मृगेश पांडे
उत्तराखंड के आय-व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है कि क्या यह पुलिंदा पहाड़ की खेती, छोटे उद्योग व स्थानीय आर्थिकी को संरचनात्मक आधार प्रदान करता है या फिर मात्र घोषणाओं का बजट है? क्यों विकास की दिशा और प्राथमिकताएँ आम लोगों की अपेक्षाओं से मेल नहीं खा रही हैं? बजट सिर्फ प्रबंधन का दस्तावेज बन कर रह जाता है, क्यों इसे परिवर्तन का रोडमैप बनाने का जतन कमजोर पड़ जाता है? आप इसे घोषणाओं का दस्तावेज भी कह सकते हैं। यह बजट भी कमोबेश दिखने वाली परियोजनाओं पर आधारित है न कि उन सेवाओं पर जिनका सीधा लाभ आम जन को मिलता है, जिसमें सरकारी अस्पताल, सार्वजनिक परिवहन, पानी और बिजली के संस्थान व निगम और नई परेशानियों से जूझते स्कूल हैं।
उत्तराखंड के आधुनिकीकरण की बुनियाद तो तीर्थ पर्यटन की भीड़ और रियल स्टेट की सौदागरी से दाना-पानी खींच रही है तो यहाँ का विकास प्रारूप भी पर्यटन-निर्माण व सरकारी व्यय की वृद्धि से पुष्ट होता है। प्रशासनिक ढांचे को भी लेखे-वार ऐसी मदें मिलती हैं जिनमें रूटीन से हटकर उन्हें किसी निर्णय का जोखिम न लेना पड़े। सरकार ऐसा बजट इसलिए बनाती है क्योंकि बड़ी परियोजनाएँ राजनीतिक रूप से लोगों का मन मोह लेती हैं तो बाकी काम प्रचार-विज्ञापन के जिम्मे सौंप दिया जाता है जो स्वयं एक सेवा उद्योग बन चुका है।
उत्तराखंड की वर्तमान नीति इसे एक उपभोग अर्थव्यवस्था बनाने में तुली है जिसमें सैर-सपाटा, रेता-बजरी और सरकारी अमले का खर्चा है। सीएजी की रिपोर्ट साफ कहती है कि समस्या मात्र आगम की नहीं है बल्कि उत्तराखंड में खर्च का सामाजिक प्रभाव सीमित है क्योंकि योजनाएँ आकस्मिक व तदर्थ रूप से बनती हैं।
हर साल प्रकृति की मार से व्यय-विनियोग का ढांचा चरमराता है। फिर राज्य का कर्ज बढ़ा है। हर विभाग में पद रिक्त पड़े हैं, खास कर स्वास्थ्य-चिकित्सा में। परिवहन में भी जहाँ ड्राइवर-कंडक्टर नियमित नहीं हैं तो बिना फिटनेस के वाहन। डग्गामारी आम है और अनुबंधित बसों से सरकार को प्रायः आगम का ह्रास ही हासिल होता है। मनरेगा मजदूरी मिलने में देरी है। सूर्य रोशनी में राज्य ने आंशिक सब्सिडी बंद कर दी, अब घरेलू उपभोक्ता से खरीदी बिजली के दाम भी झटके से गिरा दो रुपये टिकाने का धोखा है। यह हिमनदों, पहाड़ और जंगलों से रिस बह आए पानी वाला जल विद्युत राज्य है जहाँ बिजली वितरण कंपनियों का घाटा बढ़ने, लाइनों के बार-बार क्षतिग्रस्त होने, मरम्मत लागत के बढ़ने और ग्रामीण क्षेत्रों व कस्बों में कटौती आम चलन है। मानसून में बिजली ढांचे का नुकसान भी बढ़ता जा रहा है। कंपनियों से बिजली खरीदने के क्रम में उसका भार उपभोक्ता पर पड़ता ही है। घरेलू 3 किलोवाट सोलर सब्सिडी पर राज्य अंशदान भी समाप्त है।
