राजीव लोचन साह
एक और नया साल सामने है….ईसवी सन् 2026। कभी बड़ा जोश जगता था नये साल के नाम पर। अब बस इतना लगता है कि दीवार पर लगा हुआ कैलेण्डर बदलना है। कैलेण्डर भी कहाँ, अब तो हाथ में रहने वाले इस छोटे से आयताकार डब्बे, स्मार्टफोन, में सब कुछ समाया है। पहले उपहार में ढेर सारी डायरियाँ-कैलेण्डर मिल जाते थे, अब बदल चुके वक्त में उनका अकाल पड़ गया है और किसी को उनका न होना खलता भी नहीं।
उत्साह की कोई वजह दिखती ही नहीं। हम सोचते थे कि गिरने की कोई सीमा होती होगी। आखिर पाताल का भी तो कोई तल होता होगा! मगर यहाँ तो हालात साल दर साल लगातार गिर रहे हैं और गिरते चले जा रहे हैं। कोई अन्त ही नहीं। हमेशा साल शुरू होते वक्त एक उम्मीद जगती थी, जो साल के अन्त तक बिला जाती थी। अब वह उम्मीद रही ही नहीं। सबसे बड़ी चुनौती तो यह है कि उस उम्मीद को कैसे जिन्दा करें!
मगर होती है सा‘ब उम्मीद भी जिन्दा होती है। इस साल जनवरी में डोनाल्ड ट्रम्प ने दूसरी बार संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति का पद सम्हाला था। हमें ताज्जुब हो रहा था कि क्या अमेरिकी इतने लाटे हैं कि एक बार ट्रम्प को भुगत लेने के बाद भी दुबारा उसे अपनी गद्दी सौंप दी! जो आदमी न सिर्फ अपने चाल-चलन में गड़बड़ है, बल्कि जिसने पिछली बार जो बाइडन से हारने के बाद अपने समर्थकों से अमेरिकी संसद पर ही हमला करवा दिया था, उसे अमरीकियों ने पुनः अपना राष्ट्रपति क्यों चुना होगा ? और जैसी आशंका थी, ट्रम्प ने राष्ट्रपति बनते ही टैरिफ बढ़ा कर पूरे विश्व की व्यापार व्यवस्था में जबर्दस्त उथल-पुथल पैदा कर दी। अपने परम मित्र नरेन्द्र दामोदरदास मोदी पर तो उनकी विशेष कृपा रही, जब उन्होंने अमेरिका में अवैध ढंग से रह रहे भारतीयों को बाकायदा हथकड़ी-बेड़ियों से सुसज्जित कर वापस भेजा। अमेरिका को जुकाम होता है तो छींकें सारी दुनिया को आने लगती हैं। इस उथल-पुथल को कोसते हुए दुनिया भर के देश विश्व-व्यापार में नया संतुलन बना ही रहे थे कि उसी अमेरिका ने साल खत्म होने से पूर्व ही ट्रम्प की आँखों में बुरी तरह से खटकने वाले जोहरान ममदानी को न्यूयाॅर्क का मेयर चुन डाला।
इसीलिये कहते हैं कि उम्मीद छोड़नी नहीं चाहिये। गजा पट्टी के लाखांे लोग इजराइल की वहशियत के बावजूद किसी उम्मीद पर ही तो जिन्दा हैं।
निराशा का माहौल पूरे भारत में है। मगर जनता को रास्ता दिखाने और लोकतंत्र में उसकी आस्था बरकरार रखने के लिये जिम्मेदार संस्थायें हाथ झाड़ कर बिल्कुल अलग हो गयी हैं। न्यायपालिका को लकवा पड़ गया है। 2020 के दिल्ली दंगों के आरोपी उमर खालिद का अब तक जमानत में बाहर न आ पाना और उन्नाव में दलित किशोरी के बलात्कार और उसके पिता की हत्या के सजायाफ्ता विधायक कुलदीप सिंह सेंगर का जमानत में बाहर आ कर खुलेआम फूलमालायें पहनना इसके मात्र दो उदाहरण हैं। जो अदालत अरावली पर्वतमाला की ऊँचाई को 100 मीटर तक सीमित करने के सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर ले, उसके लिये क्या शब्द इस्तेमाल किये जायें ? एक-दो औद्योगिक घरानों को देश के सारे प्राकृतिक संसाधन लुटाने की सरकार की कोशिशों पर जो अदालत वैधता का ठप्पा लगा दे, उसे सदबुद्धि देने की सिर्फ ईश्वर से प्रार्थना की जा सकती है!
