गोविंद पंत ‘राजू’
हल्द्वानी से एक मित्र के बहुत सालों बाद अचानक आए फोन ने पुरमल सिंह धर्मशक्तू के निधन की दुखदाई सूचना दी। 1984 के आसपास पुरमल लखनऊ में टेलीफोन विभाग में कार्यरत था और उससे मेरा परिचय हिमालय की वजह से ही हुआ था। दरअसल रिजर्व बैंक के कुछ साथियों के साथ मिल कर हम लोगों ने लखनऊ में मॉन्ट्रेक एसोसिएशन नाम से एक संस्था बनाई थी। जिसके बैनर में हम लोग पर्वतारोहण और ट्रैकिंग के अभियान आयोजित करते थे। उन दिनों आई एम एफ से अनुमोदित अभियानों के लिए सरकारी और बैंक कर्मियों को विशेष छुट्टियां मिल जाती थीं। हम साल में छोटे बड़े 4-5 अभियान करते थे और पुरमल हर वर्ष कम से कम दो अभियानों में लीडर की हैसियत से शामिल होता था। इन अभियानों की तैयारी आदि के लिए हम लोग हफ्ते में तीन चार बार मिलते रहते थे। पुरमल के व्यक्तित्व में ऐसा कुछ था कि जल्द ही हम दोनों में गहरी आत्मीयता हो गई। वह बेहद हिम्मती और साफगोई पसंद इंसान था। बाहर से बेहद कड़क लेकिन भीतरी तहों में बेपनाह संवेदनशीलता से भरा हुआ। हमेशा दूसरों की मदद के लिए तत्पर और इसके लिए किसी से भी भिड़ने को तैयार। उसके किराए के घर में हमेशा पहाड़ से आए दःुख बीमारी या भविष्य तलाशने की खोज में निकले एक दो युवा मौजूद रहते थे। जिन अभियानों में हम उसे लीडर बनाकर भेजते थे, उन अभियानों के बारे में हम इस बात के लिए पूर्णतः आश्वत रहते थे कि चाहे कैसी भी परिस्थितियों क्यों न आऐं, अभियान सफल अवश्य होगा। हालांकि हर बार वापस आने के बाद अभियान में गए दो-तीन सदस्य पुरमल की कड़क लीडरी को लेकर दःुखी जरूर दिखाई देते थे मगर कुछ दिनों बाद जब अभियान के बारे में बात होती तो वह इस बात को दिल से स्वीकार करते कि अगर पुरमल साथ में नहीं होता तो शायद वह इस अभियान को पूरा ही नहीं कर पाते।
कुछ वर्ष बाद वह प्रमोशन होने के बाद अधिकारी बनकर पिथौरागढ़ पहुंच गया। पिथौरागढ़ वह अपनी इच्छा से जाना चाहता था और वहां पहुंचकर एक तरह से उसको अपनी जिंदगी का असली मकसद मिल गया। उसने पिथौरागढ़ पहुंचने के बाद स्थानीय युवाओं को संगठित करके उनको साहसिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए प्रेरित करना शुरू किया। मुझे उसने इस क्लब का संरक्षक बनाया था और इसके पहले बड़े वार्षिकोत्सव में मुझे भी आमंत्रित किया गया था। जल्द ही परमल ने पिथौरागढ़ में रॉक क्लाइंबिंग और ट्रेकिंग के लिए गतिविधियां शुरू कर दी थी। वह स्वयं रॉक क्लाइंबिंग की ट्रेनिंग देता था और युवाओं को प्रेरित करता था। बात के वर्षों में तो वह तमाम साहसिक गतिविधियों जैसे पैराग्लाइडिंग और रिवर राफ्टिंग आदि के लिए भी युवाओं को जोड़ता चला गया।
पिथौरागढ़ के पर्वतारोही सुरेन्द्र बिष्ट ने पुरमल के निधन पर लिखा,‘मैंने अपने हीरो पर्वतारोही पुरमल धर्मसत्तू के निर्देशन में पर्वतारोहण का 10 दिवसीय कोर्स पिथौरागढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में जाकर किया, जिस पर पुरमल धर्मसत्तू बहुत ही पैनी निगाह रखते थे और विभिन्न क्षेत्रों में स्वंय पहुँच कर सभी प्रशिक्षकों एवं प्रशिक्षणाधीन युवाओं का हौसला बढ़ाते थे। हमारे इस बैच के संजय उप्रेती बाद में उत्तराखण्ड राज्य पुलिस विभाग से एवरेस्ट विजेता बने और बाद की युवा पीढ़ी से शीतलराज और मनीष कसनियाल भी एवरेस्ट विजेता बने। और भी बहुत से युवाओं ने पर्वतारोहण और पैराग्लाइडिंग के क्षेत्र में बहुत अच्छा काम किया। सीमांत क्षेत्र पिथौरागढ़ जिले में साहसिक खेलों विशेष रूप से पर्वतारोहण का बीजारोपण और युवाओं में लोकप्रिय