अब हर घर यानी जल जीवन मिशन की कागज पर बनी पाइपलाइन कितनों तक एक बूंद न टपका पाई, इसकी पड़ताल होनी बाकी है। पहले स्वजल के जलवे थे, अब इसकी कई योजनाओं में करोड़ों के हेरफेर की चर्चा है। जाँच भी जारी है। प्राकृतिक जल स्रोत का सूखना, नौले-धारे चुपटौल, खाल राज्य बनने के बाद और सूखे और ज्यादा उजड़े। गाँवों में पानी सारना, लकड़ी-घास लाना औरतों, बच्चों और बुजुर्गों के जिम्मे ही रहा। अब नया संकट उभर गया है। पहले बंदर-घूर-साही-सुअर खेत उजाड़ते थे तो अब तेंदुए व बाघ शहरी आबादी के पास आकर आदमखोर की श्रेणी में आ गए तो सड़कों पर हाथी। गाँवों में ऐसे आतंक और गाड-गधेरे पार कर स्कूल जाने के पहरे ने अपने परिवार गाँव से बाहर सुरक्षित कर पलायन का मन बना लिया है।
अमूमन तो उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था ब्रिटिश काल से ही पलायन आधारित समायोजन पर चल रही है। लोग बाहर जाते, कमाते रहे। परिवार को धन भेजते रहे। अब यह संतुलन हाल से उभरे युद्ध व उपजे वैश्विक संकट से टूटता है तो राज्य को भी अपनी आर्थिक नीतियों में फेरबदल करना पड़ेगा। उत्तराखंड की विपुल श्रमशक्ति खाड़ी देशों में काम करती है। पश्चिमी एशिया की अस्थिरता व तनाव का असर सीधे उन प्रवासी श्रमिकों पर पड़ने लगा है जो यूएई, सऊदी अरब, कतर व अन्य देशों में लगे हैं। बड़ी संख्या में इनके वापस आने पर राज्य के सामने सामाजिक पुनर्समायोजन के साथ उनके द्वारा प्रेषण धनराशि की कमी के प्रतिकूल प्रभाव भी पड़ेंगे। ऐसे में उत्तराखंड को खाड़ी देशों में काम कर रहे यहाँ के प्रवासियों का डिजिटल रजिस्टर बनाने व कौशल मापन की पंजिका तैयार करनी होगी। संकट प्रबंधन सेल दूतावासों के समन्वय से बनाने होंगे जिससे आपातकालीन वापसी व पुनर्वास की व्यावहारिक योजना बन सके। दूसरी प्राथमिकता रिवर्स माइग्रेशन इकोनॉमी की योजना बन जाए जिसमें प्रवासियों की वापसी पर उन्हें स्थानीय अवसर उपलब्ध कराए जा सकें। इसके लिए विनियोग कोष की व्यवस्था हो जो पर्वतीय सेवा अर्थव्यवस्था में हेल्थ केयर, शिक्षा, स्किल सेंटर व सुदूर कार्य हेतु डिजिटल सेवा के साथ जिलेवार ग्रामीण अंचलों तक पर्यटन, होमस्टे, एग्री प्रोसेसिंग, कौशल आधारित उद्योग में निर्माण, मशीन संचालन, होटल प्रबंधन की सेवा देने के अवसर दें।
संकट में तुरंत सहायता के लिए प्रवासी डेटाबेस, लौटे श्रमिकों के लिए रिवर्स माइग्रेशन नीति, गाँवों में गतिविधि बढ़ाने को स्थानीय विनियोग प्रोत्साहन व कौशल आधारित उपक्रम स्थापित करने जरूरी होंगे। वास्तविक विकास मापने के लिए एसडीआई सूचक का प्रयोग हो जो स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, रोजगार व असमानता की जाँच करते हैं। आखिर संरचना पर ध्यान देना भी बजट की फितरत है।
अभी जब सरकार जीडीपी दिखाती है तो उसमें पर्यटन आय, सिडकुल के उद्योग, शहरों के निर्माण व रियल स्टेट शामिल होते हैं जिसमें ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सीमित अंश होता है। इससे जीडीपी भले ही हर साल बढ़ी दिखे पर सामाजिक विकास सूचक उसमें कमजोर ही बना रहता है।
उत्तराखंड का बजट हर साल एक जैसे दोहराव करता दिखता है जिसके कारक हैं केंद्र पर निर्भरता, पहाड़ में ऊँची निर्माण लागत व प्रशासनिक ढांचे की सीमाएँ। राज्य के आगम का बड़ा हिस्सा अभी भी केंद्र से मिल रही सहायता व अनुदान एवं केंद्रीय करों का हिस्सा है। राज्य को अपने बजट में ज्यादा नीतिगत प्रयोग करने की स्वतंत्रता कम मिलती है। अधिकांश धन पहले से तय योजनाओं में जाता है इसलिए बजट का बड़ा भाग पूर्व निर्धारित व्यय बन जाता है।
