राजीव लोचन साह
नैनीताल के दुर्दिन खत्म होने को नहीं आ रहे हैं। शायद आयेंगे भी नहीं। जब तालाब के स्वास्थ्य और अस्तित्व से बड़ी चिन्ता चौपहिया और दोपहिया वाहनो की पार्किंग की हो जाये तोे फिर नैनीताल को बचा कौन सकता है ? अभी 24 से 26 जनवरी के तीन दिनों में जिस तरह से इस खूबसूरत शहर का ‘गैंगरेप’ हुआ, उससे यहाँ के हितैषी पर्यटन से ही तौबा करने लगे हैं। बर्फ देखने वालों की अनियंत्रित भीड़ कुलू, मनाली, शिमला तथा अन्य हिल स्टेशनों में भी पहुँची थी, मगर यहाँ यह हमेशा याद रखा जाना चाहिये कि नैनीताल की जैसी अद्भुत झील इन हिल स्टेशनों में कहीं नहीं है। इतने अत्याचार सहने के बाद भी नैनीताल घिसट ही रहा है, तालाब अभी सूखा नहीं है तो इसके पीछे कारण यही है कि अंग्रेजों ने बहुत सोचे-समझे म्युनिसिपल बाई लॉज लागू कर इस नाजुक शहर को अठमासे बच्चे की तरह पाला था। अब चन्द लोगों के अलावा वह हकीकत सब लोग भूल गये हैं। पर्यटन के विकास के नाम पर यहाँ की विरासत, संस्कृति और परम्परायें पूरी तरह ध्वस्त हो गयी हैं। हाल के सालों में जिस तरह यहाँ के मूल निवासियों ने हल्द्वानी या अन्यत्र पलायन किया है, जिस तरह के लोग यहाँ के राजनीतिक नेतृत्व में स्थापित हुए हैं और जिस तरह के प्रशासनिक अधिकारी यहाँ तैनात हुए हैं, उससे यहाँ के भविष्य को लेकर बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं बँधती।
सबसे ताजा ग्रहण फ्लैट्स पर लगा है। यह बताने की जरूरत नहीं है कि तालाब के बाद नैनीताल में सबसे खूबसूरत चीज फ्लैट्स ही है। 1880 के प्रलयंकारी भूस्खलन ने कम से कम यह अनमोल तोहफा तो नैनीताल को दिया। पहले पोलो ग्राउण्ड, फिर अपने बुजुर्गों से हमने इसका नाम ‘किरकिट’ सुना था। ‘फ्लैट्स’ तो यह बाद में हुआ। ऑल इंडिया ट्रेड्स कप हॉकी में जलवे दिखाते ओलिम्पिक खिलाडियों, स्कूली बच्चों के इंडिपेंडेंस फुटबॉल टूनामेंट में शेरवुड और सेंट जोसेफ की प्रतिद्वन्द्विता तथा सीजन में आजाद हिन्द फौज के बैण्ड मास्टर रहे कैप्टन रामसिंह की थिरकती उँगलियों के इशारों पर बजती पी.ए.सी. बैण्ड की कर्णप्रिय धुनों की स्मृतियाँ हमारे दिमाग में अमिट हैं।
इसके बुरे दिन आने तो पिछली सदी के आठवें दशक में ही शुरू हो गये, जब अनेक देशी तथा विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और विशिष्ट अतिथियों के ऐतिहासिक भाषणों के चश्मदीद रहे कैपिटॉल केे बरामदे के सामने का हिस्सा पटरी पर सामान बेचने वालों ने हथिया लिया और नगरपालिका तथा शासन-प्रशासन तमाशा देखते रहे। अब तो यह बीमारी लाइलाज हो गई है। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद नगरपालिका भवन के सामने से कैपिटॉल तक का हिस्सा, जो पहले बजरी से ढँका था, पत्थरों से छा दिया गया। कुछ वर्ष पहले बैण्ड स्टैण्ड से कैपिटॉल के बीच दो बदसूरत पार्क बना दिये गये तो कोरोना काल में नैनीताल के चेहरे पर एक बदनुमा धब्बे की तरह बास्केट बॉल कोर्ट की बगल में एक आर्टिफिशियल क्लाइंम्बिंग वॉल, जिसे कायदे से बारापत्थर के रॉक क्लाइंम्बिंग एरिया या स्नोव्यू में होना था, बना दी गयी। बची खुची कसर मानस खण्ड मन्दिर माला मिशन के अन्तर्गत नयना देवी मन्दिर के सौन्दर्यीकरण के नाम पर रिक्शा स्टैण्ड से कैपिटॉल की ओर के शानदार नजारे को बन्द कर, पहाड़ के स्थापत्य से बेमेल एक विशालकाय बदसूरत द्वार खड़ा कर पूरी कर दी गयी।
