राजीव लोचन साह
अंकिता हत्याकांड की सी.बी.आई. जाँच करने की माँग स्वीकार कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अपना हठ छोड़ कर लचीलापन भी दिखलाया है और मजबूरी भी। इस माँग को स्वीकार करने के अतिरिक्त उनके पास और कोई चारा नहीं रह गया था। इसे न मानने के हठ से आन्दोलन उस ऊँचाई तक पहुँच जाता, जहाँ फिर उनकी सरकार का बचना मुश्किल हो जाता। परन्तु सिर्फ सी.बी.आई. जाँच पर्याप्त नहीं है, जैसा कि अंकिता के माँ-बाप की माँग है और जिसका समर्थन सभी विपक्षी दलों और जन संगठनों ने किया है, कि जब तक इस जाँच को सर्वाेच्च न्यायालय के न्यायाधीश की निगरानी में न किया जाये। कई सालों पहले सुप्रीम कोर्ट ने सी.बी.आई. को ‘पिंजड़े में बन्द तोता’ कहा था। केन्द्र की सत्ता में मोदी सरकार के आने के बाद, पिछले 12 सालों में, तो सी.बी.आई. ने अपनी विश्वसनीयता लगभग पूरी तरह खो दी है। उसका काम ज्यादातर सरकार के विरोधियों और आलोचकों को तंग करना मात्र रह गया है। ऐसे में अगर सी.बी.आई. को बगैर निगरानी के निरंकुश छोड़ दिया जाये तो पहले जाँच कर चुकी एस.आई.टी. की तरह वह न सिर्फ कथित ‘वी.आई.पी.’ को छोड़ सकती है, बल्कि इस बाद का भी डर हो सकता है कि इस अपराध में सजा काट रहे पुलकित आर्य आदि को बच निकलने का कोई कानूनी रास्ता दे दे।
अंकिता हत्याकांड को लेकर जिस तरह उत्तराखंड में गुस्सा बढ़ा, उसने बरबस 1994 के उत्तराखंड राज्य आन्दोलन की याद दिला दी। तब भी दशकों से चली आ रही पृथक राज्य की माँग को एकाएक अन्य पिछड़ी जातियों के लिये 27 प्रतिशत आरक्षण कीे घोषणा और फिर मुलायम सिंह यादव के पहाड़ियों की बाबत एक गैर जिम्मेदाराना बयान ने जबर्दस्त जन उभार में बदल डाला था। इस बार भी रोजगार-पेपरलीक, स्वास्थ्य सेवाओं की अनदेखी, जंगली जानवरों के बढ़ते हुए हमलों, पर्यावरणीय दुर्घटनाओं के बाद दिखने वाली लापरवाही और इस सबके साथ सरकारी दावों का झूठ फैलाने के लिये करोड़ों रुपये का अनावश्यक खर्च….. इस सबसे जो नाराजी धीरे-धीरे सुलग रही थी, सोशल मीडिया पर अंकिता हत्याकांड को लेकर उर्मिला सनावर के किये गये रहस्योद्घाटन से एकदम सतह पर आ गयी। जनता यह तो पिछले तीन साल से यह जान ही रही थी कि इस हत्याकांड में किसी वी.आई.पी. को बचाया जा रहा है। उर्मिला के वीडियो सामने आने पर उसका गुस्सा एकदम से भड़क उठा कि क्या हमारी बेटियों की अब यही नियति रह गयी है!
फिर ‘होसुक’ भी एक कारण रहा। ‘होसुक’ एक कुमाउनी शब्द है, जिसका मोटामाटी अर्थ है, ‘देखादेखी’ या फिर ‘मैं पीछे क्यों रह गया’। दो-चार स्थानों पर अच्छे प्रदर्शन क्या हुए कि देखादेखी गुस्से की आग पूरे प्रदेश में फैल गयी। उत्तराखंड का शायद ही कोई शहर या कस्बा ऐसा बचा हो, जहाँ बड़े-बड़े जलूस न निकले हों। यह प्रवृत्ति 1994 के राज्य आन्दोलन में दिखाई दी थी। तब दैनिक अखबारों के माध्यम से एक स्थान से दूसरे स्थान तक सूचनायें पहुँच जाती थीं, अब जब सरकारपरस्त मीडिया का काम खबरों को छुपाने का रहता है तो सोशल मीडिया ने यह जिम्मेदारी उठायी।
जिस स्तर तक आन्दोलन पहुँच गया था, सरकार के लिये इसे अनदेखा करना कठिन हो गया। फिर भी सरकार ने अपनी चालाकियाँ छोड़ी नहीं। पहले सरकार के संरक्षण में उत्तराखंड में साम्प्रदायिक नफरत फैलाने वाले दर्शन भारती नामक एक भगवाधारी को यह जिम्मेदारी सौंपी गयी कि वह वीडियो जारी करने के बाद भूमिगत हो गयी उर्मिला सनावर को सामने लाकर उससे ऐसे बयान दिलवाये कि पूरे मामले में लीपापोती की जा सके। अब तक निश्चिन्त होकर उन्माद फैला रहे भगवाधारी की यह कोशिश असफल हो गयी तो अंकिता के माँ-बाप को मुख्यमंत्री से मिलाने के लिये गुपचुप ढंग से देहरादून ले आया गया। सोचा यह गया था कि मुख्यमंत्री अत्यन्त आदर के साथ उन्हें शाॅल पहना कर कोई लालच दे देंगे तो वे वैसा ही कोई बयान दे देंगे, जैसा सरकार चाहती है। मगर वीरेन्द्र भंडारी और उनकी पत्नी सत्ता के भौंकाल में नहीं आये। उन्होंने यही बयान दिया कि वे सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में सी.बी.आई. जाँच चाहते हैं और उस वी.आई.पी. को सजा दिलवाना चाहते हैं, जिसके कारण उनकी मासूम बेटी को अपना बलिदान देना पड़ा। उनकी पत्नी सोनी देवी ने तो कैमरे पर रोते हुए यह तक कहा कि उनकी बेटी तो चली गयी, मगर वे नहीं चाहतीं कि उत्तराखण्ड कि किसी और बेटी के साथ वैसा न हो। उन लोगों यह सावधानी भी बरती कि सरकारपरस्त गोदी मीडिया के सामने न आयें और चुनिन्दा लोगों के सामने ही अपनी बात रिकाॅर्ड करवायें। अब तो मुख्यमंत्री के पास सी.बी.आई. जाँच की मानने के अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह गया। मगर फिर भी उन्होंने इतनी चालाकी बरती कि सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जाँच कराने की बात को टाल गये।
इस जाँच की घोषणा से सरकार को तात्कालिक रूप से थोड़ा बहुत लाभ भी मिला, क्योंकि 11 जनवरी को आहूत ‘उत्तराखंड बन्द’ पूरे प्रदेश में उस तरह मुकम्मल नहीं हो सका, जिसका सरकार को डर था। गढ़वाल के कुछ बड़े शहरों में यह सफल रहा, जबकि कुमाऊँ के सबसे बड़े शहर हल्द्वानी में यह पूरी तौर पर असफल रहा। दरअसल कुमाऊँ में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने बन्द के आह्वान में कोई रुचि नहीं ली और व्यापार मंडल में मौजूद भाजपा के स्लीपर सेल ने इसे असफल करने में पूरी जान लड़ा दी।
फिलहाल धामी सरकार कुछ राहत की साँस ले सकती है। देखना है कि यह आन्दोलन आगे कया रूप लेता है।
