करने का श्रेय पुर्मल धर्मसत्तू को जाता है। उनके संरक्षण और निशा निर्देश में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान उत्तरकाशी को पिथौरागढ़ जिले से बेहतरीन पर्वतारोही भारत वर्ष को दिये जिन्होंने समय-समय पर एवरेस्ट के साथ ही विश्व के प्रमुख पर्वतों में आरोहण कर अपने क्षेत्र, अपना एवं देश का नाम रोशन किया। वे पिथौरागढ़ में ही 10 दिवसीय प्रशिक्षण में युवाओं को पर्वतारोहण का ऐसा शानदार प्रशिक्षण दिलवाते थे कि जब भी निम (नेहरू पर्वतारोहण संस्थान) में पिथौरागढ़ जिले के किसी युवा ने कदम रखा तो वहाँ के प्रशिक्षक कहते आपने तो धर्मसत्तू सर के अधीन प्रशिक्षण लिया है। आपको बेसिक कोर्स में जितना हम लोग प्रशिक्षित करेंगे उतना तो आप पहले से ही जानते हैं। इसका ये परिणाम रहता कि हर बार के प्रशिक्षण में शीर्ष के प्रमुख प्रशिक्षणार्थी पिथौरागढ़ जिले के रहते थे। धर्मसत्तू सर प्रशिक्षण के दौरान अंदर से बहुत कोमल और अनुशासन में बहुत सख्त रहते। उनका जाना सीमांत के लिए बहुत बड़ी क्षति एवं इस क्षेत्र में खालीपन छोड़ गया है।
जितनी जिंदादिली से वे जिये और युवाओं की हमेशा हर तरह मदद, मार्गदर्शन और एनके जीवन को सार्थक किया। हिमालय की चोटियां भी आज अपने प्रिय साधक के लिए शोक में डूब गई हैं।’
पिथौरागढ़ में रहते हुए उसे एक बार उत्तराखंड सरकार की तरफ से साहसिक गतिविधियों के लिए विशेष कार्य अधिकारी बनने का आमंत्रण भी मिला था लेकिन उसने यह कहकर उस आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया कि मैं तो इस काम में जुटा ही हूं। किसी अन्य बेरोजगार उपयुक्त व्यक्ति को यह जिम्मेदारी मिलेगी तो ज्यादा बेहतर होगा। बाद के वर्षों में उसे इक्का-दुक्का मुलाकाते ही हो पाई लेकिन साल में एक-दो बार हम दोनों एक दूसरे के संपर्क में जरूर आते थे और हर बार उससे बातें करके एक नई ऊर्जा और एक नई मस्ती का एहसास होता था। पिथौरागढ़ ने उसकी जिंदगी को नए आयाम दिए। वह वहां परेशान लोगों के लिए अभिभावक होता तो ट्रेड यूनियन के लोगों के लिए जबरदस्त नेता। युवाओं को मोटिवेट करना उसका प्रिय विषय था। वह बेहद प्यारा मित्र था, उतना ही प्यारा पर्वतारोही और उससे भी ज्यादा हिमालय के प्रति गहरी संवेदनशीलता रखने वाला इंसान।
उत्तराखंड की गुरु परंपरा के गोरखनाथ प्रभात उप्रेती जी ने जिन शब्दों में पुरमल को याद किया है उसके बाद कुछ और नहीं कहा जा सकता। प्रभात उप्रेती लिखते हैं, ‘वह बेवकूफों को बेवकूफ बनाकर अपना काम निकालने वाले नेता नहीं थे, न ही इस खूबसूरत दुनिया को बर्बाद करने वाले नेता। वह सुभाष चंद्र बोस की तरह वास्तविक नेता थे। अन्याय के खिलाफ खरी और सही सोच वाले। उनके इसी व्यक्तित्व के कारण लोग उन्हें प्यार से ‘नेता जी’ कहते थे। वह सही रास्ता दिखाने वाले नेता, सरताज थे। दबंग ऐसे कि बड़े अफसर से भी भिड़ जाने वाले, और कभी अपने मातहत की सहायता के लिए खम्भे पर भी चढ़ जाने वाले।
एक फारसी शेर है, जिसका अर्थ है “तू धर्मात्मा है और मैं नास्तिक। याद रख, इन दोनों के रहने या जाने से दुनिया के इस कारखाने में कोई फर्क नहीं पड़ता।”
लेकिन किसी खास के जाने से प्रकृति को फर्क पड़ता है भाई। प्रकृति की खास देन उनके होने से दुनिया में जो थोड़ा अच्छा बचा है, वह बना रहता है।
ृ उन्हें ‘कामरेड’ कहलाना पसंद था। जब मैंने उन्हें पहली बार देखा, तो वे मुझे जापानी मार्शल आर्ट के योद्धा जैसे लगे। गठी काठी, छोटी दाढ़ी और एक योद्धा जैसी दृढ़ता।
