सी ए सरोज आनंद जोशी
आज देश में कई गंभीर आर्थिक चुनौतियाँ हैं। एक ओर फिस्कल डेफिसिट बढ़ रहा है, दूसरी ओर रुपये का अवमूल्यन केवल डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक गिरावट तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया के अन्य देशों की तुलना में भी हमारे रुपये की स्थिति कमजोर हुई है। शेयर बाजार की हालत भी अनुकूल नहीं है और जीडीपी की चर्चा अब गंभीरता से होती दिखाई नहीं देती।
ऐसे में निर्यात बढ़ाना और अपने उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय मानकों तक पहुँचाना एक बड़ी चुनौती है। भारत में मेक इन इंडिया अब “असेंबलिंग इन इंडिया” में तब्दील होता जा रहा है। हम विदेशों से कल-पुर्जे खरीद रहे हैं और उन्हें आपस में केवल जोड़ रहे हैं। ऐसे में सबसे अधिक आवश्यकता विनिर्माण क्षेत्र में मौलिक और व्यापक सुधारों की है।
हमें चीन से सीख लेने की जरूरत है, जहाँ छोटे-छोटे मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स को बढ़ावा दिया गया। भारत में विनिर्माण क्षेत्र की स्थिति फिलहाल अनुकूल नहीं है। यहाँ विकेंद्रीकरण की सख्त आवश्यकता है, न कि कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट्स पर निर्भर रहने की। इसके बजाय उस भारतीय दर्शन को व्यवहार में लागू करना होगा, जहाँ “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसा लोकतांत्रिक दृष्टिकोण निहित है।
विनिर्माण क्षेत्र में अधिक से अधिक आवंटन आज की सबसे बड़ी जरूरत है। नए शोध और अनुसंधान पर विशेष ध्यान देना होगा, जैसा कोरिया और ताइवान जैसे छोटे देशों ने किया है, जिसकी सफलता को आज पूरी दुनिया स्वीकार कर रही है।
‘आउट ऑफ बॉक्स’ सोच केवल मेक इन इंडिया या विकसित भारत जैसे सैद्धांतिक नारों तक सीमित न रहे, बल्कि विकास को धरातल तक पहुँचाया जाए। देश में रोजगार का दारोमदार विनिर्माण क्षेत्र पर है। यदि यह क्षेत्र नहीं बढ़ा, तो बड़े रोजगार मॉडल का क्या होगा? सरकार स्वयं कई बार संकेत दे चुकी है कि युवाओं को सरकारी रोजगार देना संभव नहीं है। ऐसे में विनिर्माण क्षेत्र का विस्तार और उसका विकेंद्रीकरण सरकारी रोजगार का एक बड़ा वैकल्पिक मॉडल बन सकता है, हालाँकि निवेश आकर्षित करना भी एक बड़ी चुनौती है।
इसी क्रम में सरकार के इस बजट में निर्माण क्षेत्र के लिए कुछ घोषणाएँ की गई हैं, जिन पर सतर्क नजर रखने की आवश्यकता है।
इलेक्ट्रॉनिक्स कंपोनेंट्स विनिर्माण योजना (₹22,919 करोड़) में लक्षित से दोगुना निवेश मिला है और परिव्यय बढ़ाकर ₹40,000 करोड़ किया जाएगा। अब यह देखना होगा कि यह आवंटित धनराशि अनुसंधान, नवाचार और वास्तविक विनिर्माण को बढ़ाने में प्रयोग होती है या केवल असेंबलिंग तक सीमित रह जाती है—यह तो समय ही बताएगा।
बायोफार्मा विनिर्माण केंद्र बनाने हेतु अगले पाँच वर्षों में ₹10,000 करोड़ के परिव्यय से बायोफार्मा शक्ति योजना प्रस्तावित है।
वेतनभोगी, किसान और व्यापारी वर्ग की स्थिति
