परिभाषा लागू हो जाने पर तो देर-सबेर पूरा अरावली ही नष्ट हो जायेगा। उधर एक और चैंकाने वाले निर्णय में दिल्ली हाईकोर्ट ने बलात्कार के सजायाफ्ता उन्नाव के पूर्व भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा निलम्बित कर दी। सेंगर पर उसके पास काम माँगने आयी एक दलित युवती के बलात्कार और पीड़िता द्वारा इस मामले में आवाज उठाने पर उसके पिता की हत्या करवा देने के संगीन आरोप हैं। लोगों को यह निर्णय बिल्कुल समझ में नहीं आ रहा है और इसके विरोध में एक जनमत बन गया है। पता नहीं सरकार इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में अपील करती है या फिर किसी समर्थ न्यायप्रिय व्यक्ति को अथवा किसी स्वयंसेवी संस्था को पीड़िता को न्याय दिलाने के लिये आगे आना होगा।

































