“राहुल जी नमस्कार। मैं ममता सिंह, अमेठी से।
आपने एक शिक्षक की खबर डाली थी न, जो बच्चों को हवाई यात्रा कराते हैं? मेरे बच्चे भी घूम आए।”
साथ में कुछ तस्वीरें थीं।
मैसेज मैंने पढ़ा। फिर दोबारा पढ़ा।
13 बच्चे। 3 रसोइया चाचियां। कुछ वालंटियर्स। दिल्ली की फ्लाइट।
‘यह सरकारी योजना से नहीं है,’ उन्होंने लिखा था।
मेरी जब फोन पर बात हुई तो मैंने कहा, ‘आपकी कहानी फिल्मी लगती है।’
वह मुस्कुराईं। मैंने कहा, ‘मैं पत्रकार हूं। ऐसी बातों पर आसानी से यकीन नहीं करता। कोई न कोई स्वार्थ जरूर होगा।’
जवाब आया ‘मेरा स्वार्थ बहुत बड़ा है, राहुल जी।’
फिर उन्होंने वो कहानी सुनाई, जिसे मैं अब आपको सुना रहा हूं।
अमेठी जिले के भादर ब्लॉक में एक गांव है, नारायणपुर अग्रेसर।
वहां एक सरकारी स्कूल है, यूपीएस नारायणपुर।
2021 में, जब ममता सिंह यहां प्रधानाध्यापिका बनकर आईं, तो स्कूल में सिर्फ 9 बच्चे थे।
उससे पहले के 11 सालों में, 2010 से 2021 तक, कुल 96 बच्चे ही दर्ज हुए थे
यानी हर साल औसतन 10। साल भर की कंपोजिट ग्रांट-सिर्फ 10 हजार रुपए।
फिर कुछ बदला।
2021 में 19 बच्चे आए। 2022 में 52। 2023 में 69। 2024 में 102। 2025 में 130। अब, 2026 में 135 बच्चे, औसत उपस्थिति 92%।
पैसे कहां से आए, किसी सरकारी फाइल में नहीं लिखा।
ममता सिंह ने अपनी तनख्वाह से, परिवार से, दोस्तों से जोड़कर लगभग डेढ़ लाख रुपए स्कूल में लगाए।
गांव के कुछ युवा वालंटियर बने, बिना वेतन, बिना शर्त।
आज उस स्कूल में सोलर पैनल हैं, इनवर्टर है, कंप्यूटर-लैपटॉप-प्रोजेक्टर-स्मार्ट टीवी हैं।
पीने का साफ पानी, वाटर फिल्टर और आरओ से।
हर क्लास में पंखे, लाइट, फर्नीचर।
बच्चों के लिए सोलर लैंप, एक भरी-पूरी लाइब्रेरी, एक साइंस लैब।
लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट, सैनिटरी पैड, इंसिनरेटर।
सीसीटीवी, एक सिक रूम, हर बच्चे का जन्मदिन मनाया जाता है।
हेड गर्ल और हेड बॉय, वोटिंग से चुने जाते हैं। पूरा परिसर प्लास्टिक-मुक्त है, और जेंडर-न्यूट्रल भी।
इतना ही नहीं। स्कूल से इतर, अपने घर के गैरेज को बड़ी लाइब्रेरी में तब्दील करवा दी।
इसमें चाचाजी जिन्हें वह ‘बाबू’ कहती हैं, भैया जिन्होंने हर कदम पर साथ दिया, का पूरा सहयोग रहा।
गैरेज को लाइब्रेरी बनाने के लिए रंगाई पोताई से लेकर टाइल्स बिछाने तक। वहां स्कूल के बच्चों के साथ दूर-दूर से बच्चे पुस्तक ले जाते हैं।
और नतीजे-खुद बोलते हैं।
एनएटी परीक्षा 2022 में ब्लॉक में पहला स्थान। राष्ट्रीय आविष्कार अभियान में, लगातार चार साल, ब्लॉक में पहला और जिले में दूसरा स्थान।
इस साल चुनी गई एक छात्रा इसरो, अहमदाबाद जाने वाली है।
एक बच्ची सैनिक स्कूल की प्रवेश परीक्षा में चुनी गई।
एनएमएमएस परीक्षा में, 2023-24 में छह छात्र सफल, जिले में पहला स्थान, 2024 में पांच, 2025 में तेरह छात्र सफल
इनमें जिले में पहला और दूसरा स्थान दोनों इस स्कूल के पास।
“श्रेष्ठ” परीक्षा में चुने गए बच्चों को आगे चार साल तक, पांच लाख रुपए तक की सरकारी मदद मिलेगी।
स्पेल बी प्रतियोगिता में अमेठी-सुल्तानपुर क्षेत्र में तीसरा स्थान।
