चारू तिवारी
गैरसैंण को स्थाई राजधानी घोषित करने की मांग को लेकर चल रहे आंदोलन को कुचलने का सरकार कोई मौका नहीं चूकती। पिछले साल 20 मार्च, 2018 को गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान स्थाई राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति के नेतृत्व में विधानसभा का घेराव किया गया। इसके दूसरे और तीसरे दिन 21-22 मार्च को गैरसैंण में चक्का जाम किया गया। इस चक्का जाम को उठाने के लिये पुलिस और स्थानीय प्रशासन ने भारी बल प्रयोग किया। लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात को रख रहे आंदोलनकारियों पर पुलिस ने लाठियां भांजी और उन्हें सड़क पर घसीटकर गिरफ्तार किया। कई महिलाओं को इसमें चोटें आईं उनके कपड़े फटे। पुलिस और प्रशासन ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। बाद में उन पर कई धाराओं पर मुकदमे लगा दिये। आंदोलनकारियों को विभिन्न धाराओं के तहत समन जारी किये गये। उन्हें पहली बार 3 मई, 2019 को अदालत में पेश होने के लिये कहा गया। फिर 18 जून, 2019 को अदालत में पेश होने के आदेश दिये गये। आंदोलनकारियों का कहना है कि हमने कोई अपराध नहीं किया है। हम गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने की मांग को लेकर अपने लोकतंात्रिक अधिकारों के तहत आंदोलन कर रहे थे। पुलिस-प्रशासन ने आंदोलनकारियों पर फर्जी मुकदमे लगाये जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं। सरकार से यह मांग भी करते हैं कि शीघ्र इन मुकदमों को वापस लिया जाये। आंदोलनकारियों की अगली पेशी 10 जुलाई को होनी है। हम सब लोग पुरजोर मांग करते हैं कि उक्त तिथि तक सरकार सभी आंदोलनकारियों के मुकदमें वापस ले नहीं तो गैरसैंण में फिर से व्यापक आंदोलन चलाया जायेगा। गैरसैंण के आलोक में पहाड़ के सवालों को उठाने वाले सभी साथियों से भी अपील है कि वे सरकार की दमनकारी नीति के खिलाफ अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें।
गैरसैंण को स्थाई राजधानी बनाने के लिये स्थाई राजधानी गैरसैंण संघर्ष समिति पिछले दो साल से लगातार संघर्ष कर रही है। गैरसैंण और प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर इसके लिये कार्यक्रम जारी हैं। गैरसैंण में समिति के अध्यक्ष नारायण सिंह बिष्ट के नेतृत्व में जब यह आंदोलन चल रहा था तो बजाय आंदोलनकारियों की बात सुनने के सरकार ने इस आंदोलन की उपेक्षा ही की। लगभग छह महीने के धरना-प्रदर्शन, क्रमिक अनशन, आमरण अनशन चलाने के बाद भी सरकार ने एक बार भी बातचीत करने की कोशिश नहीं की। सरकार ने जब अपना बजट सत्र गैरसैंण में रखा तो 20 मार्च, 2018 को संघर्ष समिति ने विधानसभा घेराव का आह्वान किया था। इसमें हजारों लोग जुटे। सरकार ने जरूरी नहीं समझा कि कई महीनों से अपनी मांगों लेकर भूख हड़ताल में बैठे आंदोलनकारियों से बातचीत कर लेते। सरकार जहां एक ओर इसी सत्र में पहाड़ को एकमुश्त बेचने के लिये भूमि कानून में संशोधन का मसौदा ला रही वहीं दूसरी ओर मुख्यमंत्री मांग कर रहे थे कि उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला भी उत्तराखंड में शामिल होना चाहिये। उनका कहना था कि गैरसैंण राजधानी बनाना इसलिये उपयुक्त नहीं हैं कि यहां हवा चलती है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और सांसद अजय भट्ट कह रहे थे कि गैरसैंण में आने से उनके ड्राइवरों के रहने की दिक्कत होती है। नेता प्रतिपक्ष इंदिरा हृदयेश को यहां ठंड की चिंता थी। जहां एक तरफ सरकार यह रैवया था वहीं दूसरी ओर जो गैरसैंण के लिये संघर्ष कर रहे थे उन पर लाठियां बरसाई जा रही थी। झूठे केस भी उन्हीं पर लगाये गये हैं।
