राजीव लोचन साह
‘पहाड़’ द्वारा अन्य संस्थाओं के सहयोग से चेतराम साह ठुलघरिया इंटर काॅलेज के सभागार में लगाई गयी चित्रकला प्रदर्शनी नैनीताल की एक दुर्लभ और यादगार अकादमिक-सांस्कृतिक घटना है। आज से लगभग 170 वर्ष पूर्व, जब भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी का शासन था, कम्पनी के निमंत्रण पर जर्मनी से तीन सर्वेक्षक भाई भारत आये। इन स्लागिनवाईट बन्धुओं, राॅबर्ट, हरमन और एडोल्फ, जो भूगोलवेत्ता, फोटोग्राफर और चित्रकार थे, को भारत के सर्वेक्षण की जिम्म्ेदारी सौंपी गयी थी। यह कठिन वक्त था। रेल भारत में पहुँची ही थी और कैमरा भी अपने एकदम प्रारम्भिक रूप में था। तमाम मुश्किलों और चुनौतियों के बीच उन्होंने अपना काम किया।
स्लागिनवाईट बन्धु 1854 से 1857 तक भारत में रहे और मुख्यतः उन्होंने हिमालयी क्षेत्र में सर्वेक्षण का कार्य किया। तीन वर्ष तक लगभग 28,000 मील की यात्रा कर उन्होंने अपने अभियान को सम्पन्न किया। उन्होंने फोटो खींचे, चित्र बनाये और जानकारियाँ एकत्र कीं। हिमालय में उनका कार्य नैनीताल से शुरू हुआ और वे आज के पूर्वोत्तर राज्यों तक पहुँचे। इस बीच भारत में प्रथम स्वतंत्रता संगाम शुरू हो जाने के कारण उन्हें वापस लौटना पड़ा। उन्होंने ‘रिजल्ट आॅफ अ साईंटिफिक मिशन टु इंडिया एंड हाई सी’ नाम से अपनी रिपोर्ट तैयार की। मगर भारत का साम्राज्य ईस्ट इंडिया कम्पनी के हाथ से निकल कर ब्रिटेन की रानी के हाथों में जाने की राजनैतिक उथल-पुथल के बीच उनके द्वारा एकत्र गई बहुमूल्य सामग्री और बनाई हुई पेंटिग्स जर्मनी तक ही सीमित रह गई। बाद में इन्हें वहीं के ‘अल्पाईन म्यूजियम’ में रख दिया गया, जहाँ वे भारतवासियों की आँखों से लगभग ओझल रहीं।प्रख्यात भारतीय सर्वेक्षक पंडित नैनसिंह पर ‘एशिया की पीठ पर’ किताब लिखने के दौरान इतिहासकार और ‘पहाड़’ के संस्थापक प्रो.शेखर पाठक शोध करते हुए स्लागिनवाईट बंधुओं तक पहुँचे, क्योंकि पंडित नैन सिंह ने अपना कैरियर स्लागिनवाईट बंधुओं के अभियान में एक साधारण कुली के रूप में ही शुरू किया था। वर्ष 2015 में प्रो. शेखर पाठक को बर्लिन की एक संगोष्ठी में स्लागिनवाईट बंधुओं के काम को विस्तार से जानने का और उनकी पेंटिग्स को प्रत्यक्ष देखने का मौका मिला। तब से ही उनका प्रयास था कि ये पेंटिग्स भारत आयें और यहाँ भी लोग इन चित्रों के माध्यम से आज से 170 वर्ष पूर्व के हिमालय को जानें। दस वर्षों तक उनके और उनके जर्मन मित्रों के अनथक प्रयास के बाद अन्ततः पिछले महीने इनमें से 77 चुनिन्दा पेंटिग्स भारत पहुँचीं। जर्मनी से प्रो. क्रुटजमन और सबीने फेल्मी इन्हें अपने साथ लेकर आये।
ये अद्भुत पेंटिग्स पहले प्रदर्शनी के रूप मंे दिल्ली के इंडियाइंटरनेशनल सेंटर में प्रदर्शित की गयीं और फिर देहरादून की दून लाइब्ररी एंड रिसर्च सेंटर में। 12 मई से 18 मई तक इनकी प्रदर्शनी चेतराम साह ठुलघरिया इंटर काॅलेज के सभागार में लगाई गयी है। नैनीताल के चाइना पीक से नैनी झील के विहंगम नजारों से लेकर, कश्मीर की डल झील, अनेक हिमालयी ग्लेशियरों और खासी हिल्स तक की ये मनोरम पेंटिग्स दर्शकों को मंत्रमुग्ध तो करती ही हैं, महत्वपूर्ण जानकारियाँ भी प्रदान करती हैं।
12 मई की शाम इस प्रदर्शनी का उद्घाटन समारोह सी.आर.एस.टी. के जगदीश साह सभागार में हुआ, जिसकी अध्यक्षता उत्तराखंड हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति रवीन्द्र मैठाणी ने की। इस अवसर पर प्रो. हरमन क्रुटजमन ने स्लागिनवाईट बंधुओं के जीवन, उनके किये गये काम और भारत में उनके अभियान के बारे में विस्तार से जानकारी दी। प्रो. शेखर पाठक ने कुली से विश्वविख्यात सर्वेक्षक बनने वाले पंडित नैनसिंह मंडल के बारे में बतलाया। कार्यक्रम का संचालन कविता उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर आयुक्त कुमाऊँ दीपक रावत, कुमाऊँ विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. दीवान सिंह रावत, नगरपालिका परिषद् नैनीताल की अध्यक्ष सरस्वती खेतवाल, साहित्यकार डाॅ. लक्ष्मण सिंह बिष्ट ‘बटरोही’, रंगकर्मी जहूर आलम, प्रो. अनिल बिष्ट, अनूप साह, आलोक साह के साथ नैनीताल के सैकड़ों प्रबुद्ध नागरिक और जिज्ञासु विद्यार्थी मौजूद थे।

