अब जिन परिस्थितियों का हम सामना कर रहे हैं उनमें तीन दबाव एक साथ काम कर रहे हैं। पहला वैश्विक युद्ध और तेल आपूर्ति में कमी, दूसरा महंगाई व बढ़ते राजकोषीय दबाव व तीसरा चुनावी वर्ष से पूर्व के प्रलोभन। तेल व गैस की आपूर्ति के डगमगाने से यहाँ के उभरते सेवा क्षेत्र पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा ही। ऐसे समय वित्त नीति संरचनात्मक सुधार नहीं बल्कि जोखिम प्रबंधन व समायोजन बनाए रखने की दिशा लेती है। ऊर्जा कीमतें बढ़ने से परिवहन, खाद्य व निर्माण लागत बढ़ती है इसलिए सरकार चुनाव से पहले सुरक्षात्मक योजनाएँ बढ़ाती है जिसमें खाद्य सब्सिडी व राशन योजनाओं का विस्तार, खेतिहरों के लिए इनपुट सब्सिडी, बिजली पर आंशिक राहत व ग्रामीण रोजगार के कार्यक्रम। ऐसी नीतियों का समन्वय भारत सरकार व नीति आयोग की सिफारिशों पर होता है ताकि महंगाई के राजनीतिक प्रभाव को ढका जा सके। सरकार विवादित सुधारों से ऐसे समय में बचती भी है। इसीलिए सड़क परिवहन, शहरी विकास, धार्मिक व सांस्कृतिक परियोजनाओं में व्यय बढ़ाया जाता है। यह रणनीति रोजगार का त्वरित प्रभाव मानी जाती है। चुनाव से पहले सरकार विनियोगियों को संकेत देती है कि अर्थव्यवस्था स्थिर है इसलिए स्टार्टअप, एमएसएमई प्रोत्साहन, लॉजिस्टिक्स व वेयरहाउसिंग व हरित ऊर्जा पर घोषणा होती है। अब तेल संकट से बजट में कुछ बदलाव तो होने ही हैं जैसे सार्वजनिक परिवहन व इलेक्ट्रिक वाहन नीति पर, सौर ऊर्जा व छोटी जल विद्युत योजनाओं पर व राज्य की विद्युत वितरण सुधार उपायों पर। उत्तराखंड के लिए यह विशेष अवसर बन सकता है क्योंकि जल विद्युत व हरित ऊर्जा उत्पादन क्षमताओं में सुधार हुआ है।
ट्रंप के प्रशुल्क विवादों से उपजे विवादों के बाद अब तेल आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखना लचीली, सुदृढ़ नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाने के प्रबल प्रयासों पर निर्भर करेगा। यह हिमालयी राज्यों के लिए अवसर है। उत्तराखंड की ऊर्जा क्षमता जल विद्युत, सौर ऊर्जा व कार्बन अर्थव्यवस्था में है पर हरित ऊर्जा प्रारूप स्वतः सफल नहीं होता, इसके पर्यावरणीय जोखिम हैं। बड़ी परियोजनाओं से पारिस्थितिकी पर घातक प्रहार होता है।
पहाड़ी राज्य की लागत संरचना ऐसी है कि जिसका बड़ा हिस्सा बुनियादी प्रशासन, अवसंरचना पर व्यय में जाता है। आर्थिकी सेवा क्षेत्र की तरफ बढ़ रही है। तीर्थ व पर्यटन मौसमी कमाई के साधन हैं। बजट में वेतन-पेंशन का हिस्सा अधिक है। अवसंरचना पर खर्च अधिक है। सामाजिक योजनाओं पर मध्यम व नई आर्थिक नीति पर अल्प व्यय है जिस कारण बजट घोषणात्मक लगता है, संरचनात्मक नहीं। पहाड़ की सेवा व्यवस्था, उच्च मूल्य खेती व स्थानीय पर्यटन संभावनाओं में बदलाव सीमित हैं। उत्तराखंड का बजट भले ही आकार में बड़ा व राजकोषीय अनुशासन के भीतर ढाला गया है पर कई संरचनात्मक झोल लिए है। रोजगार और पलायन जो पहाड़ की शीर्ष प्राथमिकता है पर समंजनकारी सोच का अभाव है। युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के लिए 60 करोड़ रुपये का दान अर्पित किया गया है।
