विनोद पांडे
सन् 1976 में नैनीताल और नैनीताल के डीएसबी काॅलेज की रंगत कुछ और ही हुआ करती थी। पढ़ाई का माहौल अपने उरूज पर होता था। सन् 75 में इमरजेंसी लगने के बाद काॅलेज की नाममात्र की छात्र राजनीति भी खत्म हो गयी थी। हालांकि हल्द्वानी कुछ छात्र जिनमें से अधिकांश लंघम होस्टल में रहते थे, की चारों तरफ दादागिरी चलती थी। काॅलेज से कई सुविधाऐं मिलती थी जैसे फीस माफी। वे अपनी और दोस्तों को इसका फायदा दिलवा देते थे। इसके लिए फीस माफी के आर्टस ब्लाॅक के प्रभारी भी खासे बदनाम भी थे। इसी माहौल में बीए में एक नये छात्र ने एडमिशन लिया था। उसकी कद काठी और पर्सनैलिटी कुछ अलग तरह की थी। वह अल्मोड़ा से आया था। उसके पिताजी वहां पर कई साल पोस्ट ऑफिस में रहे और अब उनका तबादला नैनीताल हो गया था। वह लड़का सन् 1972 में शमशेर सिंह बिष्ट के अध्यक्ष पद के ऐतिहासिक चुनाव में उनका समर्थक रह चुका था। नैनीताल आकर वह कांग्रेस विशेषकर यूथ कांग्रेसियों के नजदीक रहता था। इमरजेंसी में और कुछ विकल्प बचे भी नहीं थे। जब उसे काॅलेज में फीस माफी आदि की अनिमियतता दिखी तो वह बात करने के लिए उन्हीं प्रभारी प्रवक्ता के पास चला गया। स्वाभाविक रूप से उनके पास इसका कोई उत्तर नहीं था। उनसे इस तरह की फीस माफी को रद्द करने को भी कहा। उन्होंने उसे कुटिलतावश उसे दूसरे दिन 11 बजे आने को कहा। वह भोलाभाला इंसान दूसरे दिन उन्हीं प्रवक्ता के कमरे की ओर बढ़ रहा था लेकिन वहां तक नहीं पहुंच पाया। उसे उससे पहले ही उन दादाओं ने पकड़ लिया और घसीटते हुए आर्टस ब्लाक के दुमंजिले से लात-घंूसे मारते हुए रीडिगं रूम के आगे पटक गये। उन गुंडों के खिलाफ किसी को भी बोलने की हिम्मत नहीं थी। उनका खौफ ही ऐसा था।
वह बताता था कि बुरी तरह पिटा हुआ वह बहुत देर कराहता रहा कोई मेरी मदद को नहीं आया। मैं किसी तरह लडखड़ाते हुए हिम्मत करके सीमेंट हाउस अपने घर पहुंचा। तीन दिन घर में पड़ा रहा। जैसे ही चलने की हिम्मत आयी फिर काॅलेज आने लगा। उसने खुद प्रधानाचार्य डा0 राकेश गुप्त से इसकी शिकायत की। उसकी पिटाई की खबर पूरे शहर में फैल गयी थी पर किसी में प्रतिरोध करने का साहस नहीं था। वह पूरे आत्मविश्वास से काॅलेज आता रहा। इस घटना ने उसकी आगे पूरे जिन्दगी में प्रतिरोध के बीज बो दिये थे। उसे अभी कई बार पिटना था और कई बार जेल जाना था। यह छात्र राजेश्वर प्रसाद बहुगुणा या कामरेड राजा बहुगुणा था।
मैं और निर्मल जोशी तब एम.ए. प्रथम वर्ष में आ गये थे। कुछ दिन पहले शमशेर सिंह बिष्ट जी के नेतृत्व में नैनीताल से गोपेश्वर तक बिना पैसे लिए पदयात्रा कर चुके थे। हम पर्वतीय युवा मोर्चा के सक्रिय सदस्य बन चुके थे और जनवादी विचारों में ढल सकने वाले छात्रों की तलाश में रहते थे। निर्मल ने उससे संपर्क साधना शुरू किया और उसकी स्पष्टवादिता और उत्साह से वह बहुत प्रभावित हुआ। फिर एक दिन निर्मल और मैं उसके घर ही चल दिये उससे बहुत बातें हुई। वह अघोषित रूप से पर्वतीय युवा मोर्चा से जुड़ गया था। बाद में उसने बताया कि हेमवती नन्दन बहुगुणा उसके ताऊजी होते हैं।