मीडिया का काम बहुत जिम्मेदारी का होता है। हम अक्सर कहा करते हैं कि ‘‘गुरु गाविन्द दोउ खड़े काको लागूँ पाँय, बलिहारी गुरु आपनो गोविन्द दियो बताय’’ में गोविन्द की ओर इशारा करने वाले गुरु को ही मीडिया होना चाहिये। मीडिया का काम सिर्फ सूचना दे देना भर नहीं होता है। सूचनाओं का विश्लेषण कर सही क्या है, उस ओर इशारा करना भी मीडिया का काम है। हम अपने सीमित संसाधनों के बावजूद उत्तराखंड राज्य आन्दोलन के दौरान ‘सांध्यकालीन उत्तराखंड बुलेटिन’ के रूप में छोटे स्तर पर यह प्रयोग कर के दिखा चुके हैं। मगर आज का मानवता विरोधी मीडिया तो सही सूचना भी नहीं देता। खबरों को खोल कर रखने के बदले खबरों को छिपा कर रखना उसका धर्म हो गया है। एक खास राजनैतिक विचारधारा द्वारा फैलायी जा रही साम्प्रदायिकता के ज़हर को उसने देश के कोने-कोने में इस तरह पहुँचा दिया है कि हल्द्वानी में बनभूलपुरा कांड हो रहा है, रामनगर में गोश्त के व्यापारी को बेमतलब पीटा जा रहा है; और तो और नैनीताल जैसे सभ्य, सुसंस्कृत और शान्त शहर में उस्मान कांड हो रहा है। अब बताइये, एक बच्ची के बलात्कारी को जब कानून के शिकंजे में ले ही लिया गया है तो एक पूरे शहर को हिंसा की लपटों में झोंकने की कोशिशों का क्या मतलब ? गांधी की हत्या की विचारधारा आज सर्वव्यापी और सर्वशक्तिशाली हो गयी है तो इसके लिये इस विचारधारा के आधार पर सत्ता के शीर्ष पर पहुँची हुई पार्टी और उसकी मातहती में काम करने वाली मजबूर नौकरशाही को तो समझा जा सकता है, परन्तु गोविन्द की ओर इशारा करने वाले उस गुरु को क्यों लकवा पड़ गया है ?
