पवन गुप्ता/भुवन पाठक
उत्तराखण्ड राज्य की माँग के पीछे दो मुख्य कारण थे, (1), यहाँ के निवासियों की अस्मिता का सवाल और, (2). व्यवस्था से असंतोष।
अस्मिता का सवाल सीधे आत्मसम्मान और आत्मविश्वास से जुड़ा है। भारत का आत्मविश्वास पिछले 200 सालों में योजनाबद्ध ढंग से कुचला गया। अंग्रेजों के जमाने से ऐसी नीतियाँ चलीं, जिससे आम आदमी अपने को असहाय समझे। उसे हर चीज के लिये मोहताज बना कर लगातार राज्याश्रित बनाया गया। पर निर्भरता बढ़ाने के साथ उसके सोचने-समझने, रहन-सहन और सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं को भी लगातार तोड़ा गया। इसका परिणाम है कि आज आम आदमी अपनी भाषा, बोली, पहनावा, खानपान, यानी अपना जो कुछ है, उस सबसे संकोच करता हैं। उसके घर की दुनिया सार्वजनिक दुनिया से बिल्कुल अलग होती है। घर के अन्दर कुमाउनी-गढ़वाली, घर के बाहर हिन्दी या अंग्रेजी, घर के अन्दर हाथ से दालभात, घर से बाहर छुरी-काँटे से चाउमीन, घर के अन्दर पायजामा धोती, घर के बाहर पेण्ट-सूट। घर और बाहर की दूरी जितनी बढ़ती जाती है, घर की दुनिया जितनी सिकुड़ती जाती है, हमारा आत्मसम्मान उसी अनुपात में टूटता जाता है। अंग्रेजों ने सोच समझकर शासन करने के इरादे से ऐसा किया। लेकिन हमारे कथित पढ़े-लिखे, आधुनिक वर्ग की वजह से यह सिलसिला आज भी जारी है।
पश्चिम की नकल करते-करते हममें यह गलतफहमी घर कर गई है कि उसी मॉडल पर हमारा विकास हो सकता है। जबकि सच्चाई यह है कि उस तरीके से हमारे संसाधनों की असीमित लूट होती है और लाभ सिर्फ 5-10 प्रतिशत लोगों का होता है। नये उत्तराखण्ड में यदि पाँच सितारा होटलों और बड़ी-बड़ी सड़कों वाली एक खूबसूरत राजधानी हो, कुछ हजार विद्यार्थियों को सूचना प्रौद्योगिकी में प्रशिक्षण मिले, कुछ हजार लोग पर्यटन के मार्फत रोजगार पा जायें, यह भी एक तरह का विकास कहा जा सकता है। हो सकता है कि इस तरीके से 5-10 प्रतिशत लोगों की आमदनी बढ जाये। लेकिन यदि इस तरीके से 50-60 प्रतिशत लोगों का जीवन पूर्ववत् और शेष 30-40 प्रतिशत का जीवन बदतर हो गया तो उस विकास का क्या अर्थ है ? इसलिये हमे नये राज्य की व्यवस्थायें इस प्रकार बनानी होंगी ताकि लोगों को अपनी ताकत का अहसास हों और वे अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर पायें। मूल बात है कि तरीके उनके अपने हों। तभी उनका आत्मविश्वास जागेगा। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर भावी राज्य के लिये निम्न सुझाव तैयार किये गये हैं:-
1. स्थानीयता: ग्राम सभा शासन की प्रथम इकाई है। पंचायतों के बारे में किसी राज्य का विधेयक, पारम्परिक कानूनों, सामाजिक और धार्मिक व्यवहारों और समुदायिक संसाधनों का प्रबन्धन, पारम्परिक पद्धतियों पर निर्भर करेगा। राज्य कोई भी ऐसा कानून पारित न करे जिससे स्थानीय मान्यताओं का अतिक्रमण होता हो। ग्राम सभाओं को अधिकार हो कि वह अपनी व्यवस्थायें इत्यादि अपनी मान्यताओं और परम्पराओं के अनुसार चलायें। नीतियों द्वारा ऐसी व्यवस्था हो कि पंचायत स्वायत्तता के आधार पर कार्य करे तथा ऊँचे स्तर की कोई पंचायत नीचे स्तर की किसी पंचायत के अधिकारों को न समेटे।