प्रत्यक्ष कर के रूप में सबसे अधिक कर देने वाला वर्ग—जो कुल बजट व्यय का लगभग 20% योगदान देता है—वेतनभोगी वर्ग है। इसके बदले शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा आज भी उसके लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। निजी क्षेत्र में कार्यरत कर्मचारियों के लिए शिक्षा और स्वास्थ्य की सुरक्षा चिंताजनक है। स्वास्थ्य सेवाएँ निजी क्षेत्र के हवाले हैं, जो अत्यधिक महँगी हैं। ऐसे में सामाजिक सुरक्षा, विशेषकर रिटायरमेंट के बाद, एक गंभीर समस्या बन गई है।
आज वेतनभोगी वर्ग के सामने यह प्रश्न है कि अपनी बचत का निवेश कहाँ किया जाए। बैंक ब्याज दरें, यहाँ तक कि फिक्स्ड डिपॉजिट और पीपीएफ पर मिलने वाला ब्याज भी महँगाई दर से काफी कम है। शेयर बाजार पर कराधान में वृद्धि भविष्य की बचत के लिए एक बड़ी चुनौती बन गई है। सरकार डी-रेगुलेशन की बात तो करती है, लेकिन निजी क्षेत्र पर नियंत्रण की कोई ठोस नीति दिखाई नहीं देती। इसका ताजा उदाहरण स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों पर जीएसटी घटाने के बाद बीमा कंपनियों द्वारा प्रीमियम में की गई भारी और निर्दय वृद्धि है।
इस बजट में कुछ बीमारियों की दवाओं को सस्ता करने का प्रावधान किया गया है। बायोफार्मा क्षेत्र का इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, यह भविष्य तय करेगा। पिछले वर्ष टैक्स स्लैब में ₹12 लाख तक की वृद्धि के बाद इस वर्ष स्लैब में बदलाव की उम्मीद कम ही थी और इस वर्ग के लिए इस बजट में भी कुछ खास नहीं है।
सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती रही, लेकिन बेस ईयर आय का कोई स्पष्ट मापदंड और रोडमैप कहीं नजर नहीं आया। हालाँकि किसान निधि से कुछ राहत मिली होगी, पर इस बजट में किसानों के लिए कोई विशेष घोषणा नहीं की गई।
अप्रत्यक्ष कर यानी जीएसटी के रूप में रिकॉर्ड तोड़ संग्रह में छोटे व्यापारियों की बड़ी भूमिका रही है। बदले में सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्यापारियों पर विभागीय दबाव न बढ़े, इंस्पेक्टर राज की पुनरावृत्ति न हो और छोटे-छोटे अनुपालनों पर कठोर दंड व पेनल्टी से राहत मिले। कुछ प्रावधानों में पेनल्टी का नाम बदलकर “फीस” किया गया है, लेकिन जीएसटी में दंडात्मक प्रावधानों से वास्तविक राहत फिलहाल दिखाई नहीं देती।
उत्तराखंड के लिए अवसर
जैविक दवाओं के क्षेत्र में ₹10,000 करोड़ का बजट आवंटन किया गया है। इससे उत्तराखंड के उद्यमियों, विशेषकर जड़ी-बूटी के क्षेत्र में कार्यरत लोगों को लाभ मिल सकता है।
वस्त्र, हथकरघा और उद्योगों पर सरकार ने जोर देने की बात की है, जिसकी संभावनाएँ उत्तराखंड में विकसित हो सकती हैं। भेड़-पालन से जुड़े लोगों को भी इसका लाभ मिल सकता है।
विगत वर्षों में उत्तराखंड में सोलर सिस्टम पर कार्य शुरू हुआ है। इस बजट में सोलर सिस्टम में लगने वाले कल-पुर्जों को सस्ता करने की घोषणा की गई है, जिससे इस उद्योग को गति मिलेगी।
उत्तराखंड, विशेषकर पिथौरागढ़, ने बॉक्सिंग और तीरंदाजी जैसे खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया है। इस बजट में खेलो इंडिया कार्यक्रम के माध्यम से खेल प्रतिभाओं के व्यवस्थित विकास को प्रोत्साहित किया गया है। केवल खिलाड़ियों को ही नहीं, बल्कि उत्तराखंड सरकार को भी इस योजना पर विशेष फोकस करना चाहिए।

