ज्ञान कुंभ में तहसील स्तर तक चार बच्चे। मीना मंच में मंडल स्तर तक भागीदारी।
जापान से प्रोफेसर हिदेयाकी इशीदा, लंदन से प्रोफेसर फ्रांसेस्का ओरसिनी
शिक्षा, विज्ञान, थियेटर, फिल्म, संगीत, कला, साहित्य से जुड़े 150 से ज्यादा लोग इस स्कूल आ चुके हैं।
और इसी स्कूल तक, आज भी कोई पक्की सड़क नहीं है।
14 साल पहले, गांव के कुछ लोगों ने स्कूल बनाने के लिए अपनी जमीन दान की थी।
स्कूल बन गया। सड़क नहीं बनी। बारिश में बच्चे कीचड़ और पानी से होकर स्कूल आते हैं।
खेल का मैदान भी नहीं है। सरकारी अनुदान और राशन, दोनों सीमित हैं।
फिर भी, दुनिया के दूसरे कोने से लोग यहां पहुंच रहे हैं।
ममता सिंह ने एक बात कही, जो मुझे सबसे ज्यादा रुक गई।
स्कूल में मिड-डे मील बनाने वाली रसोइया चाचियां हैं
महीने के सिर्फ दो हजार रुपए मानदेय पर
सबसे ज्यादा मेहनत वाला काम करती हैं।
ममता कहती हैं, “मेरी कोशिश रहती है कि ये चाची लोग भी दुनिया देखें। इनका सम्मान बनता है।”
स्कूल में उनकी एक टैगलाइन है, “हम स्वाद पकाते हैं, और प्यार परोसते हैं।”
इसीलिए, जब 13 बच्चे दिल्ली घूमने गए
साथ में वो रसोइया चाचियां भी थीं।
और वो वालंटियर्स भी, जो बिना वेतन पढ़ाते हैं।
कुछ हफ्ते पहले मैंने एक और कहानी लिखी थी
तेलंगाना के एक सरकारी स्कूल के मास्टर मल्का रामकृष्ण राव की
जिन्होंने अपने एक छात्र पूर्णचंद्र से कहा था
“550 लाओ, आसमान दिखाऊंगा।”
पूर्णचंद्र 554 लाया। मास्टर जी ने अपनी जेब से टिकट कटाया।
ममता सिंह ने वो पोस्ट पढ़ी थी। कमेंट में लिखा था, “वाह, शानदार।”
और फिर, बिना किसी से कहे, उन्होंने अपने पूरे स्कूल के लिए वैसा ही, बल्कि उससे बड़ा, कुछ कर दिया।
कोई होड़ नहीं थी। कोई दिखावा नहीं।
बस, एक कहानी ने, दूसरी कहानी को जन्म दे दिया।
मैंने ममता सिंह से आखिर में पूछा, “इतना सब करने के बाद, आपको क्या मिलता है?”
उन्होंने जो जवाब दिया, उसमें न शिकायत थी, न दिखावा।
“मेरा स्वार्थ बहुत बड़ा है, राहुल जी। मेरा सपना है, इस बिना रास्ते वाले, कम संसाधनों वाले स्कूल के बच्चे
देश-विदेश की टॉप यूनिवर्सिटी में पढ़ें। ये अपने माता-पिता की तरह मजदूर न बनें।
इनके नाम से यह गांव, यह स्कूल, और हम सब जाने जाएं।
और कोई यह न माने कि सरकारी स्कूल में पढ़ना, मजबूरी में लिया गया फैसला था।”
मैं पत्रकार हूं। मेरा काम है सवाल पूछना, शक करना, हर दावे को परखना।
इस बार, हर सवाल का जवाब मिला। और कहीं कोई दरार नहीं दिखी।
जिस स्कूल तक सड़क नहीं है, वहां से निकलकर एक बच्ची इसरो जा रही है।
जिन हाथों को सिर्फ खाना बनाने के लिए जाना जाता था, वो हाथ अब हवाई जहाज की खिड़की से बादल छू रहे हैं।
कुछ लोग रास्ते का इंतजार नहीं करते।
वो खुद रास्ता बन जाते हैं।
आपकी जिंदगी में भी, किसी स्कूल में, किसी मोहल्ले में
कोई ममता सिंह रही होंगी? कोई एक शिक्षक, जिसने बिना किसी योजना के, बिना किसी श्रेय की उम्मीद के, अपने हिस्से से कुछ जोड़ दिया हो?
आज उन्हें याद करके उनके बारे बताइये।
सोशल मीडिया से साभार बरास्ता इस्लाम हुसैन