2. न्याय व्यवस्था: पुरानी न्याय पंचायतों के आधार पर प्रत्येक ग्राम सभा-पंचायत को यह अधिकार प्रदान किया जायेगा कि वह सभी दीवानी और एक स्तर तक के फौजदारी मामलों का फैसला अपनी स्थानीय सामाजिक-धार्मिक मान्यताओं के आधार पर कर सके। प्रत्येक दीवानी एवं एक स्तर तक के फौजदारी मामलों की पहली सुनवाई ग्राम सभा-पंचायत स्तर पर ही हो। इस पंचायत में ग्राम प्रधान एक सचिव की भूमिका निभाये और 11-12 स्थानीय लोगों की एक पंचायत मनोनीत करे, जिसमें सभी वर्गों (दलित, महिला इत्यादि), का प्रतिनिधित्व हो तथा जिनके नामों पर दोनों पक्षों की आम सहमति हो। प्रत्येक ग्राम सभा इस बात के लिए समर्थ हो कि वह परम्पराओं, रीति-रिवाजों लोगों की सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक संसाधनों और विवादों (लड़ाई-झगड़े) को पारम्परिक प्रथाओं के आधार पर निपटा सकें। न्यायालयों की भाषा अंग्रेजी न होकर हिन्दी हो और साधारण आदमी भी वकील बन कर पैरवी कर सके।
3. सरकारी योजानाएँ: सरकारी योजनाओं के मामले में प्रस्ताव का अधिकार ग्राम सभाओं का हो। प्रत्येक ग्राम सभा सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए योजनाओं तथा कार्यक्रमों को स्वीकृति दे और उन्हें लागू करने से पहले उन लोगों की पहचान करें, करें जिन्हें गरीबी उन्मूलन तथा ऐसे अन्य कार्यक्रमों से लाभ मिलने वाला हो।
4. प्राकृतिक संसाधन एवं विकास की योजनाएँ: ग्राम सभा की सीमा में आने वाले प्राकृतिक संसाधनों, जल-जंगल-जमीन, का विकास कार्यों के हेतु उपयोग करने से पूर्व ग्राम सभा की सहमति अनिवार्य हो तथा उनका एक निश्चित हिस्सा अनिवार्यतः स्थानीय समाज को मिले। ग्राम सभा के अन्तर्गत भूमि के अधिग्रहण या खरीद-फरोख्त के लिए ग्राम सभा की अनुमति अनिवार्य हो। जमीन के मूल कागजात (रिकाडर््स) ग्राम सभा के पास हों। पानी-बिजली की छोटी योजनाओं के निर्माण एवं रखरखाव को ग्राम सभा के नियंत्रण में सौंपा जाये। ग्राम सभा की वन संपत्ति से प्राप्त कुल आय के 50 प्रतिशत पर ग्राम सभा का अधिकार हो। ग्रामवासियों पर असर डालने वाली विकास या पर्यटन की किसी योजना अथवा ऐसा कोई भी कार्यक्रम जिससे गाँव की जल, जंगल, जमीन और परम्पराओं पर असर पड़ सकता हो, की स्वीकृति ग्राम सभा पर निर्भर होगी उसके बाद ही राज्य उस पर अपनी स्वीकृति दे सके। ग्रामवासियों को इन योजनाओं, कार्यक्रमों की पूरी जानकारी पाने का अधिकार हो। ग्राम सभा की सीमा में बनने वाले किसी पर्यटन स्थल, होटल, लॉज आदि के स्थानीय समाज पर संभावित प्रतिकूल प्रभाव न पड़े, यह ग्राम सभा निश्चित करे। यह ख्याल रखा जाये कि इनमें वास्तुकला, खान-पान, स्थानीय हो और प्रदूषण, मल-मूत्र एवं गन्दे पानी के निकास की समुचित व्यवस्था हो ।
