राजशेखर पन्त
(अस्वीकरण: यह कथा वृतांत पूरी तरह से काल्पनिक है और इसमें उत्तराखंड राज्य के जन्म और रजत जयंती वर्ष का रूपक ढूंढना पाठक के दिमाग़ की खुराफात मानी जाएगी)
विविधता से भरे एक बड़े से संयुक्त परिवार में जन्मा और स्थायी रूप से अपने पुश्तैनी घर में अपनी पत्नी और डेढ़ दो साल के इकलौते बेटे के साथ रहने वाला नंदाबल्लभ, डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के एक पुराने प्राइमरी स्कूल में कभी अध्यापक हुआ करता था। कल्पना कीजिये एक विशाल, बेमेल सा संयुक्त परिवार, अलग-अलग मिज़ाज से ले कर अंदाज़, तरबियत, प्राथमिकताओं, निष्ठाओं, मूल्यों इत्यादि की एक बेमेल सी खिचड़ी, जिसे मजबूरन किसी बड़े से पतीले में जबरन पकाया जा रहा हो….। पकाने की ज़िम्मेदारी निभाने वाले हुनरमंद और खासे तजुर्बेकार बुजुर्ग कभी आंच तेज करते, कभी करछुल हिलाते, पानी डालते- गरज़ ये कि देगची में कुछ खदबदाता रहे। एक छत के नीचे जमा यह हुजूम बेशक सतरंगी रहा हो पर नीयत कुछ ऐसी थी कि घर-परिवार एक डोर से बंधा दीखना चाहिए, समाज में इज़्ज़त-आबरू का भरम बने रहना जरूरी है। नंदाबल्लभ खुद भी इस बात का हिमायती था कि परिवार की एकजुटता बनाये रखने के लिए किसी भी तरह के त्याग और बलिदान के लिए हमेशा तैयार रहना ही अच्छे संस्कारों की पहचान है।
परिवार में अपने ज्यादातर हमउम्रों की घनघोर दुनियादारी और निहायत ही खुदगर्ज और चालबाज़ रवैये ने समय बीतने के साथ-साथ नंदाबल्लभ दंपति के इस विश्वास को और भी पुख़्ता कर दिया था कि विरासत में अपने इकलौते चश्मोचिराग को सीधी-सरल और कमोबेश सपाट सी ज़िंदगी जीने की हिदायत देकर ही वह माँ-बाप होने का फर्ज बेहतर तरीके से निभा सकते हैं।
यहां तक आते-आते अब इतना तो आप भी समझ चुके होंगे कि उस विशाल सर्कसनुमा संयुक्त परिवार में इन दोनों की हैसियत कैसी रही होगी। हाशिये पर धकेली गयी ज़िंदगी जीने के लिए अभिशप्त यह युगल कमोबेश एक बहु आयामी उपेक्षा का शिकार था। अपने वक्त में की गयी ठीक-ठाक पढ़ाई के बावजूद अब जबकि ज़िंदगी ढलान पर थी, परिवार के कपड़े धोना, बर्तन माँजना, सफाई करना, खेतों में कुछ उगा लेना वगैरा वगैरा… यही इसकी नियति थी। बेशक पढ़ने-पढ़ाने, कुछ समझने-समझाने जैसा मसला कभी दरपेश आता तो घर के हर सदस्य को इनकी मदद की दरकार होती। काम निकालने के लिए की गयी अपनी तारीफ़ को परिवार के लिए उठायी गयी अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी का पुरस्कार या बख्शीश जैसा कुछ मान कर ये थोड़ी देर के लिए खुश हो जाया करते थे। वक्त अपने हिसाब से बीत रहा था, और परम संतोषी नंदाबल्लभ दंपति उसकी रौ में बगैर किसी लाग-लपेट के बहते चले जा रहे थे।
