विजया सती
पहाड़ मेरे लिए अब कोई मंज़िल नहीं, एक सुखद यात्रा है.
कभी सोचा न था कि पहाड़ इस तरह से मेरे इतने अपने हो जाएंगे कि मैं हर पल इनके साथ की कामना करूंगी और इस साथ में ही सबसे अधिक खुशी पाऊंगी. जन्मजात दिल्ली वासी हम, रहे कहां पहाड़ में ! पढ़ते-लिखते-पढ़ाते जीवन का बड़ा हिस्सा महानगर में ही बीत गया ..
कोरोना काल में सेवानिवृत्ति के बाद, महानगरी से वापसी पहाड़ की छांह में ही हुई. अब सब आसान है ..पहाड़ से मिल आना, पहाड़ में जी आना ! यहाँ आने के बाद, पहाड़ जाने का कोई अवसर मैं गंवाना नहीं चाहती. इसलिए जानती हूँ कि सैलानी बनकर पहाड़ छू आना पहाड़ को जानना नहीं होता. पहाड़ के अपने अनेक दुःख हैं. टूटी सड़कें, बह गए पुल, अनुपस्थित परिवहन, दूर दराज विद्यालय और अस्पताल.बाघ-गुलदार-तेंदुओं के आक्रमण अलग ! बहुत कठिन है डगर इस पनघट की !
घाटियों में उतरता कोहरा, ऊंची चोटियों पर घुमड़ते बादल और बर्फ़ की व्याप्ति, प्राकृतिक झरनों की कलकल छलछल, नदियां, झीलें, हरियाली ..बस इतना ही नहीं है पहाड़. पर्यटन विभाग के रंगीन पोस्टर जैसी नहीं है पहाड़ में ज़िंदगी. हर बार पहाड़ से लौटना मुझे उदास करता है, लेकिन फिर हर बार पहाड़ जाने की तैयारी सारी उदासी हर लेती है.
पहाड़ में आकर मैं ठीक से मिली शिकारी और वन्य जीव संरक्षक जिम कॉर्बेट से. छोटे से कसबे की भूमिका से कसमसाकर बाहर निकलने को आतुर जिम कॉर्बेट की कालाढूंगी में न केवल जिम कॉर्बेट का गर्मियों का आवास और संग्रहालय है, बल्कि अब भी यहाँ आम के बड़े-बड़े बगीचों में कोयल की कूक है, लीची के बागों में रंग और खुशबू है. कटहल से लदे पेड़ों के आसपास गूल (छोटी नहर) में बहता पानी है.
महरागाँव भीमताल में हम मिल सकते हैं अनूठे कलाकार पद्मश्री यशोधर मठपाल से, उन्हीं के बनाए लोक कला संग्रहालय में. मुनस्यारी में शेर सिंह पांगती द्वारा बनाया ट्राइबल म्यूज़ियम है और रास्ते में बिरथी जलप्रपात ! लोहाघाट में स्वामी विवेकानंद की तप:स्थली अद्वैत आश्रम, मायावती का संगीतमय एकांत है, देवीधुरा में रक्षा बंधन के दिन अद्भुत बग्वाल का दृश्य है, अल्मोड़ा में कटारमल सूर्यमंदिर और कसार देवी दर्शनीय ! कुछ ही आगे बढ़ जाएं तो जागेश्वर मंदिर और लखु उड्यार गुफाएं मन मोह लेंगी.
मंदिरों की क्या कहें …कुमाऊँ रेजीमेंट सेंटर की संरक्षक देवी का मंदिर हाट कालिका, पिथौरागढ़, घोड़ाखाल में ग्वेल देवता मंदिर, कैंची धाम में विराजे नीम करौली महाराज, नैनीताल में प्रवेश से पहले हनुमानगढ़ी, सुदूर बैजनाथ और दूनागिरी के विख्यात मंदिर अपनी और खींचेंगे ही.
फलों के कटोरे रामगढ़ को कैसे भूल जाएं जहां गर्मी भर काफल, आडू, खुमानी, नाशपाती, प्लम की बहार छाई रहती है ! तल्ला और मल्ला रामगढ़ को भले ही होमस्टे, होटल और निजी बंगलों ने जीभर कर तहस-नहस किया है, तब भी यहाँ बचा हुआ है हिन्दी की प्रसिद्ध कवयित्री महादेवी वर्मा का आवास जो अब महादेवी सृजन पीठ है. कठिन पहुँच के बीच टैगोर टॉप की उपस्थिति भी एक महत्वपूर्ण बिंदु है.