5. बाजार ग्राम सभा अपने बाजार में बाहर से आने वाला किसी भी वस्तु, जैसे शराब, नशीली वस्तुओं या अन्य किसी भी सामग्री, जिसे ग्राम समाज अपने हितों के प्रतिकूल मानता हो, के विपणन पर प्रतिबन्ध लगाने को सक्षम हो।
6. शिक्षा: शिक्षा का स्वरूप उत्तर प्रदेश तथा देश की भाँति केन्द्रित न हो। यहाँ यह अधिकार सांवैधानिक रूप से प्रदान किया जाए कि शिक्षा की विषयवस्तु स्थानीय हो। शिक्षा के प्रसार के लिए प्रत्येक एक किलोमीटर पर एक बेसिक स्कूल तथा चार किलोमीटर पर माध्यमिक विद्यालय हो। प्राथमिक स्कूलों में स्थानीय बोली-भाषा को माध्यम के रूप में प्रोत्साहन दिया जाए। जिला स्तर की एक पाठ्यक्रम समिति पाठ्यक्रम तय करे। पाठ्यक्रम में गणित, भाषा, स्थानीय इतिहास, भूगोल के साथ-साथ उद्योग तथा ध्यान दर्शन, योग का ज्ञान दिया जाए। पाठ्यक्रम की विषयवस्तु में स्थानीयता पर जोर दिया जाए। पुस्तकों की छपाई जिला स्तर पर हो। समस्त स्थानीय अंग्रेजी स्कूलों, उच्च शिक्षण तथा प्रशिक्षण संस्थानों आदि में स्थानीय छात्रों के लिए प्रवेश निश्चित किया जाए। बड़े अंग्रेजी स्कूलों की फीस पर एक सीमा निर्धारित की जाए। इन संस्थाओं में शिक्षकों के वेतन एवं विद्यार्थियों की फीस के बीच एक निश्चित अनुपात निर्धारित हो। ग्राम सभा अपने स्कूलों के शिक्षकों का चुनाव, नियुक्ति एवं मूल्यांकन करे। ग्राम सभा सर्वप्रथम अपने स्कूल में अध्यापक को नियुक्त करे तथा दो वर्ष तक उनकी कार्यप्रणाली तथा निष्ठा देखने के पश्चात ही उनके प्रशिक्षण के लिए सरकार के पास सिफारिश भेजे। तत्पश्चात् राज्य सरकार उस अस्थाई शिक्षक को प्रशिक्षण दिलवाये और स्थाई नियुक्ति दे। नियुक्ति व प्रशिक्षण पहले और काम बाद में की प्रथा को उलटा जाये।
7. सरकारी-गैर सरकारी संस्थाऐं और स्थानीय समाज: सरकारी एवं गैरसरकारी संस्थाऐं अपने स्थानीय समाज से न कोई संपर्क रखती हैं और न उनके प्रति जवाबदेह होती हैं। स्थानीय व्यक्ति वहाँ आसानी से प्रवेश नहीं पा सकता। अगर इन संस्थाओं का स्थानीय समाज पर कोई प्रतिकूल असर हो रहा हो तो उसकी न कहीं कोई शिकायत हो सकती है और उन पर कोई कार्यवाही। इसलिए आवश्यक है कि उत्तराखण्ड की प्रत्येक बड़ी सरकारी तथा गैर सरकारी संस्था अपना वार्षिक बजट एवं लेखा सार्वजनिक करे तथा अपने कार्यक्रमों तथा प्रयोगों की सूचना स्थानीय ग्राम समाज तक पहुंचाये। यह भी निश्चित हो कि इन संस्थाओं के कारण प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभावों की कीमत स्थानीय समाज को न चुकानी पड़े। सभी संस्थाओं में एक ऐसी निगरानी समिति हो, जिसमें 50-60 प्रतिशत स्थानीय लोग हों तथा संस्थाओं का स्थानीय समाज के साथ एक अपनत्व का रिश्ता बने।
8. स्थानान्तरण की नीति: गुलामी को बनाये रखने की दृष्टि से औपनिवेशिक अंग्रेजी सरकार ने नीति बनाई थी कि अधिकारी यदि स्थानीय होगा या ज्यादा समय तक एक ही स्थान पर रह जायेगा तो स्थानीय समाज से उसके रिश्ते बन जायेंगे जिससे वह निरंकुश और निर्दय हो कर शासन नहीं कर पायेगा। अतः वह समय-समय पर स्थानान्तरित होता रहे। हमारी व्यवस्था में इसका बिल्कुल उल्टा होना चाहिये। प्रशासनिक अधिकारी यथासम्भव स्थानीय हों, उनका कम से कम स्थानान्तरण हो और पाँच वर्ष से पूर्व तो कतई न हो। स्थानान्तरण के वृत्त बनें। उदाहरणार्थ, आइ.ए.एस. अधिकारी पूरे राज्य में स्थानान्तरित हों, लेकिन प्राथमिक स्कूल के शिक्षक अपने जनपद के वृत्त के भीतर ही रहें।