साठ के दशक के आते आते, जब उनके बेटे को स्कूल जाते हुए कुछ बरस निकल चुके थे, उन्हें बहुत शिद्दत के साथ यह एहसास होने लगा कि उनका इकलौता नौनिहाल इस बहुरंगी संयुक्त परिवार में रह कर शायद वैसी तालीम और संस्कार हासिल न कर सके जैसी वे उसे देना चाहते थे।
दरअसल हुआ कुछ यूं कि सरकारी स्कूल से चौथी-पांचवीं कक्षा पास करते ही घर में दबी जुबान से यह बातें होने लगीं कि उनका बेटा बस दसवीं पास कर ले तो फिर घर के रेस्टोरेंट/होटल में बर्तन साफ करने और मेज़ वगैरा लगाने का काम सीख लेगा। नंदाबल्लभ के लिए यह खुलासा एक अरसे से पालेपोसे गए सपने के टूटने जैसा था। उसे एकाएक लगने लगा कि अपने बेटे को एक बेहतर इंसान बनाने के सपने भी अब शायद सब्जी-दाल की बड़ी सी खानदानी देगची की दीवारों पर बावस्ता चिकनाई और कालिख के ऊपर फिसलते गंदले पानी के साथ बह जाएंगे।
रास्ता सिर्फ एक था कि बस हिम्मत कर के वह एक अंतहीन सर्कस बन चुके अपने संयुक्त परिवार से- जिसमें उसकी हैसियत रिंगमास्टर द्वारा सिखाये गए करतबों को निर्विकार भाव से दोहराने वाले जानवर से ज्यादा नहीं थी -अपना हिस्सा लेकर एक अलग आशियाना बसा ले।
एक दिन उसने आवेश में आकर अपनी मांग घर के बुजुर्गों के सामने रख दी। घर के सारे बुजुर्ग, सारे खैरख्वाह, चचेरे, तयेरे, मौसेरे, ममेरे, ऐरेगेरे -जितने भी रिश्तेदार, बिरादरी वाले थे, सबने नंदाबल्लभ की ऐसी मालामत की कि उसे खुद लगने लगा कि एक अलग घरौंदा बनाने का उसका सपना- भगवान के बुलावे को स्वीकार कर चुके और स्वीकार करने की तैयारी में इस फानी दुनिया की ओर पीठ फेरने का मन बनाने में मसरूफ बड़े बूढ़ों की शान में -एक भयानक गुस्ताख़ी का सबब बन गया है।
चारों ओर से पड़ रहे दबाव के चलते ज़िंदगी को अपने हिसाब से जी सकने के नंदाबल्लभ के प्रयासों की हवा बेशक बहुत जल्द ही निकल गयी, पर इतना ज़रूर हुआ कि परिवार के खूंसट किस्म के सरपरस्तों को, जो उसकी जिंदगी के हर छोटे-बड़े फैसले लेने के पैदायशी हकदार थे, यह अच्छी तरह समझ आ गया कि अब तक हुई ज्यादतियों की जलन का ताजा और एकमुश्त एहसास उसके मन में हमेशा के लिए कोई खराश या दरार न बना सके इसके लिए जरूरी है कि उसे परिवार में कुछ विशेष दर्जे और सुविधाओं का एक रंगीन और चटपटा लॉलीपॉप पकड़ा दिया जाए। उसकी अहमकाना खुशफहमी के चलते परिवार के बड़े बूढ़ों को भरोसा था कि फिलहाल इतना भर कर देना उसके अंदर खुद की ज़मीन तलाशने की इच्छा को कहीं गहरे दफन कर देगा।
