अग्नि उपदेश
भिख्खुओ
सब कुछ जल रहा है …!
मठ जल रहा है
सुत्त जल रहे हैं
त्रिपिटक जल रहा है
जल रहे हैं शब्द
अर्थ जल रहे हैं उनके
प्रेम जल रहा है,करुणा जल रही है
सद्गुण जल रहे हैं, मैत्री जल रही है
जल रहा है ज्ञान,तर्क जल रहा है
पिघल कर बह रहा है विवेक का लावा
शांति जल रही है, प्रज्ञा जल रही है
जीवन जल रहा है
निर्वाण जल रहा है
जल रहे हैं अंतःवासी
धम्म जल रहा है…
फहर रही है मनु की पताका
मगध जल रहा है
सब कुछ जल रहा है
मठवासियो!
आँखें जल रही हैं
दृश्य जल रहे हैं
दृश्य में बसी दुनिया जल रही है
दुनिया में बसे स्वप्न जल रहे हैं
स्वप्नों में बसे विचार… भाग रहे हैं
छप्पर सिर पर उठाए …
छप्पर से टपक रही हैं अग्नि बूंदें
अग्नि बूंदों से धरती के अंकुर जल रहे हैं
संभावनाएं झुलस चुकी हैं
उत्तरा के गर्भ पर गिरा है ब्रह्मास्त्र
अश्वत्थामा का
अजन्मे बच्चे जल रहे हैं
सब कुछ जल रहा है
भंते!
देह जल रही है, चीवर जल रहा है
भिक्षा पात्र जल रहा है
पात्र में पड़ा अन्न जल रहा है
उदर में तलझती भूख जल रही है
कंठ में तड़पती प्यास जल रही है
प्यास में बंदी चित्त जल रहा है
चित्त में जल रही है स्मृति
विस्मृति में भटक रही है बुद्धि
जन्म जल रहा है
पुनर्जन्म जल रहा है
गुरु जल रहे हैं, शिष्य जल रहे हैं
जल रहे हैं आलारकालाम और रामपुत्र
जल रही है सुजाता, जल रहा है आनंद …
कोसल, मथुरा, वज्जि,राजगृह,सारनाथ जल रहे हैं
जल रहा है कुशीनगर
नीरांजना और हिरण्यवती का पानी जल रहा है
गया जल रही है
जल रहा है बोधिवृक्ष
बोधिवृक्ष के नीचे बैठे तथागत जल रहे हैं
समाधि जल रही है
सब कुछ जल रहा है
साधको!
संध्याकाश में चमक रही है
पुष्यमित्र की तलवार
वीथियों में फैला रक्त जल रहा है…
स्थविर जल रहे हैं, जल रहे हैं जातक
संगीति जल रही है,परिषदें जल रही हैं
अशोक जल रहा है
जल रहा है महेंद्र, जल रही है संघमित्रा
शालवन जल रहा है
जल रहे हैं बोधिसत्व
सत्य जल रहा है
मार ने अपनी सेना के साथ घेर लिया है
पूरे नगर को
तूफान नाच रहा है,पाखंड नाच रहा है
आकाश से हो रही है राख की वर्षा
अंधेरा खंजरों की तरह बरस रहा है
कन्या मेध को निकले
पामरों के अट्टहास से कांप रहा है पाटलिपुत्र
जल रहा है साकेत
श्रावस्ती जल रही है
जैतवन में एक वृक्ष से लिपटी
अहिंसा जल रही है
विहार जल रहे हैं
स्तूप जल रहें हैं
प्रवज्या जल रही है
चारिकाएं जल रहीं हैं
बुद्ध जल रहे हैं…
विधान जल रहा है
नागरिको!
