भारत सिंह
हाल ही में ख़बर आई कि हैदराबाद में ‘फ़ील द जेल’ नाम से एक पहल की गई है। आप दो हज़ार रुपए ख़र्च कर 24 घंटों के लिए चंचलगुडा जेल के क़ैदी बनकर जेल में होना महसूस कर सकेंगे। जेल प्रशासन का कहना है कि इससे लोगों में जेलों और उनके प्रशासन के बारे में जागरुकता फैलेगी।
इस देश में जेलों और क़ैदियों की हालत इतनी दयनीय है लेकिन न कभी ये ख़बर सुर्ख़ियों में आती है और न ही लोगों में इसे लेकर जागरुकता है। देश की जेलों में 5 लाख से अधिक क़ैदी हैं। इनमें से 75 फ़ीसदी से अधिक विचाराधीन हैं। यानी उन क़ैदियों पर केस शुरू नहीं हुआ या उन्हें दोषी नहीं ठहराया गया है। जेल की बैरकों में क्षमता से 500% तक अधिक क़ैदी रखे गए हैं। ऐसी स्थिति और भीषण गर्मी में कोई बीमार पड़ जाए तो देश में औसतन आठ सौ क़ैदियों के लिए एक डॉक्टर है। हां, अगर कोई क़ैदी मानसिक संतुलन खो बैठे तो औसतन 20 हजार से अधिक क़ैदियों पर एक मनोवैज्ञानिक है। उत्तराखंड में तो तो जेल डॉक्टरों के 10 में से 9 पद रिक्त थे।
ये सब सरकारी आंकड़े हैं। जब इतने गंभीर आंकड़े भी लोगों को जागरूक या संवेदनशील नहीं बना सके तो जेल टूरिज़म जैसी पहलें क्या करतब करेंगी, देखना होगा।
दरअसल, हमारे यहां समस्याओं की जड़ों को समझने और उनके स्थायी समाधान विकसित करने के बजाय प्रतीकात्मक अभियानों और सतही उपायों पर अधिक ज़ोर दिखाई देता है। विकास के मॉडल और नीतियां भी अक्सर स्थानीय ज़रूरतों, सामाजिक परिस्थितियों और भौगोलिक वास्तविकताओं को समझे बिना अपनाई जाती हैं। जो चीज़ जहां सफल दिखी, उसे बिना पर्याप्त तैयारी और समझ के हर जगह लागू करने की कोशिश होने लगती है।
अभी देश के प्रधानमंत्री पद से प्राकृतिक संसाधनों को बचाने समेत कई अपीलें की गईं। इसमें एक अपील सार्वजनिक परिवहनों के इस्तेमाल पर भी थी। क्या सार्वजनिक परिवहन के इस्तेमाल के लिए देश के आपात स्थिति में पहुंचने का इंतज़ार करना चाहिए? इसमें भी यह भी कमाल की बात है कि चार महीने पहले तक जब देश की राजधानी दिल्ली और आसपास के इलाकों में वायु प्रदूषण ख़तरे के गंभीरतम निशान को भी पार कर गया, तब देश के किसी भी बड़े संवैधानिक पद की ओर से ऐसी सार्वजनिक अपील नहीं सुनी गई।
ऐसा शायद इसलिए नहीं किया गया कि ऐसी अपीलों से बाज़ार का मूड न बिगड़ जाए। जो कि अभी देखने को मिल रहा है। वैश्वीकरण के इस दौर में राजनीति, अर्थव्यवस्था, समाज या विकास के सवाल स्वतंत्र या अछूते नहीं रह गए हैं। लेकिन हमने वैश्विक विकास मॉडलों को अपनाने से पहले अपनी सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक ज़रूरतों को समझने की गंभीर कोशिश ही नहीं की। जो चीज़ जहां सफल दिखाई दी, उसे बिना पर्याप्त तैयारी और समझ के हर जगह लागू करने का प्रयास होने लगा। इसके उदाहरण आज लगभग हर शहर में देखे जा सकते हैं।
हाल ही में एक और ख़बर आई कि भोपाल शहर में मेट्रो चलाने का रोज़ाना ख़र्च 8 लाख रुपए और कमाई मात्र 15 हज़ार रुपए है। पहली नज़र में यह लग सकता है कि सार्वजनिक परिवहन केवल कमाई के लिए नहीं चलाए जाते। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या भोपाल को वाकई मेट्रो की ज़रूरत थी?
