इस्लाम हुसैन
आज बेरोजगारी के प्लेटफार्म पर खड़े भविष्य के सपने लिए नौजवान पूछ रहे हैं— हमारी एआई की ट्रेन क्यों छूट गई?
शायद वह यह नहीं जानता, या जानकर भी कह नहीं पा रहा कि भारत के विकास की बहुत सी ट्रेनें पहले ही छूट चुकी हैं। और सच्चाई यह है कि मुल्क में एआई की ट्रेन तो बनी ही नहीं, उसके प्लेटफॉर्म पर आने और छूटने का सवाल ही नहीं उठता। हाँ, दुनिया के एआई प्लेटफॉर्म पर खड़ी ट्रेन वाकई हमसे छूट चुकी है, और जब तक हमारी पहली या दूसरी ट्रेन तैयार होकर प्लेटफॉर्म तक पहुंचेगी, दुनिया विकास की मंजिल में इतना आगे निकल चुकी होगी कि उसे पकड़ना नामुमकिन होगा।
जिस तरह भारतीय रेल को बर्बाद करके बुलेट ट्रेन और वंदे भारत जैसी चमक-दमक वाली परेड दिखाई जा रही है, वैसे ही एआई के नाम पर भी खिलौनेनुमा और दिखावटी प्रोजेक्ट चलते रहेंगे—मन बहलाने और जनता को बेवकूफ बनाने के लिए।
विकास का रास्ता और पटरी से उतरी गाड़ी
सतत् विकास एक लगातार चलने वाली प्रक्रिया है। आज़ादी के बाद भारत ने ग्रामीण विकास के लिए गांधीवादी खेती और हस्तकला आधारित मॉडल अपनाया, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए नेहरू का औद्योगिक विकास मॉडल, जो समय के साथ आधुनिक रूप ले रहा था। इसमें पब्लिक सेक्टर इंजन की तरह काम करता था।
लेकिन मौजूदा “नई आज़ादी” के दौर में यह पूरी व्यवस्था पटरी से उतार दी गई। दुनिया के नेता अपने देशों को बाहरी दबाव से बचाते हुए नई तकनीक से आगे बढ़ाते हैं, जबकि यहां सरकार सारा दबाव जनता पर डाल रही है—मानो अपनी ही जनता से युद्ध कर रही हो।
जनता की सुविधा, विकास और स्वतंत्रता का कोई मायने नहीं रह गया है—चाहे वह औद्योगिक क्षेत्र हो, संचार क्रांति हो या फिर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI)। स्वदेशी का नारा लगाकर पिछड़ी सोच से उन्नति नहीं हो सकती। औद्योगिक और संचार क्रांति का विरोध करने वाले ही आज भाग्यविधाता बने बैठे हैं—दावे बहुत हैं, लेकिन अमल में शून्य।
एआई की ट्रेन क्यों नहीं बनी?
एआई को दौड़ाने के लिए भारत के पास सब कुछ था—बस नीति, दृष्टि, संकल्प और समन्वय की कमी थी। पिछले 10–11 सालों में क्या हुआ? 2014 में नई सरकार आते ही कहा गया कि पिछले 70 सालों में कुछ नहीं हुआ और कांग्रेस ने देश लूट लिया। फिर सरकारी संस्थाओं को बदनाम कर बेचा गया, शीर्ष शोध और शैक्षणिक संस्थानों के खिलाफ नफरत फैलायी गई, स्कॉलर्स और शोधकर्ताओं को किनारे लगाया गया। नतीजा—विकास का पूरा माहौल टूट गया।
पूंजीवादी देशों में निजी उद्योग पारदर्शिता से काम करते हैं। भारत में न तो पूंजीपतियों की क्षमता पर भरोसा किया जा सकता है और न उनकी ईमानदारी पर। अगर वे सक्षम होते तो चीन की तरह यहां भी संचार और एआई क्रांति लाते, न कि सरकारी संसाधनों को लूटते। न वर्तमान सरकार और न उसके करीबी उद्योगपतियों ने एआई के लिए कोई माहौल बनाया, न निवेश किया।
दुनिया बनाम भारत
अमेरिका ने एआई में 1.66 लाख करोड़ ₹ का निवेश किया और पेटेंट, स्टार्टअप और रिसर्च में नंबर 1 है। चीन ने 1 लाख करोड़ ₹ लगाया और उसका DeepSeek आते ही दुनिया में तहलका मचा चुका है।
भारत? मोदी सरकार ने केवल 170 करोड़ ₹ एआई पर खर्च किए—अमेरिका और चीन के निवेश के सामने यह “थूक में सत्तू घोलने” जैसा है। वादा 2200 करोड़ का था, लेकिन हुआ उससे भी कम।
बिजली, हार्डवेयर और असल ज़रूरत
एआई के लिए सॉफ्टवेयर से ज्यादा हार्डवेयर ज़रूरी है—सेमीकंडक्टर, ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट (GPU), और भारी बिजली खपत। यूरोप, फ्रांस और यूएई तक एआई डेटा सेंटर्स के लिए नई न्यूक्लियर पावर प्लांट लगा रहे हैं। हमारे यहां तो गांव और शहर बिजली कटौती से परेशान हैं, और परमाणु ऊर्जा पर कोई गंभीर योजना नहीं।
कैसे बन सकता था भारत एआई पावर
अगर नेहरूजी के रास्ते पर चलते हुए IIT, IISc और अन्य संस्थानों के 50 शीर्ष विशेषज्ञों को अमेरिकी स्तर की सैलरी देकर ज़िम्मेदारी दी जाती, और कम से कम 50,000 करोड़ ₹ का बजट दो साल की टाइमलाइन के साथ तय किया जाता, तो भारत एआई में पावर बन सकता था।
लेकिन हकीकत यह है कि 2027 तक अमेरिका और चीन अरबों-खरबों के निवेश के साथ अपनी स्थिति बदलने जा रहे हैं, जबकि भारत में केवल घोषणाएं और मीडिया शो हो रहा है।
अमेरिकी टेक कंपनियों में भारतीयों की भरमार होने से भारत को कोई प्रत्यक्ष तकनीकी छलांग नहीं मिली। DeepSeek जैसा चमत्कार भारत से नहीं, बल्कि चीन से आया—जहां अमेरिका के शीर्ष एआई पेशेवरों में 38% चीनी और केवल 7% भारतीय हैं।
लेकिन हकीकत यह है कि अमेरिकी AI इंडस्ट्री को चुनौती देने वाला DeepSeek जैसा क्रांतिकारी काम भारत से नहीं, बल्कि चीन से आया है।
भारत वैश्विक एआई प्लेटफॉर्म की ट्रेन पकड़ने में नाकाम रहा है। यह ट्रेन कब मिलेगी, पता नहीं। लेकिन सच यह है कि देश में विकास की कई एक्सप्रेस ट्रेनें पहले ही छूट चुकी हैं, और बची-खुची ट्रेनों को भी वंदे भारत जैसी चमक-दमक में उलझाकर पटरियों से उतारने की तैयारी है।

