जल्द ही राजा ने नैनीताल के कई पुराने राजनीतिक लोगों से अपना संपर्क बना लिया। नैनीताल में इमरजैंसी में नहीं के बराबर गिरफ्तारियां हुई थी, मुझे तो केवल विद्या भाष्कर जी की याद है, उनकी कहानी फिर कभी। उसे लोगों को प्रभावित करने की अदभुत क्षमता थी। उसका बोलना और भाषण देना बिलकुल एक समान होता था। इसलिए शुरूआत में हमें उसका बोलना तो अस्वाभाविक लेकिन भाषण बहुत ही आत्मीय लगता था। वह बारीक मुद्दों को जल्दी पकड़ लेता था। उसने श्याम लाल वर्मा, पितदा, किशन कौनी, हरीश चंदोला, सखा दाज्यू, देवी दत्त सांगुड़ी, प्रताप भय्या आदि से वैचारिक संबध बना लिये थे। तब सखा दाज्यू सीपीआई और सांगुड़ीजी संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी में थे। इनमें से अधिकांश का तल्लीताल में देबी रैस्टोरंेट में अड्डा हुआ करता था और राजनीतिक मुद्दों पर बहस होती थी। ये हमारा इंडियन काॅफी हाउस हुआ करता था। राजा के चक्कर में हमें भी यहां चाय और बहसों का लुत्फ मिलने लगा और हम भी अपने से बड़ों के बीच में कुछ बोलने का साहस करने लगे। राजा की इस तरह की गतिविधियों से कई बार लगता था कि हम उसे ढाल रहे हैं या वह हमें सिखा रहा है। बहरहाल दोस्ती गहरी होती चली गयी। वह सिगरेट,पान शराब कुछ नहीं पीता था। इसलिए उसकी छवि आमतौर पर अच्छी थी, इस कारण वह हमारे घरों में पूरी तरह घुस कर परिवार का सदस्य बन गया था।
काॅलेज में राजा की पिटाई धीरे-धीरे गांधी की द0 अफ्रीका के पीटरमैरिट्र्जबर्ग के रेलवे स्टेशन की पिटाई जैसी बनने लगी यानी पीटने वाले उससे नजर बचाकर निकलते और वह हीरो की तरह काॅलेज में घूमता। पूरे काॅलेज में उसकी एक पहचान बनने लगी थी।
सन् 77 आते-आते हम काफी घुलमिल चुके थे। राजा पूरी तरह कांग्रेस विरोधी हो चुका था। इस बात से उससे घर में नाराजी रहती थी। उसकी एक शादीशुदा बहन के अलावा दो छोटी बहनें अनीता और रश्मि थी और एक छोटा भाई राजीव था। पिताजी की उम्र पचास से उपर थी। इसलिए बड़ा भाई होने के नाते उस पर घर की बहुत जिम्मेदारी थी। तब तक वह निश्चित रूप से अच्छी नौकरी करने के ख्वाब देखा करता था। इमरजैंसी खत्म होते ही हम स्वाभाविक रूप से जनता पार्टी समर्थक हो गये। इससे उसके घर वाले बहुत नाराज हुए। पर शीघ्र ही बहुगुणा जी के जगजीवन राम के साथ कांग्रेस फाॅर डेमोक्रेसी बनाने से घर वालों को थोड़ा राहत हुई कि बेटा सोचता तो ठीक ही है। वह जनता पार्टी में बहुत सक्रिय था, उसकी बहुगुणाजी से रिश्तेदारी स्थानीय नेताओं को पता चल चुकी थी। चुनाव के तुरंत बाद उसे युवा जनता का संयोजक और मुझे उप संयोजक बना दिया गया। यह संगठन नैनीताल में कभी अस्तित्व में ही नहीं आया।