बजट में सड़क, शहरी विकास व पर्यटन पर बल है जहाँ समस्या यह है कि यह उपभोग आधारित है। उत्पादन-आपूर्ति आधारित निर्माण, एग्रो प्रोसेसिंग व छोटे-मोटे धंधों पर ध्यान कम है। ऐसे में आय का स्थानीय स्रोत सूखने लगता है और स्थानीय आर्थिकी कमजोर और पंगु होने लगती है। बजट की बड़ी संरचनात्मक समस्या यह है कि इसका बड़ा हिस्सा वेतन, पेंशन व ब्याज भुगतान में खर्च हो जाता है। राज्य पर उधार भी एक लाख करोड़ ₹ से अधिक है। कैग की रिपोर्ट बताती है कि कर्ज बढ़ा है। स्वास्थ्य में पद खाली हैं। परिवहन में अपना समय पूरा कर गए वाहन हैं तो कार्यशालाओं में कई पुर्जे नहीं। मनरेगा भुगतान की मजदूरी मिलने में अक्सर विलंब है। ई-रिक्शा परियोजना तमाम अनियमितताओं से घिरी है। न तो स्मार्ट क्लास का उपयोग है वहीं स्मार्ट सिटी परियोजना भी विफलताओं से जूझ रही है। स्मार्ट सिस्टम उपयोग न होने वाला कचरा ढो रहा है।
आर्थिक सर्वेक्षण व ऑडिट रिपोर्ट में कई समस्याएँ सामने आईं। स्वास्थ्य व आयुष में 41% पद रिक्त हैं। ग्रामीण रोजगार योजना का क्रियान्वयन ढीला है। शिक्षा का विनियोग सीमित है तो मानव पूंजी अकुशल-कमजोर, बढ़ते कर्ज से वित्तीय जोखिम, स्थानीय आपूर्ति के अभाव से आय स्रोत सीमित हैं जिनको कहीं कुछ ठीक-ठाक करने की कोशिश में उत्तराखंड बजट 2026 राजकोषीय प्रबंधन का दस्तावेज है, आधुनिकीकरण का संकेत नहीं, जिसके द्वारा विकसित देशों के और करीब जाने के दावे किए जाते रहे हैं।
सरकार ने इसे ज्ञान मॉडल यानी गरीब, युवा, अन्नदाता व नारी पर अवलंबित बताया। अब 2027 के कुंभ मेले की तैयारी में 1027 करोड़ ₹, अन्नपूर्णा योजना में 1300 करोड़ ₹, नंदा-गौरा योजना पर 220 करोड़ ₹ खर्च होंगे तो मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना में 60 करोड़ ₹। कृषि में मिलेट मिशन व मिशन एप्पल भी चर्चा में है। मिलेट व बागवानी मिशन से पहाड़ी खेती का विविधीकरण भी। महिला और गरीब वर्ग के लिए लक्षित योजनाएँ हैं। ये सभी पायलट या सीमित स्तर की हैं।
सड़क व शहरी विकास व पर्यटन पर भी खर्च है। राज्य की रणनीति सड़क, पर्यटन और शहरीकरण पर 2003 से टिकी है तो यह भी अवसंरचना प्रधान बजट हुआ। वहीं रोजगार नीति दुर्बल है तो उद्योग व क्लस्टर नीति का स्पष्ट रोडमैप खोजना मुश्किल है। पर्यावरण पर्यटन पर जोर है जिसमें कार्बन फाइनेंस व हरित ऊर्जा जैसे नवीन राजस्व स्रोतों पर विचार किया जाना है।
वित्तीय अनुशासन बनाने की हर संभव कोशिश है। अवसंरचना विनियोग पर उच्च अधिमान है तो पहाड़ की दशा सुधार के मौके कम। रोजगार की रणनीति अस्पष्ट दिखती है। सरकार ने राजकोष का संतुलन साधने को प्राथमिकता दी है भले ही राजकोष का घाटा पिछले वर्ष से दस प्रतिशत अधिक अनुमानित है जो एफआरबीएम सीमा के भीतर है। इसलिए यह स्थिरता का लेखा-जोखा है, संरचनात्मक परिवर्तन का बजट नहीं।

