फैसला लिया गया कि उसे पुश्तैनी घर के दो-तीन कमरे अलग से दिए जायेंगे जिन्हें वह अपनी पसन्द से सजा-संवार सकेगा; उसका बेटा अगर पढ़ना चाहता है तो उसे इस बात की सुविधा दी जाएगी; घर की आमदनी का एक छोटा हिस्सा उसे नगद दिया जाएगा, जिसे वह अपनी मर्जी से खर्च कर सकेगा …वगैरा वगैरा। कहीं दबे-ढके अपराध बोध के बावजूद नंदाबल्लभ खुश था कि चलो ज़िंदगी को अब अपने हिसाब से तो जिया जा सकेगा।
नंदाबल्लभ का बेटा दस-ग्यारह साल का हो चुका था। स्कूल के रजिस्टर ने उसे उसकी पहचान बुद्धिबल्लभ के नाम से दी थी। स्कूल के बाद कालेज पास कर जब वह नजदीक के शहर में नए नए खुले सरकारी डिग्री कालेज से बीए कर रहा था तो उम्र और वक्त के साथ खुलती दिमाग़ की परतों ने उसे यह समझाना शुरू किया कि संयुक्त परिवार द्वारा सुविधाओं के नाम पर उसके माँ-बाप को बगैर चूं-चपड़ करे एक किनारे पर पड़े रहने की क़ीमत दी जा रही है। उसके सामने उसका भविष्य था, सपने थे जिन्हें वह अपनी शिक्षा और दुनियादारी की बढ़ती समझ के चलते बेहतर तरीके से देख, समझ और सजा सकता था। जल्द ही उसने अपने माँ-बाप को अन्यायपूर्वक एक झुनझुना थमा देने के जिम्मेदार संयुक्त परिवार के कथित सरपरस्तों के प्रति उग्र रूप से मुखर होना शुरू कर दिया। यथास्थित को देर-सबेर समझ कर उसके माता-पिता ने भी उसका नैतिक समर्थन शुरू कर दिया। संयुक्त परिवार के कुछ फासिलनुमा बुजुर्गों ने सिर्फ अपनी लाश पर हो सकने वाले परिवार के बंटवारे की बात कही, पर इमोशनल ब्लैकमेल भी बुद्धिबल्लभ और उसके प्रताप से संचारित और संचालित हो रहे उसके माँ-बाप के ज्वलंत इरादों पर पानी नहीं छिड़क सका। अब आर-पार की लड़ाई होना तय था।
बहुत कुछ घटा था इस फैमिली-ड्रामा के क्लाइमैक्स सीन में- झगड़ा, हिंसा, गाली गलौज, चालबाजियां, षडयंत्र, गोलीबारी, -यानि कि वो सब कुछ जो बड़ी नाक वाले, कथित रूप से खानदानी परिवारों में पुश्तैनी विरासत के बंटवारे के दौरान घटता है। इस नाटकीय दौर का वर्णन अलग अलग नज़रिए से लिखे, पढ़े और फिर संशोधित और सम्पादित किये गए इतिहास के पन्नों में तफ्सील से दर्ज है।
खैर… बंटवारा आखिरकार हो गया, संयुक्त परिवार टूट गया और नंदाबल्लभ को खेत-खलिहान, कारोबार, परिसंपत्तियों इत्यादि में उसका हिस्सा दे दिया गया। खुश था वह, और बुद्धिबल्लभ के उत्साह का तो कोई ओर-छोर ही नहीं था।
अब यहां आकर कहानी एक क्लिफहैंगेर पर लटक जाती है। उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि नंदाबल्लभ ने अपनी ज़िंदगी के साठ-सत्तर बसंत, शायद पतझड़ कहना बेहतर होगा उन्हें, बेशक औरों की हुक्मबरदारी में गुज़ारे हों, पर बुद्धिबल्लभ डिग्री कॉलेज में पढ़ा-गुणा है, दुनियादारी की समझ है उसे। नंदाबल्लभ की सरलता और सच्चाई को बुद्धिबल्लभ की बुद्धि, उसके सपनों और जोशोखरोश के साथ मिल कर अब कुछ ऐसा करिश्मा कर दिखाना चाहिए कि संयुक्त विरासत से छिटका हुआ यह परिवार चंद बरसों में ही कहाँ से कहाँ पहुंच जाए।