हमें जनता पार्टी पर बहुत विश्वास था कि वास्तव में अब बदलाव आयेगा। पर उनकी आपसी फूट से कार्यकर्ता बहुत परेशान थे। धीरे-धीरे हम भी जनता पार्टी से दूर होने लगे। जनता पार्टी के शासन को दूसरी आजादी कहा गया था। जुलाय में शमशेर सिंह बिष्ट की पहल और चन्द्रशेखर भट्ट, पीसी तिवारी और प्रदीप टम्टा की मेहनत से मनान में उत्तराखण्ड के प्रगतिशील गैर राजनीतिक संगठनों के कार्यकर्ताओं की बैठक बुलायी गयी। इसमें केदार सिंह कुंजवाल और चंडी प्रसाद भट्ट जैसे सर्वोदयी भी शामिल हुए। यह एक ऐतिहासिक सभा थी, इसमें तीन दिनों तक उत्तराखण्ड की समस्याओं, संभावनाओं और भावी कदम के संबध में गहन विचार विमर्श हुआ। विमर्श के केन्द्र में वनों की ठेकेदारी प्रथा, वनों से स्वरोजगार, कुटीर उद्योग और अवैज्ञानिक शोषण प्रमुख रहा था। इसके अंत में एक गैर राजनीतिक संगठन बनाने का निर्णय लिया गया जिसे उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी का नाम दिया गया। शमशेर इसके संयोजक बने। राजा की यहां शमशेर से विधिवत पहली मुलाकात हुई थी। वह उनसे पहले से ही बहुत प्रभावित था।
वाहिनी बनने के बाद हमें और उत्तराखण्ड के कई युवाओं को एक दिशा मिली। हम नैनीताल में वाहिनी का संगठन बनाने में लग गये। अभी मुश्किल से एक महीना बीता था कि 15 अगस्त के दिन तवाघाट में भारी भूस्खलन और इस घटना की सरकारी उपेक्षा के बाद हम लोग बहुत विचलित थे। वाहिनी ने इसके खिलाफ आंदोलन का एलान कर दिया, सभी प्रभावितों को मुआवजा और तराई में पुर्नवास करने की मांग रखी गयी। शमशेर, पीसी, प्रदीप, चन्द्रशेखर भट्ट, निर्मल जोशी, गिर्दा और जगत रौतेला आदि तवाघाट पहुंच गये। उन्होंने तवाघाट से धारचूला तक विशाल जुलूस निकाला और धारचुला में लगातार धरना प्रदर्शन में बैठ गए। उन्हें लगातार जन समर्थन मिल रहा था। 15 अगस्त से नैनीताल समाचार का प्रकाशन शुरू हो गया था। इस घटना पर सुन्दर लाल बहुगुणा ने अनेक समाचार पत्रों सहित नैनीताल समाचार के लिए लेख लिखे। राजा और मैं नैनीताल में ही थे। हम यहीं से तवाघाट के लिए जन समर्थन जुटाने में लग गये। इसमें राजा का जन संपर्क बहुत काम आया। हमें जिस तरह समर्थन मिल रहा था उससे हमने एक दिन एक बैठक और उसके बाद नैनीताल बंद करने का तय किया। महेश लाल साहजी ने हमें सेवोय के डाइनिंग रूम में जगह दे दी। बैठक बहुत गर्मागर्म रही, इसमें छात्र नेताओं सहित राजनीतिक दल और गणमान्य लोगों की भागीदारी रही और नैनीताल बंद करने पर सहमति बन गयी।
हमने पोस्टरों के माध्यम से शहर में अपनी बात प्रचारित करने का निश्चय किया। पर हमारे पास पैसे नहीं थे। राजा ने कहा अगर हम किसी से पैसे लेंगे तो ठीक नहीं रहेगा। उसने संपर्कों का उपयोग करते हुए किसी दुकान से कागज, किसी से पेंट, किसी से गांेद आदि मांगा। तल्लीताल में पोस्टर बनाने के लिए जगह भी मिल गयी। दिन में हम पोस्टर बनाते और रात में चिपकाते थे। पुलिस हम पर नजर रखती थी, मल्लीताल के थानाध्यक्ष उपाध्याय हमारी इस कार्य प्रणाली से प्रभावित थे। कई बार हमसे हालचाल पूछते थे। बाद के आंदोलनों में उन्होंने हमारी अपनी सीमाओं के अंर्तगत मदद भी थी।