राष्ट्र जल रहा है
जल रहा है धम्मचक्र
मुक्ति जल रही है, समानता जल रही है
न्याय जल रहा है
भविष्य जल रहा है
मातंग की हो रही है भीड़ हत्या,
आम्रपाली बलात्कारियों से बचकर भाग रही है
वैशाली की सड़कों पर…
भूख से पीड़ित हो
अपनी बच्ची को बेच रही है गौतमी
कपिलवस्तु के प्रासादों के सामने
आमात्य बलात्कारी हैं
मंत्री हत्यारे हैं
विदूषक हैं पुरोहित
राजा स्वेच्छाचारी है…
खेतों में
फसलों के साथ जल रहे हैं किसान
त्रिशूलों पर उछाले जा रहे हैं दासों के शीश
अंगुलिमाल जल रहे हैं…शरण जल रही है
दया जल रही है
सब कुछ जल रहा है
मुक्तिकामियो!
सारा आर्यावर्त घृणा की आग में
धू धू कर जल रहा है।
हमारी साधना कब जागेगी अनात्मो!
हम कब करेंगे अग्निमंथन…
अग्नि को निचोड़कर बादल कब बनाएंगे
हमारा वर्षावास कब होगा…
बादल जल रहे हैं
हरीतिमा जल रही है।
नग्न पद्य
नग्न!
सर्वस्व नग्न
सर्वांग नग्न
देह नंगी
आत्मा नग्न
व्यक्तित्व नग्न
चरित्र नग्न
आपदमस्तक राष्ट्र की तरह नग्न !
शिराओं में पीव की तरह बहते
धर्म की तरह नग्न
फूत्कारते हुए लिंग की तरह नग्न
टपकते हुए विष की तरह नग्न
हिंसा की तरह नग्न
प्रतिहिंसा की तरह नग्न
घृणा की तरह नग्न
द्वार द्वार छापे जा रहे रक्त की तरह नग्न
नग्नता के उल्लास की तरह
नग्नता के जयघोष की तरह
Ak 47 की तरह नग्न
वर्दियों की तरह बरहना
शौर्य चक्रों की तरह नग्न
अतीव नग्न
अदभुत नग्न
अपूर्व नग्न कांचन नग्नता
मंत्री के स्वर्ण दंतों की चमक सा नग्न
नगर सेठ की वृद्ध वासना सा नग्न
महामात्य की जिव्हा से टपकते
वीर्य की तरह नग्न
मनुष्य के रेवड़ों की तरह नग्न
निर्वयक्तिक
निचाट
निर्वसन
लपलपाती तलवार सा नग्न
दांत से टपकते मंत्रों की तरह नग्न
जलती हुई झोपड़ियों के अग्निहोत्र सा नग्न
समिधा सा नग्न
लोलुप यजमान सा नग्न
हिंसक याज्ञिक की तरह नग्न
यज्ञ सा नग्न, स्वाहा सा नग्न
संस्कृति सा नग्न
सभ्यता सा नग्न
नग्नता का गौरव धारण करता
सत्ता सा नग्न ……….
अपरिमित नग्न
अपार नग्न
अपरंपार नग्न
लोकतंत्र के मुंह पर गाली सा नग्न
खून के थक्कों पर बने
बूट के निशान की तरह
बेशर्म
और नग्न!
हम सब कटुए हैं
हम सब कटुए हैं
आमात्य!
अपने कटे हुए सर
कटी हुई बाहें
कटे हुए पैर
और क्षत विक्षत आत्माएं लेकर
हम भटक रहें हैं
हम कातर कबंध ……..
हम सब कटुए हैं
राजन!
हम उस मां के कटे हुए सर हैं
जिसे पातकी पितृत्व की
मदिरा से चूर
पाखंडी परशु ने
धड़ से अलग कर दिया था
हम अधूरे धड़ से
मां के कटे हुए शीश के कल्ले
माटी में बोते हैं …..
हम सब कटुए हैं
राजपुरूष!
हम उस तापस कुमार के भूलुंठित शीश हैं
जिसे खोखली मर्यादा की म्यान से निकाली गई
और जाति दर्प से विष बुझाई तलवार ने
काट दिया था……….
जिसे किसी ने नहीं सुना
और जो अट्टहास गूंजता है हमारी संस्कृति कंदराओं में
हम उस कटे हुए शीश के अट्टहास हैं……..
हम सब कटुए हैं
राजदंडाधिकारियो!