राजनीति अपनी जगह है। सत्तायें बदलती रहती हैं, थोड़े समय में बदलेें या थोड़ा लम्बे समय में। लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन के लिये पर्याप्त गुंजाइश है। आज की सत्ताधारी पार्टी ने चुनाव जीतने में ऐसी महारत हासिल कर ली है कि अब दुनिया भर के लोकतांत्रिक देश उससे यह सबक ले सकते हैं कि लोकतंत्र को नष्ट किये बगैर तानाशाही कैसे चलाई जा सकती है। लोकतंत्र का भ्रम भी बना रहे और तानाशाही की तरह मनमानी भी चलायी जाती रहे। शून्य, आयुर्वेद और योगा की तरह यह थीसिस आधुनिक विश्व को भारत की अमूल्य देन होगी। बहरहाल, भारत में लोकतंत्र अभी इतना कमजोर भी नहीं हुआ है कि इस शातिर चाल का जवाब न ढूँढा जा सके। कुएँ में जो अफीम घोल दी गयी है, उसका असर तो वक्त के साथ खत्म होगा ही।
इससे ज्यादा चिन्ता पर्यावरण को लेकर होती है। लाखों सालों में प्रकृति ने जो सम्पदा एकत्र कर हमें दी है, उसे हमने कुछ सौ सालों में बर्बाद कर के रख दिया है। विनाश की गति पिछले कुछ दशकों में इतनी तेज हुई है कि आगे अंधेरे के अलावा कुछ नहीं सूझता। विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की होड़ में लगे भारत के लिये अपनी राजधानी के निवासियों को साफ-सुथरी हवा दे पाना भी सम्भव नहीं रहा। ऐसा नहीं कि इस दिशा में कुछ सोचा या किया न जा रहा हो। नियमित रूप से दुनिया भर के देश सिर जोड़ कर बैठते हैं, मगर जहाँ कठोर फैसले लेने की बात उठती है, कोई भी अपनी सुविधाओं को छोड़ना नहीं चाहता: ‘‘पंचों का कहना सिर माथे, पर नाला यहीं गिरेगा।’’ कोरोना काल में एक विचार दिमाग में कौंधा था, अगर सारी दुनिया में एक साथ सारी तैयारी के साथ एक महीने के लिये लाॅकडाउन लग जाये तो कैसा रहे ? पृथ्वी ग्रह को साल में एक बार तो साँस लेने, अपना गड़बड़ाया हुआ संतुलन ठीक करने का मौका मिलेगा।
सत्तायें आती-जाती रहेंगीं। हमारा यह ग्रह ही जीवन के लायक न रहा तो क्या होगा ?
भारतीय गणतंत्र के एक राज्य के रूप में उत्तराखंड ने इस साल अपने 25 साल पूरे कर लिये हैं। 31 साल पहले जब एक पृथक राज्य की लड़ाई अपने चरम पर थी, उस समय ठठ की ठठ सड़कों पर उतर आयी उत्तराखंड की जनता की आकांक्षायें क्या थीं, इसे हम से बेहतर कौन जा सकता है ? हम ही तो थे, उसके साथ लगातार खड़े, उसे सही सूचनायें देते, उसकी दिशाहीनता को रास्ता दिखाते और उसकी अराजकता को अनुशासित करने की कोशिश करते। 2 अक्टूबर और मुजफ्फरनगर में माँ-बहनों के साथ भीषण अत्याचार के बाद हम ही तो उसकी हताशा तोड़ने और उसे दिलासा देने की कोशिश कर रहे थे।
तब लोग माँग क्या रहे थे ? बच्चों को शिक्षा और अपने घर पर ही अच्छा रोजगार मिले; रोगी को चारपाई पर लिटा कर घंटों पैदल चल कर अस्पताल न पहुँचाना पड़े; शराब के प्रकोप से महिलाओं को छुटकारा मिले; पैसे के दम पर यहाँ जमीनें खरीद कर यहाँ की संस्कृति को नष्ट करने वाले भू माफिया यहाँ न पनप सकें; अपनी जमीन पर यहाँ के निवासी इज्जतदार ढंग से रह सकें। यह सब मिला क्या ? मिला स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार से वंचना, लैंड ज़िहाद, थूक ज़िहाद, यूनिफाइड सिविल कोड और अपने आप को सर्वोत्तम साबित करने के लिये 1000 करोड़ का भारी-भरकम अनावश्यक खर्च। पिछले कुछ अंकों में हम नैनीताल समाचार के 25-30 साल पुराने अंकों के माध्यम से आपको यह सब बतलाते रहे हैं। यहाँ यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि अशोका यूनिवर्सिटी के सौजन्य से नैनीताल समाचार की 46 सालों की फाइलें डिजिटाइज हो गयी हैं और बहुत जल्दी वे इंटरनेट पर भी उपलब्ध हो जायेंगी।
बहरहाल, उम्मीद पर अब तक दुनिया कायम रही है और इसी उम्मीद के साथ हम आपको ईसवी सन् 2026 में ले चलते हैं। हैप्पी न्यू इयर!

































