रमदा
उत्तराखण्ड के एक पृथक राज्य के रूप में अस्तित्व में आ जाने के साथ ही इस सच्चाई को स्वीकारना आवश्यक है कि आजादी के तत्काल बाद से देश-प्रदेश के स्तर पर सामाजिक, राजनैतिक-आर्थिक मामलों, प्राथमिकताओं, नीतियों, रीतियों, कार्यक्रमों आदि में जो तमाम तमाम गलतियाँ हुई हैं। उनसे सीखने तथा तदनुसार सुधार करने की जरूरत है। वही सब कुछ यदि यहाँ भी दोहराया जायेगा तो अलग राज्य की अवधारणा ही निरर्थक हो जायेगी। उल्लेखनीय है कि गलतियों को दोहराये जाने की सम्भावना दूरस्थ नहीं, निकटस्थ है, क्योंकि व्यवस्था के मौजूदा ढाँचे को यथावत् स्वीकारना और अपना लेना सुविधाजनक होता है। अभी अपना अलग कर लें, कल सुधार लेंगे की मानसिकता में ऐसा होने की आशंका प्रबल होती है।
अनुभव की गई गलतियों से सीख कर आगे बढ़ने की सोच को यदि महत्व मिले तो उत्तराखण्ड ‘प्रयोग भूमि’ है। देश-प्रदेश के बड़े स्तर पर जिन कामों का बीड़ा उठाना कठिन लगता है, कई बार छोटे स्तर पर एक बार जोर आजमाइश सकारात्मक परिणाम दे सकती है और ऐसी संभावनाओं के तहत उत्तराखण्ड के ‘प्रयोग’ शेष प्रदेश-देश के लिये उदाहरण भी हो सकते हैं।
गत 53 सालों का अनुभव हमें सिखाता है कि अर्थव्यवस्थायें हों या समाज, किसी एक एजेन्सी-संस्था या अभिकरण से संचालित नहीं होते। विविध एजेन्सियों एवं सदस्यों की परस्पर अन्तःक्रियाओं एवं बाहरी ताकतों आदि सभी का प्रभाव पड़ता है। सभी की भूमिकायें होती हैं। (कुछ अपनी भूमिकायें खुद बना लेते है, जैसे सत्ता के दलाल)। इतना अवश्य है कि इन तमाम घटकों में से कोई एक या कुछ अधिक मुखर हों, अधिक ताकतवर हों या अधिक प्रभावशीलता के साथ सक्रिय हों।
इसी तरह विकास के आशय-परिभाषा से लेकर विकास सृजक गतिविधियों के निर्माण, क्रियान्वयन तक जिन तमाम संस्थाओं-एजेन्सियों-समूहों एवं व्यक्तियों की भूमिका होती है, वे तटस्थ नहीं होते। अपनी सोच, अपने हितों के अनुरूप लक्ष्यों की परिभाषा होती है….. … अपने स्वार्थों के अनुरूप नीतियाँ तथा कार्यक्रम बनाये जाते हैं। योजनाविद् एवं राजनीतिज्ञ वर्गीय दबावों समूह दबावों से न केवल प्रभावित होते हैं, वरन् उसका हिस्सा भी होते हैं।
रुचिकर तथ्य यह है कि जिसे हम नौकरशाही, राजनीतिज्ञों, निजी स्वार्थी, सत्ता के दलालों एवं माफिया का महागठजोड़ कहते हैं और जो पिछले 50 सालों में क्षेत्रीय से लेकर अखिल भारतीय स्तर तक पसरा दिखाई देता है, जिसे हम तमाम तमाम गलतियों एवं व्यवस्था के दोषों के लिये उत्तरदायी मानते हैं (जहाँ तमाम पानी के ठहर जाने की चर्चा होती रहती है), भी एक समरूप समग्र चट्टान जैसा (भौगोलिक ब्लॉक) नहीं होता। विविध चट्टानों का मिश्रण होता है। स्वार्थ की गोंद इन विविध घटकों बाँधे रहती है।
जैसा ऊपर कहा गया कि. योजनाकार एवं राजनीतिज्ञ वर्गीय दबावों एवं समूह दबावों से प्रभावित होते हैं, वे उसी से प्रभावित होते हैं, जो देखते, सुनते हैं एवं जिससे डरते हैं। चूँकि गत 50 सालों में शक्ति-सत्ता का नगरों में अतिवादी केन्द्रीकरण हुआ है, इसलिये नागर समूह दबाव समूह के रूप में उभरा है और विकास नीतियों-रीतियों में एक घोर नगरीय पूर्वाग्रह है। ऐसा पूर्वाग्रह, जिसमें सभी कुछ नगरों की ओर बहता है।