नंदाबल्लभ की सरलता और बुद्धिबल्लभ की अनुभवहीनता पर बंटवारे के बाद से ही गिद्धदृष्टि जमाये उनके कई मौसमी खैरख्वाह हमदर्द बन कर धीरे धीरे उनके निकट आने लगे। बेशक इस जमात में उन लोगों का खासा बोलबाला था जिन्होंने संयुक्त परिवार के झगड़े के क्लाइमैक्स के दौरान ऊंट की करवट को भांपते हुए एक शातिराना चुप्पी ओढ़ ली थी।
बंटवारे में उसे मिली जमीन का अधिकांश हिस्सा एक नदी के किनारे स्थित था। इसका आखिरी छोर हरे भरे जंगल से भरी एक पहाड़ी की तलहटी से जा मिलता था। नंदाबल्लभ ने ताउम्र इसी ज़मीन पर बैल की तरह मेहनत करते हुए परिवार की जरूरतों में योगदान के इरादे से खेती की थी। खुश था वह, की अब जो कुछ भी इसमें उपजेगा वह सिर्फ उसका होगा।
परिवार के हालिया खैरख़्वाहों की प्लानिंग फिलहाल कुछ और थी। उनकी पैनी अक्ल का फोकस अब बुद्धिबल्लभ पर आकर ठहर गया था। उसे समझाया गया कि खेतीबाड़ी से कुछ नहीं होना है घर के पीछे की पहाड़ी के जंगल को साफ कर एक रिसार्ट बनाना चाहिए; नदी के किनारों पर अगर एक दो छोटे छोटे कॉटेज बना दिये जायें तो उन्हें ऊंची कीमतों पर दिल्ली जैसे महानगर के लोगों को बेचा जा सकता है। नदी में राफ्टिंग जैसे एडवेंचर स्पोर्ट्स की पूरी संभावना है। और पीछे वाली पहाड़ी तो पैराग्लाइडिंग जैसे तमाशे के लिए निहायत ही मुफीद जगह हो सकती है। इन सब के साथ एक बढ़िया रेस्टोरेंट तो यूं ही चल निकलेगा। जमीन के कुछ हिस्से की पॉवर ऑव एटॉर्नी ले पार्टनरशिप में कॉटेज बनाने का प्रस्ताव देकर उन्होंने काम शुरू करने के लिए पूंजी के इंतजाम का रास्ता भी सुझा दिया। और फिर बैंक से कर्ज लेने का विकल्प तो खुला था ही।
समय बीतने के साथ साथ कॉटेज, पैराग्लाइडिंग, रेस्टोरेंट, राफ्टिंग जैसे प्रोजेक्ट्स आकार लेने लगे। पीछे वाली पहाड़ी पर उग आए जंगल को गलत सही तरीके से काटछांट कर एक होटल भी सर उठाने लगा था। इसी बीच ज़मीन के एक बड़े हिस्से में खड़िया की खान भी निकल आयी। घर में पैसे की आमद अब तेजी से बढ़ रही थी। बाहर से आये किसी दबंग राजनेता के साले -जिसे बुद्धिबल्लभ ने अपना बनाया पहला कॉटेज बेचा था -के साथ मिल कर उसने एक स्टोन क्रशर भी नदी के किनारे डाल दिया। और फिर वह सब कुछ शुरू हो गया जो लक्ष्मी जी के उल्लू की अनायास हुई फ़ोर्स लैंडिंग के बाद होना स्वाभाविक है। मित्रों द्वारा शाम के लिए जरूरी हर तरह की खुमारी के बेनागा इंतज़ाम ने बुद्धिबल्लभ की प्रगतिशीलता और आधुनिक पहचान पर चुपके से पक्की मुहर लगा दी थी।
