अनेकों जनांदोलनों के अगुआ रहे समाजसेवी और चिंतक डॉक्टर राकेश रफीक का 27 सितंबर की प्रातः निधन हो गया। इससे देश में जनांदोलनों का एक मजबूत स्तंभ ढह गया। उनके देहावसान से कितने ही दबे-कुचले और व्यवस्था के सताए उन लोगों की आवाज मध्यम पड़ गई, जिनके लिए वे संघर्ष में खुद को झौंक देते थे। आंदोलनकारियों में ऊर्जा भरने वाला वही स्वर आज सदैव के लिए शांत हो गया है।
बिलारी (मुरादाबाद) निवासी 67 वर्षीय डॉ. राकेश रफीक को करीब चार दिन पूर्व अचानक स्वास्थ बिगड़ने पर उन्हें गाजियाबाद के मैक्स अस्पताल में भर्ती कराया गया वहीं पर उन्होंने अंतिम साँस ली।
डॉ. राकेश के जाने से सामाजिक आंदोलनों और बौद्धिक जगत को बड़ी क्षति पहुँची है। उनके निधन से न जाने कितने लोगों को लग रहा है कि यह उनकी अपनी व्यक्तिगत रूप से एक बड़ी क्षति हुई है, खास तौर पर उन्हें जिन्हें जनांदोलनों में ही नहीं बल्कि दर्शनशास्त्र के इस विद्वान प्राध्यापक से निजी जीवन में भी मार्गदर्शन प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
जे.पी. की समग्र क्रांति की रीढ़ उसकी छात्र-युवा संघर्ष वाहिनी में अग्रणी भूमिका निभाने से राकेश रफीक का सामाजिक आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी का सफ़र शुरू हुआ। उसके बाद नर्मदा बचाओ तथा उसके विस्थापितों को न्याय दिलाने, विभिन्न किसान आंदोलनों, अन्ना आंदोलन, भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के विरुद्ध संघर्ष, तीसरा स्वाधीनता संघर्ष अभियान, मजदूरों और युवाओं से जुड़े आंदोलनों में उनकी बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका के अलावा युवा भारत की स्थापना तथा सर्वसेवा संघ आदि संगठनों में उनकी सक्रियता और वैचारिक योगदान को लंबे समय तक याद किया जाएगा।
डॉ. राकेश रफीक राष्ट्रीय जनांदोलनों के साथ-साथ अपने गृहनगर बिलारी की समस्याओं के समाधान में भी सक्रिय रहते थे। वहाँ उन्होंने एक पुस्तकालय खुलवाया।
दार्शनिक लेखक राकेश ने ‘जाति तोड़ो-समाज जोड़ो’ मुहिम चलाई और स्वयं अंतरजातीय विवाह किया। अपने नाम से जुड़ी जातीय पहचान को अलग कर अपने नाम में ‘रफीक’ जोड़ लिया। जो उनकी सर्वधर्म समभाव की उदात्त मानवीय संवेदना को अभिव्यक्त करता है।
बेटा न होने से उनकी दोनों पुत्रियों ने उनकी पार्थिव देह को बिलारी के श्मसान घाट पर मुखाग्नि दी। इस अवसर पर सैकड़ों स्थानीय शोकाकुल लोगों के अतिरिक्त दिल्ली तथा अन्य स्थानों से आए उनके आंदोलनों के साथियों ने अपने प्रिय को श्रद्धा-सुमन अर्पित किए और अश्रुपूरित नेत्रों के साथ अंतिम विदाई दी।
डॉ. रफीक की बेटी डॉ. झरना तथा सामाजिक कार्यकर्ता सहयोगी ओमवीर यादव ने बताया कि आगामी 9 अक्टूबर को बिलारी में दिवंगत डॉ. राकेश रफीक की याद में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया है।
उनके परिवार में शोकाकुल उनकी ही तरह प्रगतिशील विचारधारा की पक्षधर बेटी डॉ. झरना, कैप्टन तराना और सहधर्मिणी डॉ. मीनाक्षी सखी के प्रति गहरी संवेदना तथा दिवंगत आत्मा को नैनीताल समाचार परिवार की विनम्र श्रद्धांजलि!































