प्रेम पंचोली
सीमांत जनपद उत्तरकाशी मुख्यालय से विश्वप्रसिद्ध गंगोत्री धाम को ऑलवेदर रोड से जोड़ने के लिए सरकार और पर्यावरण कार्यकर्ताओं में तकरार जारी है। क्योंकि इस अन्तराल में हजारो देवदार के पड़ों को काटा जाना है। मामला जितना जरूरी सड़क निर्माण का है उससे अधिक गंभीर मामला पर्यावरण के नुकसान का भी है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि उत्तरकाशी मुख्यालय से गंगोत्री तक वाला क्षेत्र कानूनन ईको सेंसटिव जोन माना गया है। इसलिए इस क्षेत्र में इस तरह के बड़े निर्माण पर प्रतिबन्ध है। जहां इस तरह के बड़े निर्माण जैवविधिता को नुकसान पंहुचायेंगे, साथ साथ प्राकृतिक आपदाओं को भी आमन्त्रण देंगे, ऐसा लोगों का मानना है। इसलिए लोग आन्दोलित है।
आन्दोलनकारियों का कहना है कि वे सड़क निर्माण के विरोध में कदापि नहीं है। मगर भारी भरकम चौड़ी सड़क निर्माण में जो पर्यावरण का नुकसान होगा इसकी उन्हे चिन्ता है। इसलिए उन्होंने बाकायदा एक विकल्प भी सुझाया है। बताया गया है कि सुखी, जसपुर से होकर मौजूदा सड़क को लोग यथावत चाहते हैं। कहीं से भी सड़क मार्ग को आलवेदर के नाम पर दूसरी तरफ एलाइनमेंट होता है तो उसका भी लोग विरोध करेंगे। यह भी मांग की जा रही है कि जसपुर से लेकर झाला, पुराली होते हुए हर्षिल तक नई सड़क बनाई जाए, जहां एक भी पेड़ नहीं है और अच्छी धूप भी रहती है। हर्षिल से मुखवा तक सड़क बनी हुई है और मुखवा के लोग चाहते हैं कि उनकी सड़क आगे जांगला तक निर्मित हो। यदि इस पर भी ध्यान दिया जाता है तो निश्चित ही झाला से भैरव घाटी के बीच असंख्य देवदार के छोटे-बड़े पेड़ों को बचाया जा सकता है और इस क्षेत्र में यात्रा सीजन के समय जाम से भी छुट्टी मिलेगी। इस सुझाव के लिए पर्यावरणविद् सुरेश भाई ने एक नक्शा भी प्रस्तुत किया है जिसे यहां चस्पा किया जा रहा है।
उल्लेखनीय यह है कि भागीरथी घाटी का यह अति संवेदनशील जोन है। यहां पर पिछले लंबे समय से ग्लेशियर से आने वाले गाड़ – गधेरे बहुत संवेदनशील हो चुके हैं। जो कभी भी धराली जैसी आपदा को फिर से बुला सकते है। जबकि सरकार को भी यह मालूम है। मगर ऑलवेदर सड़क निर्माण के लिए सरकारें कुछ आवश्यक कार्रवाई पर आगे नहीं बढ पाई। भारी विरोध के बाद सरकार ने 24मी॰ की सड़क की चौड़ाई अब 12 मीटर कर दी है। तब भी इस निर्माण से तीन हजार से भी अधिक देवदार के हरे पेड़ो को कटने की पूरी पूरी संभावना है। बता दें कि गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग स्थित हर्षिल के पास लगभग 100 मीटर की दूरी तक सघन देवदारों के पेड़ो पर लगाये गये निशान को देखकर लोग चौंक गये। क्योंकि यहां पर 10-11 मीटर तक सड़क चौड़ीकरण के लिए इतनी अधिक चौड़ाई में देवदार के घने पेड़ों को काटने का औचित्य किसी के भी समझ में नहीं आया है।