सरकार को गैरसैंण आंदोलनकारियों से इतना खतरा हो गया कि उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 147, 149, 151, 152, 186, 188, 283, 332, 341, 353, 4297, पर मुकदमा ठोक दिया। इसमें 24 महिला आंदोलनकारी शामिल हैं। सरकार पिछले महीनों में भूमि कानून में संशोधन लाकर जिस तरह से पूरे पहाड़ को बेचना चाहती है उसे वह अपराध नहीं मानती। वह एक खरबपति को उसके बेटों की शादी करने के लिये उच्च हिमालयी क्षेत्र का संवेदनशील औली दे देती है। सरकार चाहती है कि इस तरह के लोग पहाड़ में आयें। हमारी जमीनों, नदियों, जंगलों पर कब्जा करें। उसे वह बड़े तरीके से विकास का रैपर लगाकर बेच रही है। अभी सरकार ने जिला विकास प्राधिकरणों का निर्माण कर हमारे गांव-कस्बों को भी अपने निशाने पर ले लिया है। केन्द्र सरकार अगले महीने देश में वन कानून-1927 में संशोधन कर हमें जंगलों से बेदखल करने की तैयारी में है। पहाड़ के एक बड़े हिस्से को ससेंटिव जोन घोषित कर वह जंगलों में भी कारपोरेट के लिये रास्ता खोलने वाली है। पहाड़ में स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क आदि का जो हाल सरकार ने किया है वह बताने की जरूरत नहीं। वहीं दूसरी ओर पहाड़ के विकास के विकेन्द्रीकरण और आम जनता के हितों को सुरक्षित रखने के लिये गैरसैंण राजधानी की बात करने वाले लोग सरकार को खतरनाक लगते हैं। इसलिये सरकार के दमनकारी रवैये के खिलाफ एकजुट होना जरूरी है।
हम मांग करते हैं कि गैरसैंण राजधानी की मांग को लेकर जिन 36 साथियों पर फर्जी मुकदमे किये गये हैं वह शीघ्र वापस लिये जायें। इस संबंध में आंदोलनकारियों को अदालत में 3 मई, 2019 को पेश होने के सम्मन जारी किये गये थे। इसके लिये हम लोगों ने 30 अप्रैल, 2019 को गैरसैंण में एक बैठक की। इसमें फैसला लिया गया कि जब हमने कोई अपराध ही नहीं किया है तो पेशी में क्यो जायें। इस संबंध में स्थानीय प्रशासन के माध्यम से एक ज्ञापन भी सरकार को दिया, जिसमें मांग की गई कि सरकार आंदोलनकारियों पर लगाये गये फर्जी मुकदमे वापस ले। कोर्ट की ओर में फिर अपने समन की तामील की गई। आंदोलनकारियों से कहा गया कि वे 18 जून, 2019 को अदालत में पेश हों, लेकिन आंदोलनकारियों ने उस दिन में भी कोर्ट में जाने से इंकार कर दिया। अब कोर्ट से 10 जुलाई, 2019 को पेश होने के लिये कहा है। हम सरकार से मांग करते हैं कि आंदोलनकारियों पर लगाये गये मुकदमे झूठे हैं, इसलिये इन्हें शीघ्र वापस लिया जाये। हमें इस बात पर घोर अफसोस है कि हरियाणा की जेल में बंद एक अपराधी जिस पर हत्या के अलावा कई संगीन मुकदमे चल रहे हैं, उसे सरकार अच्छे आचरण के कारण पैरोल देने की शिफारिश करती है। हमारे राज्य में औली को बरबाद करने वाले को तीन करोड़ का जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जाता है। हमारे यहां जो आंदोलनकारी अपनी स्थाई राजधानी और खुशहाल राज्य की परिकल्पना को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन चला रहे हैं, उन पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है। इसलिये हम इसका विरोध करते हैं। सरकार ने अगर ये मुकदमे वापस नहीं लिये तो 10 जुलाई, 2019 के बाद नई रणनीति से आंदोलन चलाया जायेगा।