दूसरे दिन हमने कमिश्नर कुमाऊँ को इस संबध में ज्ञापन दिया। प्रशासन ने दबाब बनाने के लिए शहर में धारा 144 लगा दी गई। हमने ज्ञापन में कहा था कि 15 सितम्बर तक उनका पुर्नवास किया जाय। सरकार पर चारों ओर से जन दबाब बढ़ता जा रहा था। मजबूर हो कर सरकार ने पुर्नवास करने की मांग मान ली। विस्थापितों का पूरा पुर्नवास करने का आदेश जारी कर दिया गया। इससे हमारी शहर में अलग पहचान बनी। ये उत्तराखण्ड में छात्र राजनीति की भावी दिशा की एक जोरदार दस्तक थी। इससे वाहिनी की जल्द ही एक खास पहचान बन गयी। दरअसल वाहिनी के पास पर्वतीय युवा मोर्चा का काम था और शमशेर के बारे में यह छवि थी कि उन्होंने 1971 के चुनाव में विधान सभा के लिए कांग्रेसी उम्मीदवार का टिकट लौटा दिया था। इसके अलावा पर्वतीय युवा मोर्चा ने स्टार पेपर मिल को 40 पैसे प्रति क्विटंल के हिसाब से चीड़ के जंगल काट ले जाने के परमिट के खिलाफ जन जागरण शुरू किया था। मिल ने मोर्चा को कई तरह के प्रलोभन भी दिये पर उनका आंदोलन जारी था। उसके बाद एक सफल आंदोलन ने वाहिनी को शुरूआत में ही पर्याप्त उर्जा दे दी। हम सभी इससे बहुत उत्साहित हो गये थे।
अभी हम अपनी प्रारंभिक सफलता का जश्न मना ही रहे थे कि सितम्बर में एक खबर आ गयी कि 6,7 और 8 अक्तूबर को कुमाऊँ के जंगलों के हरे पेड़ों की नैनीताल के रिंक हाॅल में नीलामी होगी। “दूसरी आजादी” में हमें जंगल के बारे में जनता की भागीदारी की उम्मीद थी। 1973-74 में चिपको आंदोलन शुरू हो चुका था, उसे कुछ सफलताऐं भी मिली थी और कुछ प्रचार भी मिला था। इस माहौल में हमने नैनीताल से ही नीलामी का विरोध करने का निर्णय ले लिया। जिसे वाहिनी ने तुरंत स्वीकार कर लिया। दरअसल नैनीताल में 1974 में भी जंगलों की नीलामी का विरोध हुआ था और उत्तराखण्ड में कई जगहों पर इसकी पुनरावृति हुई पर जंगलों का कटान बदस्तूर जारी रहा था। पहले बाहर से आंदोलनकारी आते थे लेकिन इस बार नैनीताल के निवासी वह भी छात्र इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे थे। इसलिए प्रशासन ज्यादा ही सतर्क था, पहले से लगी धारा 144 को बढ़ा दिया गया।
6 अक्तूबर को अष्टमी का श्राद्ध था और स्कूल-काॅलेज बंद थे। यह दिन नीलामी के लिए जानबूझकर चुना गया था। रिंक हाॅल में कड़ी सुरक्षा में 9 बजे से जंगलों की नीलामी शुरू हो गयी। वाहिनी ने तल्लीताल डांठ से आक्रामक नारों के साथ नीलामी का विरोध करते हुए जुलूस निकाला। जुलूस में 8-10 ही लोग जुट पाये। ये राजा की रणनीति थी कि गिरफ्तारी ज्यादा न हो, पर प्रशासन इसे समझ नहीं पाया। रिंक हाॅल पहुंचते ही इनको गिरफ्तार कर मल्लीताल थाने में बंद कर दिया गया और नीलामी