कौसानी में गांधी जी की उपस्थिति से आप्लावित अनासक्ति आश्रम, उधर मुक्तेश्वर की मौन पगडंडियाँ, इधर रानीखेत का छावनी इलाका भरपूर आकर्षित किए रहता है.
इन्हीं पहाड़ों में कभी-कभी मैं उन रास्तों पर भी जाती हूं जिन पर कदमों के निशान कम हैं .. roads less traveled by. ऐसे में मिल जाते हैं कुछ ऐतिहासिक महत्व के सुंदर इलाके ..जैसे पिछले दिनों मिला ब्रिटिश काल में निर्मित, विख्यात बावन डांठ जहां जमीन से 40 फुट ऊपर, 52 मेहराबदार खंभों पर बनी सिंचाई नहर है.
यह हल्द्वानी फतेहपुर मार्ग पर स्थित है.
बावन डांठ से आगे, चौंसला के जंगल से पहले, अंबेदकर विद्यालय है, जिसमें हमें पढ़ने को ललकते बच्चे मिले और उन्हें पढ़ाने-सिखाने को तत्पर मैडम भी !
कुछ और आगे धूल भरी, पथरीली सड़कें भी मिली और दूर-दूर तक फैले जंगल की हरी भरी दुनिया भी.
अचानक .. नीले आसमान तले, कालीन सी बिछी हरी घास में, दम साध कर खड़ा एक पुरातन चर्च दिख गया ! 1935-36 में बना, विशाल खुला परिसर, खूबसूरत पत्थर की इमारत… बाना गांव में संत मिखाइल चर्च !
आस पास कुछ ध्वस्त इमारतें ..और घने जंगल के बीच मौन खड़े चर्च को देख कर, अनजान राहों का सफ़र पूर्णता को पहुंचा सा लगा.
मंजिल नहीं मिली तो क्या? पहाड़ की इस यात्रा में भेंट रही हूँ लोकपर्व हरेले की मंगल कामनाएं –
जी रया, जागि रया
अगास बराबर उच्च, धरती बराबर चौड़ है ज या
दुब जस हरी है ज या,
ब्यार जस फई ज या
यह वह पहाड़ है जहां बारिश नहीं होती बरखा लग जाती है. हवा नहीं पुरवाई चलती है. और घुघुती से मन का पूर्ण संवाद होता है …
घुघुती ना बासा,
आमे कि डाई मा घुघुती ना बासा
ओ घुघुती ! तुम आम की डाल पर बैठ कर इस तरह न बोलो, न गाओ !
तेर घुरु घुरू सुनी मै लागू उदासा
स्वामी मेरो परदेसा, बर्फीलो लदाखा, घुघुती ना बासा
तुम्हारा यह अनवरत स्वर सुनकर मेरा मन उदास होता है. घुघुती ! मत गाओ … मेरे पति दूर देश में हैं, वह तो परदेश ही हुआ … बर्फ भरा अंचल लद्दाख !
रितु ऐगे घनी घनी गर्मी चैत की
याद मैकें भोत ऐगे अपुना पति की, घुघुती ना बासा
और यहां चैत्र की ऋतु आ पहुंची है, अब गर्मी बढ़ती ही जाएगी. इस पल मुझे अपने प्रिय पति की बहुत याद आ रही है … तुम इस तरह मेरी स्मृतियों के आँगन में अपनी रट न लगाओ ! घुघुती मत गाओ ! आम की डाली में लुक-छिप कर न गाओ !
तेर जैस मैं ले हुनो, उड़ी बेर ज्यूनो
स्वामी की मुखडी के मैं जी भरी देखुनो, घुघुती ना बासा
काश ! कि मैं तुम्हारे जैसी होती ! मुझे भी पंख मिले होते ! तब तुम्हारी तरह मैं भी उड़कर जाती और अपने स्वामी का मुखड़ा जी भर कर देख लेती !
उड़ी जा ओ घुघुती, न्है जा लदाखा
हाल मेर बते दिये, मेरा स्वामी पासा, घुघुती ना बासा
ओ घुघुती ! बस इतना कर दो …. उड़कर जाओ, लद्दाख चली जाओ ! मेरे स्वामी के पास जाना, उन्हें मेरा हाल बताना ! जाओ घुघुती ! इस आम की डाली पर बैठ कर गाना छोड़ कर जाओ ! यहीं बैठ कर गीत न गाओ !

































