रेवती बिष्ट
नवदुर्गा के अनेक रूप हैं। उनमें एक रूप गौरा देवी या गमरा देवी का भी है। हम इन्हें गौरा, गौरी, जगदम्बा, दुर्गा, नवदुर्गा, महाकाली, भद्रकाली आदि नाम से भी पूजते हैं। नवरात्रि में सभी देवियों की पूजा अर्चना का विधान है। नौ दिनों तक व्रत लेते हुए नौ स्वरूपों की पूजा करते हुए नवम दिन कन्या पूजन के साथ नवरात्रि का समापन किया जाता है। प्रथम शैलपुत्री, द्वितीय ब्रह्मचारिणी, तृतीय चंद्रघंटा, चतुर्थ कूष्मांडा, पंचम स्कंदमाता, षष्ठम कात्यायनी, सप्तम कालरात्रि, अष्टम महागौरी, नवम सिद्धरात्रि नाम से देवी के नौ रूप माने जाते हैं। नौ रूपों की पूजा होने पर नौ कन्याओं का पूजन करने का भी विधान है।
भादो का महीना आते ही लोग बड़ी उत्सुकता से गमरा देवी के आने की प्रतीक्षा करते हैं। बच्चे, बूढ़े सभी इस त्यौहार की खुशी में शामिल होने के लिए आतुर होते हैं। सबके लिए नये वस्त्र से लिये जाते हैं। बच्चों के लिए तो और भी खुशी होती है कि आज नये वस्त्र पहनेंगे और गमरा के त्यौहार में जायेंगे। आज के युग में तो नये वस्त्र कभी भी खरीद लिए जाते हैं। पर कुछ समय पूर्व तक खास त्यौहारों में ही वस्त्र खरीदे जाते थे।
दशहरा, दिवाली, होली की तरह ‘सातों आठों’ के नाम से पूरे उत्तराखंड में मनाया जाता है। इसमें पहले दिन पंचमी में पांच अनाज मिलाकर तांबे के बर्तन में रखकर भिगोए जाते हैं। उस बर्तन को मंदिर के स्थान पर रखकर चारों ओर से फलों के जोड़े (दुक्की) से सजाया जाता है और उस स्थान पर पूजा की जाती है। गांव के मंदिर में खेतों से बड़ी घास, जिसे सौं कहते हैं, लाकर गमरा-महेश की मूर्ति बना कर स्थापना की जाती है। पंचमी-षष्ठी से रोज वहां पर पूजा की जाती है। सप्तमी के दिन भिगाए हुए बर्तन को शुद्ध जल से धोते हैं और भिगाये हुए बिरुड़े से पूजा की जाती है।
गांव के मंदिर में गमरा-महेश की स्थापना एक बड़ी डलिया में रखकर की जाती है। उन्हें वस्त्रों से सजा कर गमरा को आभूषणों द्वारा सजाते हैं। व्रत वाली महिलाएं दूब-धागा भी पहनती हैं। अष्टमी के दिन व्रत वाली महिलायें उनकी डलिया सर पर रखकर कथा गाते और चारों ओर घूमते हुए पूजा करती हैं। घाघरा-पिछौड़ा व आभूषणों से सजी गमरा को बिरुड़े व फूलों से पूजते हैं और कथा गाते हुए दूब धागा धारण कराते हैं।
सभी महिलाएं डलिया के चारों ओर घेरा बनाकर गीत गाते हुए घूमती हैं तथा पूरी कथा गाई जाती है। गणेश वंदना से लेकर शिव-गमरा की कथा गाते हुए, नाचते हुए वातावरण भक्तिमय हो जाता है।
दाइना हुए खोली का गणेश, दाइना हुए पांच देव,
दाइना हुए ब्रह्मा विष्णु महेश।
इसे कथा में गाते रहते हैं कि महेश 12 बरस बाद घर आते हैं तो पार्वती नाराज होती है कि इतने बरस बाद वापस आए। घर की परवाह नहीं की और साथ में गंगा वाली रानी भी ले आए। महेश गंगा वाली रानी को अपनी जटाओं पर लपेट कर रख लेते हैं। गमरा नाराज होकर मायके चले जाती हैं। महेश बड़ी कठिनाई से उन्हें मना कर लाते हैं। मायके में सीला का साग व ढूरा की रोटी खाकर यहां दही केला बन जाते हैं। पूर्व जन्म में दक्ष प्रजापति के घर सती के रूप में जन्म लेकर भी तपस्या करके ही शिव जी को प्राप्त किया था। दक्ष के यहां शिवजी को न बुलाने से उनका अपमान होने से यज्ञ में कूद जाती हैं। शिवजी क्रोधित होकर उन्हें पूरे लोक में चक्कर लगाते हुए कंधे पर घूमते हैं। जहां भी उनके अंग गिरे वो सब शक्तिपीठ बन गए, जो आज भी पूजा जाते हैं। इसी प्रकार गाथाओं को गाते हुए डाला सर पर धरे हुए चक्कर लगाते हुए गौरा महेश की अठवाली की पूजा की जाती है। परिक्रमा करते हुए फेरे भी पूरे हो जाते हैं और विवाह संपन्न हो जाता है। कथाएं गाते हुए पूजा संपन्न की जाती है।
बिरुड़े से भी उनकी पूजा की जाती है। व्रती महिलाएं पांच बिरुड़े निगलकर व्रत का पारायण करती हैं। गमरा देवी को भी दूब-धागे पिछौड़ा का श्रृंगार कराते हुए वो स्वयं भी दूब धागा धारण कर लेती हैं। तब एक पिछौड़े में फल फूल और बिरुड़ रख कर ऊपर की ओर उछाल कर फल फटकाये जाते हैं। सभी उन्हें प्राप्त करने के लिए उस ओर लपकते हैं। जिसके पास जो भी फल आ जाये, उसे ही रख लेते हैं और प्रसाद मान कर सर पर धारण करते हुए अपने घरों के लिए सम्हाल लेते हैं।
गमरा महेश की मूर्ति के डाले को सिर पर रख कर घूमते और गीत गाते हुए विसर्जन करने हेतु पहाड़ी पर पेड़ों के नीचे रख दिया जाता है। वापसी में भी गीत और झोड़ा गाते हुए मंदिर के आंगन में पहुंचते हैं। गाने-नाचने का यह सिलसिला मंदिर में भी चलता रहता है।
सिलगड़ी का पाल चाल, गिन खेलून्या गड़ौं।
तैं होए हिसालु तोपो, मैं उड़ुन्या चड़ौ।।
खोल दे माता, खोल भवानी, धार में केवाड़।।
कालि गंगा को कालो माछो, बलुवा बुकूँछ।
त्वै बैना को गैलो मामा, हिरदी भिजूँछ।।
वारि ऊँछी मोरि गंगा, पारि छ पनार।
आज का झाइया बटी, कसि भैच अनार।।
गीत गाते हुए, मंदिर में घेरे में घूमते हुए समापन की ओर जाते हुए, गमरा का प्रसाद धारण करते हुए, बिरुड़े को प्रसाद स्वरूप लेते हुए सभी लोग इस विवाह में कामना करते हैं कि अगले साल फिर से उसकी कथायें दोहराते हुएगीत गाते हुए गमरा देवी आते रहें। शुभकामनाओं के साथ सभी लोग खुशियाँ मनाते रहें।

