इस पृष्ठभूमि में उत्तराखण्ड को ‘प्रयोग भूमि’ मानते हुए सबसे पहले यदि ‘महागठजोड़’ के खिलाफ लोगों की लड़ाई/जनता के संघर्ष की शुरूआत होनी है तो ‘महागठजोड़’ के सबसे निर्बल घटक की तलाश कर वहीं से उसे ध्वस्त करने का प्रयास होना चाहिये। चूँकि राजनीतिज्ञ को कम से कम एक निश्चित समयावधि के बाद लोगों के बीच जाना ही होता है ….. चुनाव लड़ना उसके लिये एक आवश्यक बुराई जैसा होता है, अतः वही इस ‘महागठजोड़’ का अपेक्षाकृत निर्बल घटक प्रतीत होता है……आक्रमण की दृष्टि से निर्बल घटक। यदि उसकी असलियत ईमानदार तरीके से लोगों तक पहुँचाई जाये, उसे चुनौती मिले तो इस ‘महागठजोड़’ में दरारें डाली जा सकती हैं। अंतरिम विधानसभा के बाद नई विधानसभा के गठन के समय यदि पुराने पेशेवर (अनुभवी) राजनीतिज्ञों की जगह नये लोगों को तरजीह दी जाये तो ‘महागठजोड़’ को क्षति पहुँचेगी। थका थकाया पेशेवर नेता जिस कदर ‘ट्रिक्स ऑफ ट्रेड’ से परिचित होता है, उसकी खाल जितनी मोटी होती है, उतनी नये लोगों की नहीं। परिणामतः नये लोगों पर मतदाताओं की पकड़ मजबूत होने की संभावना रहती है।
दूसरा मामला नगरीय पूर्वाग्रह का है। इस नगरीय पूर्वाग्रह की सर्वव्यापकता इतनी शक्तिशाली है कि उत्तराखण्ड में राज्य के भावी स्वरूप को लेकर चल रही तमाम बात बहस, चर्चाओं, गोष्ठियों एवं धरनों-बन्दों में ग्रामीण उत्तराखण्ड की कोई हिस्सेदारी नहीं है। न ही इस हिस्सेदारी को बनाने की कोई पहल कहीं दिखाई दे रही है। यह भारतीय संदर्भ में बार-बार दोहराया जाने वाला वाक्यांश मात्र नहीं, बल्कि वस्तुस्थिति है कि उत्तराखण्ड गाँवों में बसता है। असल उत्तराखण्ड 71 नगरीय आबादियों में नहीं, 15,620 गाँवों में है और भावी उत्तराखण्ड के केन्द्र में इन्हीं ग्रामीणों को होना है। यह मामला आसान नहीं है, किन्तु दिसम्बर 92 में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के पश्चात् नीचे से नियोजन का जो वैधानिक ढाँचा देश में अस्तित्व में आया है, वह पंचायतों को प्रत्येक स्तर इतनी ताकत दे सकता है कि उसके अनुरूप योजना निर्माण सामाजिक न्याय की गारंटी होगा, बशर्ते कि इस वैधानिक व्यवस्था को व्यावहारिक रूप दिया जाये।
उत्तराखण्ड में ऐसी व्यवस्था के निर्माण की कोशिश की जानी चाहिये कि पंचायतों द्वारा विकास हेतु बनाई गई योजनायें राज्य स्तरीय नियोजन का हिस्सा बनें या राज्य स्तरीय नियोजन का महत्वपूर्ण घटक हों। इस सम्भावना के अन्तर्गत एक और अवसर भी दिखाई देता है। नये ईमानदार लोगों द्वारा चुनावी राजनीति के चक्रव्यूह में प्रवेश का एक मार्ग ग्राम सभाओं-पंचायतों की दिशा से बन सकता है, क्योंकि एम.एल.ए.-एम.पी. का चुनाव लड़ना धन बल, बाहुबल की मौजूदा परिस्थितियों में सम्भव नहीं है। ग्राम सभाओं-पंचायतों के स्तर पर अपनी ईमानदारी एवं काम करने की क्षमता का प्रदर्शन सही लोगों को आगे आने का अवसर देने वाला सिद्ध हो सकता है।
नव निर्माण की इस सारी कल्पना में एक और सच्चाई का साफ हो जाना जरूरी है कि किसी बाहरी एजेंसी से नेतृत्व मिलने का कोई सकारात्मक अर्थ-प्रभाव नहीं होगा। यह जनता के बीच से आयेगा। यह उत्तराखण्ड में बिखरी उन छोटी-छोटी शक्तियो, समूहों से आयेगा, जिन्होंने उत्तराखण्ड में अनेकानेक जन आंदोलनों के यज्ञों में शुरूआती समिधा दी है। वर्तमान में उनकी जिम्मेदारी है कि नगरों में आयोजित की जाने वाली गोष्ठियों की बकबक में अपनी ऊर्जा को बर्बाद करने की बजाय वे अपनी पूरी ताकत के साथ उत्तराखण्ड के भावी स्वरूप की तमाम बात-बहस, तमाम आयामों, तमाम संभावनाओं, प्रश्नों एवं संभावित समाधानों को लेकर उत्तराखण्ड के सैकड़ों गाँवों में रहने वाले लोगों तक जायें। राजधानी, हाइकोर्ट, मुख्यमंत्री, मंत्री, आइ.ए.एस., पी.सी.एस के छù एवं भंगिमा की राजनीति की असलियत को लोग समझें एवं नयी/पहली विधानसभा के चुनावों से पूर्व लोगों की आँखों के जाले बड़ी हद तक साफ हो चुके हों। तभी साकार होगा उत्तराखण्डियों के सपनों के उत्तराखण्ड की प्राप्ति की महायात्रा का प्रस्थान विन्दु।
(यह आलेख राज्य गठन के दौरान नैनीताल समाचार के 15 नवम्बर 2000 के अंक में पहली बार प्रकाशित हुआ था)
