जबकि बीते 5 अगस्त 2025 को खीर गंगा, तिल गाड़, भेला गाड़, लोध गाड़, लेमचा गाड़ इसी से जुड़े हुए हैं। जहां पर भारी जल सैलाब ने दर्जनों जिंदगियां समाप्त कर दी है। इसके बावजूद भी इसी क्षेत्र में भारी भरकम सड़क निर्माण के नाम पर देवदार के हरे पेड़ों को काटने की तैयारी चल रही है। अच्छा होता कि इस ऊंचे हिमालय क्षेत्र में मजबूत और टिकाऊ सड़क की आवश्यकता की जाती। जिसमें दो गाड़ियां आसानी से चल सके, ऐसे लगभग 6 मीटर चौड़ी सड़क की मांग की जा रही हैं।
फिलवक्त झाला से भैरों घाटी के बीच में ऑल वेदर सड़क चौड़ीकरण के नाम पर काटे जाने वाले देवदार के असंख्य छोटे-बड़े पेड़ों को बचाने के लिए पेड़ों पर ‘रक्षा सूत्र’ बांधे गये हैं। सैकड़ो लोगों ने आकर देवदार के पेड़ों को बचाने की शपथ ले ली है। इस दौरान डॉ० मुरली मनोहर जोशी का संदेश भी लोगों ने पढा है। जिसमे उन्होंने पेड़ो पर रक्षासूत्र बांधने वाले सभी को बधाई दी और कहा कि हिमालय हमारा पिता है और भारत हमारी माता है। इसलिए माता और पिता की रक्षा के लिए और उसमें गंगा का जल प्रवाह बना रहे। इसके लिए देवदार के पेड़ों को बचाना बहुत जरूरी है।
रक्षा सूत्र आंदोलन के प्रेरक सुरेश भाई और महिला नेत्री कल्पना ठाकुर, स्थानीय महिला नेत्री गीता गैरोला, सुशीला भंडारी, देवेश्वरी भट्ट का कहना है कि गंगा और हिमालय की रक्षा के लिए देवदार के पेड़ ग्लेशियरों की रक्षा कर रहे हैं। पेड़ों के इस महत्वपूर्ण योगदान को नकारना गौमुख ग्लेशियर के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। उन्होने यह भी बताया कि सड़क को इतना मजबूत और टिकाऊ बनवायें जिससे भविष्य में आपदा से भी बचा जा सके और भागीरथी में जमा हो रहे मलवे से यहां के हिमालय की संवेदनशील धरती को बचाया जा सके। इस सिलसिले में 27 नवंबर को इंडिया हैबिटेट सेंटर दिल्ली में डा० मुरली मनोहर जोशी और डॉ० कर्ण सिंह की उपस्थिति में एक राष्ट्रीय सेमिनार के दौरान उत्तराखंड के किसान नेता भोपाल सिंह चौधरी ने भी झाला से हर्षिल के बीच काटे जाने वाले हजारो देवदार के पेड़ों का मुद्दा उठाया था। जिसमें निर्णय लिया गया कि आपदा और जलवायु परिवर्तन के लिए संवेदनशील हिमालय क्षेत्र को बचाने के लिए देवदार जैसे देव वृक्ष को बचाना हिमालय को बचाने जैसा है। इधर पार्लियामेंट में कांग्रेस की सांसद रंजीत रंजन ने देवदार के पेड़ों पर बांधे गए रक्षा सूत्र आंदोलन की चर्चा की है। उन्होंने इसकी चर्चा पहले भी की थी तब केन्द्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने आश्वासन दिया था कि वे इस पर विचार करेंगे।
– पेड़ो को बचाने के लिए कई बार लामबन्द हुए लोग –
भागीरथी के इस जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 5 – 9 हजार फीट की ऊंचाई तक पहले भी वनों के व्यावसायिक दोहन के खिलाफ आंदोलन हुये हैं। 70 – 80 के दशक में चले चिपको आंदोलन के बावजूद भी 90 के दशक में यहां के देवदार वृक्षों के व्यावसायिक दोहन को रोकने के लिए रक्षासूत्र आंदोलन की पहल पर हर्षिल की पूर्व प्रधान बसंती नेगी ने देवदार के पेड़ों को बचाने में अहम भूमिका निभाई। जिसमें पर्वतारोही हर्षवंती बिष्ट, ग्लेशियर लेडी शांति ठाकुर का सहयोग मिला। जिसके बाद तत्कालीन केंद्र सरकार के द्वारा जांच के उपरांत दर्जनों वनकर्मी दोषी पाये