हम युगों युगों से
उस युवती की रक्त स्रावित नाक हैं
जिसे पुरुष के अहम ने
जिसे राज पुरुष दंभ ने काट दिया था
हमारी नककटी सभ्यता उस युवती के रक्त में
स्नान कर रही है और डुबकी मार
अपना ईश्वर खोज रही है
हम सब कटुए हैं
चक्रवर्ती !
हम उस योद्धा का कटा हुआ अंगूठा हैं
जिसे एक कपटी गुरुता ने काट लिया था
और फिर लगातार कटते रहे अंगूठे
कटते रहे सर
कटती रहीं बांहे
कटती रही उंगलियां
देखो आक्षितिज बिखरे हैं कटे हुए अंगूठे
देखो उन कटे हुए अंगूठों के निशान ले रही है मंत्रिपरिषद
देखो उन कटे हुए अंगूठों की माला पहन रहे हैं महामात्य
हम सब कटुए हैं
अभिजात्यो !
हम सब कटुए हैं और बहुमत में हैं
हम खड़े हैं
इतिहास के राजपथों पर
अपनी कटी हुई पहचान हथेलियों पर सजाए
आप इस देश को छोड़ें सम्राट
अपने नवनीत वदन और संपूर्ण कलेवर के साथ
ये देश हमारा है
ये आर्यावर्त कटुओं का है।
फ़लस्तीन कैसे बनता है
ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं ।
तबाहकुन अस्पतालों में
इंक्यूबेटर्स में पड़े
नकली सांसें खींचते हुए
हजारों टन मलबे के
नीचे दबे
झरोंखों से देखते
बाबिल के परिंदों की उड़ान
गाते हैं आज़ादी का नग़मा
आज़ादी का नग़मा कैसे बनता है
बाबा दरवेश !
आज़ादी का नगमा
बच्चों के ख़ून
और बाबिल की परवाज़ से बनता है जान !
ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं।
माएं रोती हैं
मरियम की तरह
ख़ूनआलूदा जिस्म
ईसा का
सीने से लगाए
मिसाइलों से टकराता है विलाप !
विलाप कैसे बनता है
बाबा दरवेश!
विलाप तब बनता है
जब फूल क़त्ल किए जाते हैं
और कविताएं नंगी घुमाई जाती हैं
बच्चो!
ग़ज़ा में बच्चे
शहादत का रियाज़ कर रहे हैं।
बाप रोते हुए
सामूहिक क़ब्रों में अपने खून की शिनाख़्त करते हैं
बच्चों के क्षत विक्षत चेहरों में ढूंढते हैं
फ़लस्तीन का नक्शा !
फ़लस्तीन कैसे बनता है
बाबा दरवेश !
फ़लस्तीन फटी हुई कबाओं
और टूटे हुए जूतों से बनता है
फ़लस्तीन के बच्चो !
आज जितने जैतून के पेड़ कट रहे हैं
कल हमारे देस में उतने बच्चे खिलखिलाएंगे
आज जितने बच्चे शहीद हुए हैं
कल उतने जैतून के पेड़ उग आयेंगे
फ़लस्तीन को हरियाली से भरते हुए
उस दिन
मैं भी एक जैतून का पेड़ बन कर फिर से जन्म लूंगा।
हम कविताएं हैं !
हम कविताएं हैं
धर्मराज !
आपकी विगलित स्वर्ग कामना के कुत्ते नहीं
जो उच्छिष्ठ अमरता के टुकड़ों की लालच में
दुम हिलाते
आपके पीछे चले आयें ।
हम कविताएं हैं धर्मराज …..
आपकी जुआरी नैतिकता के रजस्वलित पांसे नहीं
जिन्हें आप चौसर की फड़ पर नग्न
चक्कर काटने पर मजबूर कर दें ।
हम कविताएं हैं
धर्मराज !
