रमेश कृषक
वैज्ञानिक सत्य है कि हिमालय निर्माण की प्रक्रिया में है और इसीलिये हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं में टूट-फूट स्वाभाविक है। अभी 5 अगस्त को उत्तरकाशी के धराली में जो घटना घटी, वह हिमालय के ग्लेशियर क्षेत्र के समीप से एक भूखंड के खिसक कर बहते हुए नीचे की ओर आने की वजह से घटी। 2013 की केदारनाथ आपदा भी ग्लेशियर या उसके समीप के भूखंड खिसकने की वजह से घटी थी। ऐसी ही एक घटना जोशीमठ क्षेत्र की है, जिसमें ज्यादा नुकसान नहीं हुआ था, लेकिन बहुत बड़ा ग्लेशियर फिसल कर नदी में आ गया था।
थोड़ा पीछे चलते हैं। कैलाश मानसरोवर के यात्रियों के लिए कुमाऊँ मंडल विकास निगम के मार्ग में पिथौरागढ़ जनपद का मालपा एक पड़ाव हुआ करता था। एक रात पहाड़ का बहुत बड़ा हिस्सा खिसक कर पड़ाव पर आ गिरा। वहाँ जितने भी लोग थे, किसी की मृत देह मलबे से बाहर नहीं निकाली जा सकी।
ये प्राकृतिक आपदायें थीं। लेकिन इन्हें प्राकृतिक आपदायें कह कर हम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते। हिमालय के नाजुक होने के वैज्ञानिक सत्य को जानने के बाद हमने ऐसी कौन सी लकीर खींची है, जो दुर्घटना की स्थिति में जान-माल के नुकसान को समाप्त या कम करती हो। इन 30-40 सालों में बहुत बड़ा नुकसान हम भुगत चुके हैं, इस सच से हम कब तक भागते रहेंगे ?
अखबारी खबरों में टटोलें तो मुझे याद है कि 1982 में कपकोट विकास खण्ड के करमी गाँव के भयात मुहल्ले के ऊपर बरसाती पानी के साथ बह कर आये मलुबे के नीचे दब कर बहुत लोग और मवेशी मारे गये थे। इस घटना की भनक मिलने के बाद ‘नैनीताल समाचार’ के संवाददाताओं ने घटनास्थल तक जा कर न सिर्फ एक गम्भीर खबर बनायी, बल्कि घटना के वैज्ञानिक कारणों को तलाशते हुए समाज और सरकार के सामने इस बात को परोसा था कि ऐसी घटनाओं से हम कैसे बच सकते हैं। इस खबर का एक बड़ा लाभ यह हुआ कि बाद के वर्षों में बरेली-मेरठ के अखबार भी ऐसी घटनायें घटने पर अपने संवाददाताओं को घटनास्थल पर भेजने लगे। तब ‘अमर उजाला’ पहाड़ों पर पढ़ा जाने वाला प्रमुख अखबार था। ‘दैनिक जागरण’ नहीं हुआ करता था।
1982 के बाद 1984 में कपकोट विकास खण्ड के ही जगथाना में प्राकृतिक आपदा के कारण बहुत बड़ा नुकसान हुआ था। वह खबर नैनीताल समाचार के अलावा अमर उजाला में भी छपी थी। नैनीताल समाचार का तो नियम ही था कि यदि पहाड़ पर कहीं भी कैसी भी आपदा घटित होती थी तो नैनीताल समाचार घटनास्थल तक जा कर खबर को सिर्फ खबर के रूप में नहीं लिखता था, वरन बचाव के तरीको और आपदा के असल कारणों तक पहुँच कर वस्तुस्थिति को समाज के आगे रखता था और अभी भी इस काम को कर ही रहा है।