आज देश के लगभग 25 शहरों में मेट्रो रेल चल रही है, लेकिन मुश्किल से चार-पांच महानगरों को छोड़ यह कहीं भी सार्वजनिक परिवहन का प्रमुख साधन नहीं बन पाई है। बनेगी भी कैसे? बाक़ी शहरों में न तो रोज़गार के इतने अवसर हैं और न ही लोगों की आवाजाही दिल्ली जैसी है। कई जगह आवागमन के अन्य साधन अधिक सुलभ और सस्ते हैं। इसके बावजूद नीति नियंता एक ही विकास मॉडल को उठाकर हर जगह थोपना चाहते हैं, ताकि उनके कामों की फ़ेहरिस्त में कुछ तो दिखे।
कमोबेश यही हाल हमें उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में देखने को मिलता है। यहां ऑलवेदर रोड बनाकर गर्वोन्मत हुए तंत्र के हाथ-पांव एक बारिश और भूस्खलन पर फूल जाते हैं। हिमालय दुनिया की सबसे नयी और सबसे कमज़ोर पर्वतमाला है। यह तथ्य हमें तो कभी किसी पाठ्यक्रम में नहीं पढ़ाया गया और न ही कभी समाचार माध्यमों में आया और सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बना। फिर समाज में हिमालय के प्रति संवेदनशीलता कैसे विकसित होगी?
वर्ष 2023 के अंत में सिलक्यारा टनल हादसे में लोग आधे महीने से अधिक समय तक अंदर फंसे रहे। तब सड़क व परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा था कि हम हिमालय को महाराष्ट्र और दक्षिण रज्यों के चट्टानी पठार जैसी पर्वतमाला समझते थे। लेकिन हिमालय की संरचना हर जगह अलग है। 2014 से इस पद पर रहे माननीय को हिमालय की इस मूलभूत विशेषता को समझने में दस साल लग गए तो आमजन से क्या उम्मीद रखी जा सकती है।
इसी तरह से बहुप्रचारित ‘स्वच्छ भारत अभियान’ या ‘नमामि गंगे’ को ही देख लीजिए। हमने आधुनिक शहरों का बाहरी मॉडल तो अपना लिया, लेकिन इसके लिए ज़रूरी ढांचागत सुविधाएं विकसित ही नहीं की। गेटेड रिहाइशों का सीवेज बाहर खुले नाले में गिरता है। गेट के भीतर की सफ़ाई कर कूड़ा बाहर डाल दिया जाता है। हमारे शहर गंदगी, बदबू और ट्रैफ़िक से दबे है। ऊंची इमारतें और चौड़ी सड़कें बना देने भर से शहर बसाने की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। इन शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की गंदगी बिना ट्रीट हुए नालों में और वहां से होते हुए नदियों में जा रही है। ऐसे में न शहर साफ़ रहेंगे और न नदियां।
हम लंदन का उदाहरण देख सकते हैं। यह शहर भी हमेशा योजनाबद्ध तरीक़े से नहीं बसा, लेकिन इसने समय के साथ अपनी व्यवस्थाओं को विस्तार और ज़रूरतों के अनुरूप ढाला। आज वहां मेट्रो, लोकल व नेशनल ट्रेन सिस्टम, अंडरग्राउंड ट्यूब सिस्टम, ओवरग्राउंड लाइट रेल, ट्रैम, हाईस्पीड रेल, बस सेवा, हवाई यातायात सब आपस में कनेक्टेड हैं। यात्री सभी ट्रेनों और बसों में एक ही कार्ड से सफ़र कर सकते हैं। इसी तरह से लंदन ने टेम्स नदी को भी योजनाबद्ध कोशिशों से पुनर्जीवित किया। अब हम अपने-अपने शहरों से इसकी तुलना करें और सोचों कि हमारे पास सिर्फ़ अभियानों की तुलना में संरचनात्मक सुधार कितने दिखाई देते हैं।
इसलिए हमारे देश में जेलों की दुर्दशा पर विमर्श नहीं होता और जेल की दुर्दशा काटने के लिए 2 हज़ार रुपए देकर 24 घंटे जेल में रहने जैसी ख़बरें आकर्षण पैदा करती हैं। सार्वजनिक परिवहन को मज़बूत बनाने के बजाए विकास मॉडल कॉपी-पेस्ट किए जाते हैं। पर्यावरणीय संकटों पर दीर्घकालिक रणनीति के बजाए तात्कालिक उपाय नज़र आते हैं। औद्योगिक और बिजनेस लॉबी को नाख़ुश करने का ख़तरा नहीं उठाया जाता। हमने विकास के बाहरी प्रतीकों को अपनाने में अधिक रुचि दिखाई, लेकिन उनके पीछे की सामाजिक, प्रशासनिक और संरचनात्मक ज़रूरतों को समझने और विकसित करने में नहीं।

