पिछली जिलाधिकारी वन्दना सिंह फ्लैट्स पर ज्यादा मेहरबान रहीं। पहले उन्होंने किले जैसी मोटी दीवारों से खेल के मुख्य मैदान को ही छोटा कर दिया। फिर उसे खेल विभाग को सौंप दिया। नैनीताल के लोग फ्लैट्स को लेकर हमेशा से बहुत संवेदनशील रहे हैं। 1952 के हेलसिंकी ओलिम्पिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के कप्तान दिग्विजय सिंह (के.डी.सिंह ‘बाबू’) को नैनीताल और नैनीताल की हॉकी से बड़ा प्यार था। वे हर साल गर्मियों में नैनीताल आते और यहाँ के खिलाड़ियों के साथ खेलते, नये खिलाड़ियों को खेलना सिखाते थे। बाद में वे उत्तर प्रदेश के खेल निदेशक बने तो उन्होंने फ्लैट्स को खेल विभाग के अन्तर्गत लेने का प्रस्ताव रखा। नैनीताल के डी.एस.ए., नगरपालिका और यहाँ के नागरिकों ने विनम्रतापूर्वक इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया। जिला क्रीड़ा अधिकारी का कार्यालय हल्द्वानी में स्थापित हो गया। यह बताया जाना जरूरी है कि फ्लैट्स नगरपालिका की सम्पत्ति है, जिसे खेल सम्बन्धी गतिविधियाँ करने के लिये नगरपालिका ने डी.एस.ए. (डिस्ट्रिक्ट स्पोर्टस एसोसिएशन) को लीज पर दिया है।
इस बार भी फ्लैट्स को जिला क्रीड़ा संघ को दिये जाने की नैनीताल में तीखी प्रतिक्रिया हुई। लोगों का कहना था कि जो जिला क्रीड़ाधिकारी हल्द्वानी गौलापार के भव्य और विशाल स्टेडियम की कुर्सियों की धूल तक नहीं साफ कर सकता, वह अब नैनीताल के फ्लैट्स की देखरेख करेगा! ध्यान देने योग्य है कि जब इस मैदान को डी.एस.ए. से छीन कर जिला क्रीड़ा संघ को देने की प्रक्रिया शुरू की गयी थी, उस वक्त नगरपालिका में निर्वाचित अध्यक्ष नहीं था। नगरपालिका के अध्यक्ष का प्रभार प्रशासक के पास था और अधीनस्थ अधिकारी होने के कारण उसके लिये जिलाधिकारी के आदेश की अवहेलना करना सम्भव नहीं था। मगर यह हस्तांतरण वैधानिक रूप से पूरा होता, इससे पहले ही नगरपालिका के अध्यक्ष पद पर एक निर्वाचित जन प्रतिनिधि आ गया और उधर वन्दना सिंह का भी तबादला हो गया। निर्वाचित पालिकाध्यक्ष डॉ. सरस्वती खेतवाल जन भावनाओं का ख्याल करते हुए जिला क्रीड़ा संघ का विरोध कर रही हैं और इस तरह फ्लैट्स विवादों के केन्द्र में आ गया है। इस वक्त इस मामले को लेकर एक जनहित याचिका भी हाईकोर्ट में विचाराधीन है।
27 जनवरी से जिला क्रीड़ाधिकारी निर्मला पन्त द्वारा फ्लैट्स पर बन रहे क्रिकेट पिच पर कब्जा लेने की कोशिश हो रही है और नगरपालिका अध्यक्ष, डी.एस.ए. के पदाधिकारियों तथा नैनीताल के खिलाड़ियों द्वारा ऐसे प्रयास विफल कर दिये जा रहे हैं। 27 जनवरी को जिला क्रीड़ाधिकारी द्वारा नैनीताल कोतवाली में तहरीर दी गयी, जिसके बाद नगरपालिका की ओर से भी एक तहरीर दे दी गयी। डी.एस.ए. के स्पोर्टस कैलेण्डर के अनुसार इस पिच पर कुँवर पृथ्वीराज सिंह बिष्ट स्मृति क्रिकेट टूर्नामेंट होना है। इसी की तैयारी के रूप में 31 जनवरी को प्रशासन इलेवन और पत्रकार इलेवन के बीच एक प्रदर्शनी मैच होना निर्धारित था। इस बार जिला क्रीड़ाधिकारी की ओर से नैनीताल के उप जिलाधिकारी नवाजिश खलीक आये और आपसी बातचीत के जरिये मामले को सुलझाने की कोशिश की। मगर कोई हल नहीं निकल पाया।
अन्ततः खेल के मैदान पर पुलिस का पहरा लग गया। फिलहाल पुलिस क्रिकेट की पिच की चौकसी कर रही है। नैनीताल की जनता इस दृश्य को देख कर हैरान है। जनता डी.एस.ए. और नगरपालिका के साथ है। डबल इंजन की सरकार की पार्टी का एक छोटा सा धड़ा खुल कर डी.एस.ए. और नगरपालिका की खिलाफत कर रहा है। हालाँकि भाजपा के अधिकांश लोग तटस्थ हैं और जिन भाजपाइयों का खेलों से थोड़ा-बहुत सरोकार है, वे डी.एस.ए. और नगरपालिका का साथ दे रहे हैं। नैनीताल में गणमान्य अब सत्ताधारी भाजपा के नेता ही माने जाते हैं। अन्य की यहाँ कोई गिनती नहीं. शासन-प्रशासन उनका संज्ञान भी नहीं लेता. अतः होगा वही, जिधऱ को भाजपा का ऊँट करवट लेगा.
फोटो इंटरनेट से साभार

