पुरमल सिंह, पर्वतारोही, पर्यटनविद, और भारत संचार निगम के अधिकारी, पिथौरागढ़ में पदस्थ थे। ‘आइस’ संस्था के फोटोग्राफर व पर्वतारोही वासू पांडे ने बताया था कि वह पिथौरागढ़ के नामी पर्वतारोहियों के पथप्रदर्शक रहे जिनमें सात बार एवरेस्ट विजेता लवराज सिंह धर्मशक्तु भी शामिल हैं।
मुनस्यारी के हरकोट में जन्मे इस मातृहीन, अक्खड़ और संघर्षशील व्यक्ति ने सात साल की उम्र से ही लड़ाई शुरू कर दी थी। भाला लेकर खटीमा की सड़ी गर्मी में पहरेदारी की, फिर कंडक्टरी भी की।
वह कहा करते थे – “पहली जरूरत सही शिक्षा की है, विक्षिप्त शिक्षा की नहीं। सब्सिडी पूंजीवादी षड्यंत्र है। नौकरी की मानसिकता वाले लोगों के लिए आने वाला युग भयंकर होगा। नौजवान राहजनी करेंगे।”
उन्हें बर्फ रहित नंगे पहाड़ों की चिंता बीस साल पहले ही थी। नंगी चोटियों को दिखाते हुए कहते – “प्रभू! यह भूस्खलन, यह बेतरतीब सड़कें, हम आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहे हैं?” कहते – “हम होमोसेपियन्स पहले क्या रहे होंगे! आज हम उसी प्रकृति को बर्बाद कर रहे हैं, जिसके सहारे हम जिंदा रहे।”
अपने जनजातीय लोगों की जीवन-पद्धति मिटने पर उन्हें अत्यधिक दुःख था।
‘‘हम जनजातियों की जीवन-पद्धति में कोई कम्प्लीकेशन, कोई तनाव नहीं था। हम यथार्थवादी, प्रकृतिवादी रहे। आज हम अपनी पद्धति छोड़कर ब्राह्मणवादी जीवन अपना रहे हैं।”
वे कहते – “हम अपनी ही चीज से दुनिया को मात दे सकते हैं – अरज्या, गीमा, यहां का आलू, छिमुका करेला, गुंजी की गोभी। हम सब भूल रहे हैं। हमें अपने पर्यटन क्षेत्र और खानपान को बचाना पड़ेगा।”
वे कहते – “हम अपनी ही चीज से दुनिया को मात दे सकते हैं – अरज्या, गीमा, यहां का आलू, छिमुका करेला, गुंजी की गोभी। हम सब भूल रहे हैं। हमें अपने पर्यटन क्षेत्र और खानपान को बचाना पड़ेगा।”
“बुरूंश और देवदार के पेड़ काट दिए हैं दाज्यू! तिमूर समय से पहले ही कुल्हाड़े से काट लेते हैं, इसलिए बीज ही नहीं बनते, बीज जिन्हें साग में डालो तो स्वाद अहा!”
फिर बताते – “दारमा, व्यास सब फूलों से भरे हैं। दारमा का कंडाली मेला, व्यास मेला, दुग्तू में गोमे, छोटा कैलाश, नामी ढांग का ओम पर्वत, दयसां-देहना, छांगू, मरोतोली ग्लेशियर, थौर, छू ग्लेशियर, नम-नामिक सब पर्यटन के स्वर्ग हैं। इन्हें हम खो देंगे!”
“पॉल्यूशन तो दिमाग में है, बाहर थोड़ी है! आई एम एफ तो नौकरशाही है।”
वह बेहतरीन समझ वाले, वास्तविक प्रोग्रेसिव इंसान थे। उनका मोटिवेशन आज की तरह व्यापार नहीं था। वह वास्तविकता और अपने स्वभाव की देन था। कहते – “हम अपने निवास को ही धन कमाने का केंद्र बना सकते हैं, हम जन्मजात व्यापारी हैं।”
मौन साधक पुरमल जी अभी अभी दिवंगत हुए। कुछ लोग साक्षात जिंदगी की तरह होते हैं। कमाल होते हैं। वह भी ऐसे ही थे। कम जाने गए, पर बहुत कुछ कर जाने वाले। मानव चेतना के लिए एक उपहार।
उनके निधन पर न कहीं झंडे झुके, न कोई दनदनाता समाचार आया। लेकिन जिनके दिल उन्होंने धड़काए, जिन्हें जीवन के मूल भाव को जीना सिखाया। वह सब आगे भी एक डीएनए की तरह जीवित रहेगा।
उनकी इच्छा थी कि मृत्यु के बाद उनका शरीर काम आए। पता नहीं किस तकनीकी वजह से देरी हुई, लेकिन नैनीताल के जिलाधिकारी की पहल के बाद उनका शरीर अस्पताल को सौंपा जा सका।
पुरमल धर्मशक्तु अपने आप में एक ऐसी शख्सियत थे जिनके होने से दुनिया सब्ज और सुंदर दिखती है।’’
पुरमल नहीं रहा, उसकी देह किसी और के काम आएगी और उसके काम बहुत सारे लोगों को सही तरीके से जिंदा रहने की ताकत देंगे।
नैनीताल समाचार परिवार की श्रद्धांजलि !
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