जारी रही लेकिन धीरे-धीरे छात्र व जनता के करीब एक हजार से ज्यादा लोग जमा हो गये। कुछ ने थाना घेर लिया कुछ ने रिंक हाॅल और प्रशासन पूरी तरह असहाय हो गया और नीलामी रदद दी गई। इतिहास रचा जा चुका था। सखा दाज्यू जो खुद भी गिरफ्तार हुए थे, ने भारी जन समुदाय को नियंत्रित करने के लिए इतना ही कहा-“जिनको तुम लौंड-मौंड समझते थे वे क्या-क्या कर सकते हैं आज आपने देख लिया, अब आप शाम को 5 बजे रामलीला स्टेज में आ जायें बांकी बातें वहीं होगीं।” शाम को रामलीला स्टेज में विशाल सभा हुई, संचालन राजा ने किया। किसी भी राजनीतिक व्यक्ति को बोलने का अवसर नहीं दिया। निर्णय लिया गया कि जब भी जंगलों की नीलामी होगी, उसका ऐसा ही प्रतिरोध किया जायेगा। साथ ही आंदोलन का ऐजेंडा भी रख दिया कि पहला- ग्रामीणांे के हक-हकूक आवश्यकता के अनुसार तय हों, दूसरा स्टार पेपर मिल का आबंटन तुरंत रद्द कर दिया जाय, तीसरा जंगलों में ठेकेदारी प्रथा को समाप्त किया जाय और चैथा कि सारे वनाधारित उद्योग पहाड़ों में ही लगाये जायें।
सरकार के लिए यह असहनीय था कि जंगल बिक नहीं पाये। तब जंगल उ0प्र0 के राजस्व का सबसे प्रमुख हिस्सा हुआ करते थे। साथ ही चै0 चरण सिंह पहाड़ों के खिलाफ थे और वन मंत्री उनके चहेते श्रीचंद थे। उनके होते हुए इतनी बड़ी घटना हो जाना किसी अपमान से कम नहीं था वह भी तब कि विपक्ष में बैठी कांग्रेस पूरी तरह हतास और बदनाम हो चुकी थी। एक नया गैर राजनीतिक संगठन जनता पार्टी के मजबूत शासन को लगातार झुकाते जा रहा था। दरअसल यह एक बहुत बड़ी राजनीतिक घटना थी जिसका नेतृत्व छात्रों के पास था। इसलिए सरकार ने 28 नवम्बर को चुनौती स्वीकार करने की मुद्रा मे नैनीताल में ही जंगल नीलाम करने की अधिसूचना जारी कर दी। उन्हें राजा बहुगुणा की नेतृत्व क्षमता का आभास नहीं था, न ही वे वाहिनी की विचारधारा और दृढ़ता का आंकलन कर पा रहे थे। दरअसल नैनीताल जैसे फैसनेबुल शहर में एक ऐसा मुद्दा खड़ा हो चुका था जो मुद्दा समझा ही नहीं जाता था। आंदोलन तोड़ने के हर हथकंडे अपनाया जाने लगे।
सरकारी हथकंडों के अंर्तगत एक दिन राजा के घर कंजरवेटर कुमाऊँ ने जबाब भेजा कि वह हमसे बात करना चाहते हैं। प्रशासन ने राजा को ही इस आंदोलन का प्रमुख व्यक्ति मान लिया था। हम लोग कंजरवेटर माथुर से मिलने गये। उनसे लंबी वार्ता हुई, अंत में उन्होंने हारकर हमारे आगे अपना टंªप कार्ड फेंक दिया। उन्होंने हमें दो चीड़ के लौट आबंटित करने का प्रलोभन दिया, दो चीड़ लौटों का अर्थ कम से कम लाख रूपये की कमाई थी। जिसे हमने वहीं पर न केवल ठुकुरा दिया बल्कि उन्हें खरी-खोटी भी सुनाई। वार्ता असफल हो गयी। माथुर एक ईमानदार व्यक्ति थे, उन्होंने हमें बताया कि ऐसा प्रस्ताव दरअसल सरकार की ओर से था। हमें कई दांवपेंचों के साक्षात अनुभव होने लगे थे। जो हमारा उत्साह बढ़ा ही रहे थे। इस बार जन संपर्क और सघन किया गया। वाहिनी की बैठक में दूसरी पंक्ति तैयार रखने पर ज्यादा जोर दिया जाता था। इस बार सारे कर्मचारी नेताओं, व्यापार मंडल और जीआईसी और सीआरएसटी के छात्रों की भी सभाऐं कर उन्हें तैयार किया गया था। सरकार भी पहले ज्यादा सतर्क थी। श्रीचंद तो इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना चुके थे। 