राजीव लोचन साह
उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था अपने न्यूनतम स्तर तक पहुँच गई है। पृथक उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौर में कौन सोच सकता था कि यह पहाड़ी राज्य अपने गठन के पच्चीस सालों के भीतर ऐसी हालत में पहुँच जायेगा ? साम्प्रदायिक घृणा के कारण होने वाली घटनायें तो खैर सत्ताधारी दल की रणनीति का ही एक हिस्सा हैं, जिसका मानना है कि जितनी अधिक ये घटनायें होंगी, उतना ही ज्यादा साम्प्रदायिक आधार पर होने वाला ध्रुवीकरण बढ़ेगा और उसकी बहुसंख्यकवाद की राजनीति परवान चढ़ेगी। इस सोची-समझी रणनीति का उसे फायदा मिल भी रहा है, लेकिन इसके दीर्घकालिक प्रभाव इस देश के लिये कितने खतरनाक होंगे, इसकी चिन्ता सत्ताधारी दल को नहीं है। इसका फौरी प्रभाव तो यह दिखाई दे रहा है कि पुलिस ऐसी साम्प्रदायिक घृणा के आधार पर होने वाली घटनाओं को अनदेखा कर रही है। मगर इससे उसकी सांवैधानिक दायित्व निभाने की कार्यक्षमता भी नष्ट हो रही है। अन्य अपराधों में भी वह उस तत्परता से काम करने में असफल दिखाई देती है, जिसकी उससे उम्मीद की जाती है। हाल के वर्षों में महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा की तथा सामान्य नागरिकों पर पुलिस अत्याचार की घटनायें बहुत तेजी से बढ़ी हैं। पुलिस एक तरह से निश्चिन्त दिखाई देती है कि जिस तरह उसे नफरती घटनायें होने देने की छूट मिली है, उसी तरह की छूट अन्य अपराधों में लापरवाह होने की भी मिल गई है। जिन अपराधों में सत्ताधारी दल का कोई व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से शामिल होता है, उस ओर तो वह ध्यान भी देती और यदि ऐसी घटनायें जगजाहिर हो गयीं तो उन पर लीपापोती करने लगती है। ताजा उदाहरण चम्पावत का है, जहाँ एक बच्ची के साथ कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना सामने आयी, मगर प्रारम्भ में सत्ताधारी दल के नेता को अपराधी मानने के बाद कुछ ही घंटों में पुलिस ने अपने बयान पर लीपापोती शुरू कर दी, बगैर यह सोचे हुए कि इससे गरीब घर की एक छोटी सी बच्ची पर क्या गुजरेगी।

