हमारे अपने नंदित नरक हैं
हमारी अपनी क़ैद ए तनहाई
वक़्त के वायदा माफ़ गवाहों की छली हुई
हमारी अपनी उम्र क़ैदें हैं:
हमारे अपने मर्त्य स्वप्न हैं और निहत्थे युद्ध
हमारे पास यक्ष नहीं है प्यास को आध्यात्मिक प्रश्न में तब्दील करता हुआ
हमारे पास ख़ालिस प्रश्न हैं
तालुओं में प्यास की तरह उगते हुए
हम आपके धार्मिक असत्य पर सर नहीं झुकाएंगे
हम सांस्कृतिक अर्धसत्य के हाथों हताहत नहीं होंगे
हम निरपराध कातर कुंजर नहीं
हम कविताएं हैं धर्मराज !
बच्चों के मासूम खून में डूबा हुआ
आपका विनम्र युद्धोन्माद है
साम्राज्य की लालसा को
धार्मिक कर्तव्य बताने वाले योगेश्वर
आपके पास हैं
अंगूठों के काटने का निमित्त बनते
निर्मम पार्थ का लाघव है
असमय सूर्य अस्त करने का धूर्त
इंद्रजाल है….
सब कुछ आपके पास है
हमारे पास अपने नंदित नरक हैं
दलदल में धंसे हुए रोटी के पहिए हैं
हमारी अपनी निर्कवच असुरक्षा है
हमारा पददलित अभिमान है
हमारे अपने खांडव वन है…..
त्राहिमाम त्राहिमाम की आर्त करुणा है
हमारे अपने अंडा सेल हैं
हमारे अपने गौरी लंकेश और कलबुर्गी हैं
हमारे अपने उमर ख़ालिद और गुलफ़िशा हैं
और लोकतंत्र का सनातन कारागार है।
हम कविताएं हैं धर्मराज
आपकी कायर वीरता का छद्म नहीं…..
आपको आगाह करने का दुस्साहस करती कविताएं
ईश्वर होने की माया रचता धर्म हमेशा साथ नहीं देता
मारा जाता है
किसी रोज़
किसी नामालूम बहेलिए के हाथों।
बिल्किस बानो के अजन्मे इंसाफ़ की ओर से
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
उस दिन
जब मारे जा रहे थे तुम्हारे अपने
और तुम्हारा शरीर
धार्मिक मर्दानगी के तले
रौंदा जा रहा था…
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
जनमने के इंतज़ार में
दुनिया में
अपनी जगह पाने के इंतज़ार में…
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
दुनिया का हिंसक अंधेरा
तुम्हारे भीतर के गुनगुने मुलायम अंधेरे को
चीर रहा था,
तुम बेसुध थीं
और हम चीख रहे थे
कातर आर्त स्वर में…
” हमें जीने दो
हमें जनमने दो
हमें रहने दो…”
हम तुम्हारी कोख में थे अम्मी!
हमारी संभावनाओं के दरवाजे पर
धर्म खड़ा था शस्त्र लिए
राष्ट्र खड़ा था बहुमत लिए
मर्द खड़े थे कायरता लिए
हमारे जन्म का वक्त टलता रहा
हमारे जन्म की तारीख़ टलती रही
हमारे जन्म का मुहूरत टलता रहा…
हम अजन्मे वयस्क हो गए
बीस साल बिल्किस बानो
बी s s s स सा s s s ल
हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी…!
जनम का इस्तखारा करते हुए _
बीस साल में
बदल जाती हैं पीढ़ियां
बीस साल में
बदल जाती हैं सरहदें
बीस साल में
बदल जाते हैं मुल्क
बीस साल में
नहीं बदली तो हमारी क़िस्मत।
बस जगह बदली
खेत की जगह
इस बार बलात्कार हुआ अदालत में
बलात्कारियों की जगह इस बार न्यायाधीश थे…
हमारे जनम की तारीख़ फिर टल गई
हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी!
कोख में ही वयस्क हुए
कोख में ही बूढ़े होंगे क्या
और क्या कोख में हो जायेंगे दफ़्न
हमें जनम दो अम्मी
कोख से न सही
आंखों से बहते रक्त से ही सही…
हम तुम्हारी कोख में हैं अम्मी!

