9. पर्यटन या उसकी योजनाओं से होने वाले सामाजिक-सांस्कृतिक प्रदूषण को कम से नियंत्रित रखने के लिये स्पष्ट नीति तथा आचार संहिता बने। सस्ते, भड़काऊ व निम्न स्तर के पर्यटन को रोका जाये। पर्यटन का स्थानीय वास्तुकला, खानपान, पहनावे व स्थानीय परिवेश पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े। कचरे तथा प्लास्टिक का स्वच्छता व पर्यावरण की दृष्टि से उचित प्रबंधन हो। तीर्थस्थलों की पवित्रता व मर्यादा सुरक्षित हो। बिजली, पानी व ट्रैफिक जैसी आधारभूत संरचनाओं पर नजदीकी निगरानी रहे। ग्रामसभाओं को अधिकार हो कि वे पर्यटन पर होने वाली आय पर कर वसूल कर सकें।
10. उद्योग: पिछले पचास-साठ साल में पहाड़ के परम्परागत शिल्प और उद्योग को हुए भारी नुकसान को देखते हुए यह जरूरी है कि जिन स्थानों पर भारी उद्योगों की संभावना या आवश्यकता नहीं है, वहाँ छोटे उद्योग लगाये जायें। भार उद्योगों के आर्थिक ही नहीं, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभावों का भी पूर्व अध्ययन हो और उन्हें स्थानीय समाज की अनुमति से ही लगाया जाये। खदान तथा घरेलू, व्यावसायिक और औद्योगिक खनन के लिये ग्राम सभा की अनुमति जरूरी हो। ग्राम सभा को अपने क्षेत्र में होने वाली हर प्रकार की औद्योगिक गतिविधि पर कर लगाने का अधिकार हो ।
11. दलित व महिला आरक्षण की यथोचित व्यवस्था हो।
12 नये जिलों व अन्य प्रशासनिक इकाइयों के गठन के लिये सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाये तथा एक जैसी संस्कृति व परम्पराओं वाले क्षेत्रों को एक साथ रखा जाये।
13. राज्य के बड़े अधिकारियों के लिये जो आवास बनायें जायें, वे शिल्प व वास्तुकला को दृष्टि में रजत हुए हों। अन्य राज्यों की नकल करते हुए उनमें फिजूलखर्ची न की जाये, बल्कि सादगी रहे। विधायकों के निवास उनके अपने क्षेत्र में हों। विधान सभा सत्र के दौरान उनको सचिवालयी सुविधा वाले हॉस्टल उपलब्ध कराये जायें। नैनीताल का राजभवन जैसी इमारतें अस्पताल या विश्वविद्यालय जैसे किसी सार्वजनिक कार्य के लिये प्रयुक्त हों।
14. प्रशासनिक विभाग कम से कम हों और विकेन्द्रीकृत हों। ग्राम स्तर पर अधिकाधिक अधिकार दिये जायें।
राज्य के गठन के इस ऐतिहासिक मौके पर हम अपने दृढ़ संकल्प से कुछ कर पायें, तो यह एक बेहतर उत्तराखण्ड की नींव पड़ सकेगी। यह ऐतिहासिक मौका हम चूक गये तो उत्तराखण्ड भी देश के तमाम छोटे राज्यों जैसा एक सामान्य प्रदेश बन कर रह जायेगा।
(यह लेख राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 1 नवम्बर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)
