1980 के बाद के दौर में कुमाऊँ-गढ़वाल के नौजवानों का रुझान भूगर्भ विज्ञान की ओर भी गया। तब के कई नाम हैं जो भूविज्ञान के क्षेत्र की बड़ी-छोटी नौकरियाँ करने के बाद रिटायर हो कर घरों को पहुँच चुके होंगे या फिर नौकरी के अन्तिम पड़ाव में होंगे। भूगर्भ विज्ञान के क्षेत्र के डॉक्टर वल्दिया ने हिमालय को ले कर जो चेतावनियाँ दी हैं, वे अक्सर घटित भी होती हैं। डाक्टर वल्दिया के बाद डॉ. नवीन जुयाल, डाक्टर एस. पी. सती के अलावा भी बहुत सारे और नाम हैं जो हिमालय के भूगर्भ की संरचना और भूमि के ऊपर पर बसे समाजों को लेकर चिन्तित रहे और चेतावनियाँ भी देते रहे। 1980 के बाद की पत्रकारिता व लेखन ने हिमालय को, हिमालय की नदियों को, भूगर्भ विज्ञान के माध्यम से पहाड़ को जानना और समझना शुरू किया। इस समझ के विकास में सुधी लोगों ने अधिक ध्यान नदियों और ग्लेशियरों में पर रखा।
भूगर्भ विज्ञान के प्रति बढ़ती समझ ने ऐसी पुरानी आपदाओं का भी अन्वेषण कर डाला, जो कहीं दर्ज नहीं थीं। इस प्रयास में महत्वपूर्ण यह था कि हिमालय के और हिमालय के पहाड़ो के साथ, हिमालय की नदियों के साथ किस प्रकार का बर्ताव किया जाना चाहिये, इसका सुझाव भी था।
1980 के उस दौर में ही खदान के कारोबार के माध्यम से विनाश के रास्ते खोले जा रहे थे। यहाँ के भूगोल, भूगर्भ और पारिस्थितिकी को सिरे से नजरअंदाज कर बागेश्वर जैसे संवेदनशील जनपद में नाकुरी, कमसियार, पुंगर घाटी, सरयू घाटी की कृषि पट्टी में बृहद रूप में खड़िया खदानों की स्वीकृति तभी दी गई। विकास के नाम पर सर्वनाश से बचाने के लिए एक बौद्धिक वर्ग लेखन और पत्रकारिता के माध्यम से निवेदन कर रहा था तो दूसरी ओर राजनीतिक दल औद्योगिक विकास के नाम पर पर्वतों को उधेड़ने के लिए कमर कस रहे थे।
टिहरी बाँध को देखें। पानी से बिजली बनाने के लिये हिमालय के पानी को एक बहुत बड़े स्टोर के रूप में टिहरी के दो-ढाई सौ गाँवों के क्षेत्र में रोक देना हिमालय हित में कतई नही है। जो पहाड़ निर्माण की प्रक्रिया में हैं वहां सीमेंट, कंक्रीट, सरिया का ऐसा निर्माण समझदारी तो नहीं ही कहा जायेगा। देश के बौद्धिक वर्ग को साथ ले कर सुंदरलाल बहुगुणा ने इस विनाशकारी बाँध के खिलाफ जो आन्दोलन उठाया था, वह हिमालय की चिन्ताओं को लेकर था। मगर उसकी अनसुनी कर दी गई। टिहरी के बहुत बड़े भूभाग में ग्लेशियरों के ठंडे पानी को एकत्रित करने के बाद उत्तराखंड में बादल फटने की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं। हिमालय को उधेड़ कर रख देने पर आमादा सरकार के पास इस प्रकार की कोई अध्ययन अभी नहीं है।
धारचूला, मुनस्यारी, कपकोट, देवाल, थराली, घाट, जोशीमठ, उखीमठ, भटवाड़ी विकास खण्डों तक आबादी वाली एक लंबी पट्टी, जो हिमालय के साथ चिपकी हुई है, में बेतहाशा भूस्खलन, भूकटाव बने हैं जो तेजी से बढ़ रहे हैं। इन भूकटावों और भू फिस्लावों को रोकने की कोई शुरूआत सरकार द्वारा नहीं की गई है। वर्षा से यदि कोई स्कूल या कोई चारदिवारी बह गई, सरकारी बजट से बनी कोई नहर बह गई तो उसकी मरम्मत के लिए आपदा का बजट है। लेकिन यदि यही नुकसान किसी व्यक्ति के खेत में होता है तो उस खेत को खाता-खतौनी, नक्शे-खरे से हटाने का प्रावधान तो है, लेकिन उसके बचाव का कोई प्रयास सरकार की ओर से नहीं किया जाता।