26 नवम्बर से नैनीताल को छावनी में तब्दील किया जाने लगा। सुरक्षा की दृष्टि से इस बार शैले हाॅल को नीलामी स्थल बनाया गया। 27 नवम्बर शहर में पीएसी का फ्लैग मार्च किया गया और राजा सहित हम लोगों के वारंट जारी हो गये। जिसकी सूचना पुलिस ने हमें पहले ही दे दी। सभी लोग भूमिगत हो गये। 28 की सुबह सखा दाज्यू, प्रदीप टम्टा, निर्मल आदि को तल्लीताल डांठ से गिरफ्तार कर लिया। राजा, मैं, शेखर पाठक, राजीव लोचन और गिरदा सहित 10-12 लोग किसी तरह शैल हाॅल पहुंच गये। जहां गिरदा के ऐतिहासिक हुड़का और जनगीत “आज हिमाल तुमन कैं धत्यूंछौ” के साथ विरोध ने प्रशासन को फिर भ्रमित कर दिया। सभी को गिरफ्तार कर लिया गया।
जीआईसी और सीआरएसटी के बच्चों ने जुलूस निकाल दिया उन पर लाठीचार्ज से जनता का विरोध फूट पड़ा। हर कोई शैले हाॅल पहुंचने को दौड़ पड़ा। पुलिस ने लाठीचार्ज और गोलियां चलवा दीं। कई लोग घायल हो गये, एक व्यक्ति गोली से घायल हुआ। कुछ शरारती लोगों ने नैनीताल क्लब की पांच बिल्डिगों में आग लगा दी। नीलामी फिर रद्द करनी पड़ी। दिल्ली से छपने वाले राष्ट्रीय समाचार पत्रों में यह खबरें आयी। बहुत बड़ी घटना घट चुकी थी। दरअसल ये उत्तराखण्ड संघर्ष वाहिनी की शुरूआत थी और पर्वतीय युवा मोर्चा का वर्षों के संघर्ष का परिणाम दिखने लगा था जो दशकों तक उत्तराखण्ड में बना रहा।
28 नवम्बरकी नीलामी का रदद् हो जाना जन अधिकारों की जीत थी। अब तक राजीव लोचन साह, गिरदा जैसे लोगों ही आंदोलनकारी नहीं बने बल्कि आने वाली एक पीढ़ी इससे प्रभावित होने वाली थी। इन्हीं घटनाओं में राजा बहुगुणा का कांग्रेसी मानसिकता से कायान्तरण एक जनवादी नायक के रूप में हो रहा था। इस घटना के बाद वह चांचरीघारी, ध्याड़ी जैसे जमीनीं वन आंदोलनों में सक्रिय रहा। चिपको आंदोलन को पर्यावरण आंदोलन में बदल देने से वह विचलित रहता था। वह बिहार के कुछ भूमिगत आंदोलनकारियों के संपर्क में भी रहने लगा। बाद में नशा नहीं रोजगार दो आंदोलन के बाद जब आईपीएफ बना तो वह उसमें विधिवत चला गया। उसने एक चुनाव भी लड़ा जो बहुत ही गंभीरता से लड़ा। बाद में सीपीआई (एमएल) में उसने राष्ट्रीय स्तर की भूमिकाऐं निभायी।
यह उस आदमी के निस्वार्थ संघर्षों का संक्षिप्त सा परिचय है, जिसने अन्याय, अत्याचार के खिलाफ कभी समझौता नहीं किया। अभी इस बारे में बहुत कुछ लिखा जाना है। आशा है कि जन संगठनों द्वारा इस ओर विशेष ध्यान दिया जायेगा। ताकि उसके जनवादी कार्यों को सफलता तक ले जाया जा सके।

