गए थे। उस दौरान प्रसिद्ध पर्यावरणविद् स्व० सुंदरलाल बहुगुणा ने भी महिलाओं के इस महत्वपूर्ण कार्य का समर्थन करते हुए राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लेख लिखें। अब जब चौड़ी सड़क के लिए पेड़ों पर फिर से निशान लगाये गये है तो सुखी और हर्षिल गांव के लोगों ने 2017-18 में भी रक्षासूत्र आंदोलन चलाया। जिसमें गांधीवादी समाजसेविका राधा बहन भी इस क्षेत्र की महिलाओं के साथ खड़ी हुई और उन्होंने सुखी गांव की दर्जनों महिलाओं के साथ पेड़ों पर राखी बांधी। इसी सिलसिले में एक रिपोर्ट तैयार की गई थी जिसे केंद्रीय राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को दिल्ली में जाकर सौंपी गई थी।
गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर सुखी गांव से राजमार्ग को यथावत रखते हुए आगे जसपुर, पुराली, बगोरी से हर्षिल – मुखवा मार्ग से मौजूदा सड़क जांगला तक मिलाने की पहल स्थानीय पंचायत प्रतिनिधियों के द्वारा कई बार की गई थी। इस मांग के लिये मां गंगा के शीतकालीन गांव मुखवा के लोगों ने पंचायत चुनाव का भी पूर्ण बहिष्कार किया। यद्यपि वनों को यहां भी नुकसान होगा।
हालात – ए – गंगोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग –
गंगोत्री मार्ग पर जिस तरह से केवल 10 – 11 मीटर सड़क चौड़ीकरण के लिए लगभग 50 – 100 मीटर के ढलान पर देवदार के पेड़ों पर निशान लगाए गये हैं। उससे लगता है कि सड़क की चौड़ाई के अनुसार देवदार के पेड़ों के साथ न्याय नहीं किया जा रहा है। जबकि निशान तब लगाए गए थे जब 2016 में सड़क की चौड़ाई 18 – 24 मी॰ बताई गई थी। वन विभाग के आंकड़ों के आधार पर तो देवदार के पेड़ों की संख्या लगभग 7000 है। लेकिन विभिन्न अध्ययनों के आधार पर कहा गया है कि बाढ़ भूस्खलन के लिए संवेदनशील इस क्षेत्र में यदि एक भी पेड़ कटता है तो उससे लगभग 20-25 छोट पेड़ों को नुकसान होगा। जिसके कारण लाखों वनस्पतियां प्रभावित होगी।
इसी अगस्त 2025 में यहां पर गंगोत्री पर्वत श्रृंखला से ग्लेशियरों की झीले टूटकर धराली, हर्षिल, लोहरीनाग, लेमचा गाड आदि स्थानों पर जानलेवा तबाही का मंजर देखा गया है। जिस पर भाजपा नेता कर्नल कोठियाल का दावा है कि धराली में अभी भी 147 लोग मलवे के अंदर दबे हुए हैं। ऐसे संवेदनशील स्थानों पर यदि बड़ी मात्रा में पुराने वृक्षों का कटान होगा तो भविष्य में और बड़ी तबाही आने से कोई इनकार नहीं कर सकता है।
अंत में यह भी जानना जरूरी है
उत्तराखंड में 12 हजार करोड़ लागत की चार धाम सड़क चौड़ीकरण परियोजना की लंबाई 889 किमी है। जिसमें से केवल भागीरथी इकोसेंसेटिव जोन में 90 किमी और यमुनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर लगभग 24 किमी में सड़क चौड़ीकरण का काम शेष बचा हुआ है। क्योंकि यहां पर आ रही भीषण आपदा बार-बार चुनौती खड़ी कर रही है। अब तक किये गये सड़क चौड़ीकरण में विरोध के बावजूद भी लगभग 1 लाख छोटे-बड़े पेड़ों को काटा गया है। जिसमें पीपल और देवदार जैसी प्रजातियां शामिल है।

