नंदाबल्लभ अब तक बूढ़ा हो चुका था। उपलब्ध विवरण, इतिहास और जनश्रुतियां उसके जीवन के इस पड़ाव के संबंध में अधिक मुखर नहीं हैं। बताया जाता है कि कभी कभार नदी के किनारे टहलते हुए वह उन दिनों को याद करता था जब पत्थर और रेत से अटे पड़े इन खेतों में वह धान, आलू जैसी फसलें बोया करता था। छोटी छोटी क्यारियों में जाड़ों के दिनों में बोयी जाने वाली लाही, मेथी और पालक का स्वाद कभी कभी उसे बैचैन भले ही करता हो, पर पीछे मुड़ कर जब वह कांच के फसाड वाले अपने नए घर और कॉटेज वगैरा को देखता तो उसकी झुकी हुई पीठ अनायास ही सीधी हो कर तन जाती थी। नदी के किनारे खड़ी जेसीबी मशीन उसके कदमों को एक अचीन्हे आत्मविश्वास से खासा वजनदार बना देती थी। घर वापस पहुंचने पर किचन में बन रहे ‘शिकार’ की तीखी गंध और सिटिंग रूम में बनी कांच की अलमारी में बोतलबंद सुनहरे पानी की आकर्षक चमक में अनगढ़ खेतों में कभी मौजूद रही हरियाली के बिम्ब फिर कहीं बिला जाते थे।
एक बिल्डर के रूप में बुद्धिबल्लभ अब स्थापित हो चुका था। सरकारी नीतियां इस वक्त पर्यटन को बढ़ावा देने वाली थीं और तेजी से बन रहे होटल, कॉटेज, लॉज इत्यादि के निर्माण के बड़े ठेके ले कर वह अपनी पहचान को खासा मजबूत कर चुका था। पैसा और पहचान कमा लेने के बाद, जैसा कि प्रायः होता है, राजनीति में अपना मुकाम तलाशने की कोशिश उसे बरास्ते ग्रामप्रधानी ब्लॉक प्रमुख तक की सीढ़ियां चढ़ा चुकी थी। पास के शहर में शराब के एक दो ठेके भी अब तक उसे स्वाभाविक रूप से सहज ही हासिल हो चुके थे।
क्रशर, रेता-बजरी, ठेकेदारी, शराब और राजनीति के स्वर्ण चतुर्भुज से जब जिंदगी टेकऑफ करती है तो उसकी स्पीड इतनी तेज होती है कि अपने आजू-बाजू के साथ साथ सामने खड़ा लक्ष्य भी अक्सर धुंधलाने लगता है; उड़ने वाले को खुद भी ध्यान नहीं रहता कि वह कहां जा रहा है, कहां पहुंच कर रुकना है।
इन बारह-चौदह सालों में बहुत आगे निकल चुका था बुद्धिबल्लभ। उसके पास पैसा था, साधन थे, समर्थकों की भीड़ थी, जी हुजूरी करने वालों की अच्छी खासी जमात थी। और जब यह सब अपने पास होता है तो इंसान को यह मुगालता होने लगता है कि उसमें झरिया और रानीगंज को कोयला, मुजफ्फरनगर को गुड़ और नासिक को अंगूर बेचने की काबिलियत जन्मजात है, और वह जो चाहे हासिल कर सकता है।
चुनाव नजदीक थे और बुद्धिबल्लभ को इलहाम हुआ कि अब उसे एम एल ए बन जाना चाहिए। पैसा, शराब और अच्छे भले दबदबे के चलते ‘माननीय’ बन सकने की राह उसके लिए बहुत कठिन थी भी नहीं। पर इसी बीच विरोधी खेमा संयुक्त परिवार से उसके एक हमउम्र को ढूंढ लाया, जिसके पास धन संपदा के अलावा अतिरिक्त योग्यता के रूप में विभिन्न धाराओं में आरोपी होने का शानदार अनुभव था। चुनावी माहौल की बुलंदी में कभी सिद्ध न हो सकने वाले ये आरोप अक्सर समाज सेवा के सतत और निष्काम संग्राम में मिले तमगे बन जाते हैं।