उत्तराखंड की आपदाओं के वैज्ञानिक अध्ययन हर बार यही बतलाते हैं कि ये प्राकृतिक आपदायें नहीं हैं, बल्कि अधकचरे विकास के नाम पर आमंत्रित आपदायें है। विकास के नाम पर बहुत से अवरोध बरसाती पानी के निकास में लगाए जाते हैं और जब पानी अपना रास्ता निकालता है, तब आपदायें पैदा होती हैं।
सरकार से पूछा जाये कि क्या उसके पास कोई ऐसा अध्ययन है जो यह बताए कि पहाड़ पर कौन सा क्षेत्र संवेदनशील है और बरसाती आपदाओं का शिकार हो सकता है। यदि ऐसी जानकारी हमारे पास होती कि कितने गाँव किस नदी के बाढ़ क्षेत्र में बस गए हैं, कितने गाँव मलबे के ऊपर बसे हुए हैं, कितनी आबादी मलवे के आसपास बस गई है तो शायद बचाव का मार्ग भी हमारे पास होता। हम अपने पूर्वजों के विज्ञान को जब टटोलते हैं तो दिखाई देता है कि उनके द्वारा कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड जो बसासत विस्तार किया गया, वह नदियों के किनारे नहीं था। वहाँ भी नहीं, जहाँ बरसाती या सदाबहार जल का निकास था। जहाँ बसासत हुई वहाँ कोशिश की गई कि पानी के निकास को रुकने न दिया जाए। पुराने गाँव, भले ही आज अपनी क्षमता से 40 या 50 गुना अधिक आबादी को झेल रहे हों, लेकिन वहाँ प्राकृतिक आपदा नहीं के बराबर मिलती।
सड़कों का विकास पर्वतीय क्षेत्र के लिये सबसे अधिक घातक साबित हुआ है। पहाड़ पर सड़कें मैदानों से ऊपर को आईं। अधिक से अधिक सड़कें नदियों के किनारे काटी गईं। इन्होंने बहुत बड़े स्तर पर बरसाती और सदाबहार जल निकास मार्गों को प्रभावित किया है। परिणामतः जहाँ-जहाँ सड़कें पहुँचीं, वहाँ भूकटावों और भू फिस्लाव भी पहुँचे।
धारचूला, मुनस्यारी, कपकोट, देवाल, थराली, घाट, जोशीमठ, उखीमठ, भटवाड़ी विकास खण्डों के दर्जनों गाँव विस्थापन की माँग कर रहे हैं। सरकार कहती है कि चार-पांच लाख रुपल्ली पकड़ो और कहीं भी जमीन खरीद कर विस्थापित हो जाओ। उसे कौन समझाये कि गाँव का मतलब सिर्फ छोटी सी झोंपड़ी नहीं होती, गाँव का अर्थ होता है खेत-खलिहानों के लिये पर्याप्त जमीन, गोचर, पनघट, चारागाह, धारे, नौले, मन्दिर, आने-जाने के रास्ते और साथ रहने वाले लोग। जो व्यक्ति अर्थशास्त्र को नहीं समझता, वह सिर्फ यही जानता है कि पैसे से चीज खरीदी जाती है। उसे आप 5 लाख रुपये दे कर कहते हैं कि जहाँ चाहो बस जाओ तो एक-दो साल बाद वह आदमी कटोरा लेकर भीख माँगता हुआ ही दिखाई देगा। सरकार का राज धर्म है कि उन लोगों को एक नया गाँव बसा कर दे, जिनके लिये विस्थापन जरूरी है।
उत्तराखंड के कुल भूभाग का 6 प्रतिशत ही यहां के लोगों के स्वामित्व में है जो भू कटावों भू फिस्लावों से ग्रसित भी हो चुका है। शेष 94 प्रतिशत किसी न किसी रूप में सरकार के कब्जे में है। ऐसे में कुल भूमि का 40 से 50 प्रतिशत भूमि जनता को क्यों नहीं सौंपा जा सकता ?
फोटो इंटरनेट से साभार

