खैर… हालात कुछ ऐसे बने कि बुद्धिबल्लभ चुनाव हार गया, और यह हार, जैसा कि आमतौर पर होता है, बहुत जल्द ही उसके रुतबे, दबदबे, और अचानक आयी दौलत की भी हार बन गयी। शुरुवाती दौर में उसके साथ जुड़े खैरख्वाहों ने वक्त रहते उससे किनारा कर लिया, और उसके अलग अलग धंधों में लगी अपनी पूंजी निकालना शुरू कर दिया। लकड़ी चोरी, अवैध खनन, ब्लॉक प्रमुख रहते हुए ठेकों में की गयी हेरा फेरी के अलावा कुछ ऐसे किस्से कहानियां जिनका जिक्र पहले उसके विरोधी भी दबी जुबान से करते थे, अचानक चाय की दुकानों में होने वाली बहस और नुक्कड़ की तकरीरों का सबब बनने लगीं। कोर्ट कचहरी के चक्कर और बैंक का लोन चुकता करने में जमीन, होटल, कॉटेज, वगैरा धीरे धीरे हाथ से निकलने लगे। गाड़ियां बिकीं, जेसीबी मशीन ने भी मालिक बदले और फिर जो कुछ बचा था उसे उसने उन्ही लोगों को जिन्हें उसने कभी अपना पार्टनर बना कर बसाया था, लीज पर दे दिया।
पच्चीस बरस का लंबा अरसा तेजी से घटती इस घटनाओं को समेटते हुए न जाने कब, कैसे और कहां गुजर गया। इस बीच सर्दियों की एक शाम को अपने पुराने घर की सड़ी लकड़ियों का अलाव तापते हुए नंदाबल्लभ इस नश्वर संसार से रुखसत हो चुका था। बताया जाता है कि जिंदगी के आखिरी दौर में वह बदहवास सा आसपड़ोस की बसाहट में घूमते हुए लाही और पालक के पत्ते तोड़ कर घर ले आता, और भांगा डाल कर उनका कापा बनाने की जिद किया करता था।
बुद्धिबल्लभ अभी जिंदा है। अपने बदरंग हो चुके मकान के बरामदे में बैठ शिवाज रीगल की खाली बोतल में देसी दारू भर कर पीते हुए वह पुराने दिनों को याद करता है। कभी कभी ज्यादा चढ़ जाने पर अपने आंगन की जंग लगी रेलिंग को बेतहाशा झिंझोड़ते हुए वह उन सबको गरियाता है जिन्हें उसने कभी अपने घर के आसपास की ज़मीन बेची थी।
बुद्धिबल्लभ का बेटा अब जवान हो चुका है। उसके माँ-बाप ने शायद बहुत उम्मीदों से उसका नाम कीर्तिबल्लभ रखा था। घर के पास ही बनी पैराग्लाइडिंग साइट में, जिसे कभी उसके पिता ने बनाया था, उसे गाइड की नौकरी मिल गयी है। बची हुई ज़मीन का एक टुकड़ा बेच कर उसने अपने लिए एक मोटरसाइकिल खरीद ली है। ग्लाइडिंग के लिए लाए गए टूरिस्टों की एवज में इतना कमीशन तो मिल ही जाता है कि मोबाइल, चरस और स्मैक का खर्चा निकल सके। बचा हुआ पैसा पटरी पर बिकने वाली पुरानी विदेशी जीन्स और जैकेट खरीदने के काम आ जाता है।
तेज रफ्तार और ऊंची उड़ान का शौक कीर्तिबल्लभ को अपने पिताजी से विरासत में मिला है। अपने सपनों का पीछा करते हुए वह शायद किसी दिन किसी टूरिस्ट के टेंडम पैराग्लाइडर का पायलट जरूर बन जायेगा।
































