संजीव भगत
इस बार हुए पंचायती चुनाव चुनाव के बाद भाजपाई सरकार की अराजकता, तानाशाही व अंधेरगर्दी, गैरसैण के डेढ़ दिन के अराजक विधान सभा सत्र को देखकर हमें कोफ्त हो रही है कि हमने इसी दिन के लिए उतराखण्ड राज्य की मांग की थी? महिनों उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में शामिल रहे। क्या इसी दिन के लिए 2 अक्टूवर 1994 के दिल्ली आंदोलन में शामिल रहे ? जो हम आज देख रहे हैं, ये हमारे सपनों का उत्तराखण्ड नहीं है। हम तो अपनी अलग पहचान के लिए जल, जंगल, जमीन, रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा के लिए एक नया उत्तराखण्ड बनाने का सपना देख रहे थे और आज कानून व्यवस्था में बिहार से भी पीछे पहुँच गये हैं।
उत्तराखण्ड राज्य की मांग आजादी से पहले उठने लगी थी। कुमाऊँ में कुमाऊँ परिषद की स्थापना के बाद अलग राज्य की मांग उठाई गयी थी। आजादी के तुरन्त बाद कामरेड पी सी जोशी ने अलग राज्य की मांग को राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचा दिया था। गोविन्द बल्लभ पंत तब तक देश के स्थापित बड़े नेता बन चुके थे। उन्होंने अलग पहाड़ी राज्य की मांग को कभी गम्भीरता से नहीं लिया। आजादी के अगले तीस वर्षो में महाराजा मानवेन्द्र शाह सहित कई मंचों से ये मांग उठती रही लेकिन किसी भी सरकार ने इसे कभी गंम्भीरता से नहीं लिया।
1979 में उत्तराखण्ड क्रांति दल के गठन के बाद उत्तराखण्ड राज्य की मांग तेजी से उभरने लगी। अब अलग राज्य की मांग के लिए आंदोलन सड़क पर दिखाई देने लगा था। अलग राज्य को लेकर जनसमर्थन भी दिखाई देने लगा था। इसी जनसमर्थन के कारण उक्रांद के काशी सिंह ऐरी दो बार उत्तर प्रदेश विधान सभा के विधायक र्निवाचित हुए।
1994 में आरक्षण विरोधी आंदोलन स्वतः ही अलग राज्य की मांग के आंदोलन में बदल गया। जनसैलाब सड़कों पर उतर आया। ये ऐसा ऐतिहासिक जनआंदोलन बन गया जिसमे आम जनता का हर वर्ग छोटा-बड़ा,अमीर-गरीब, सरकारी-प्राइवेट, व्यापारी, किसान, मजदूर, छोटे सरकारी अफसर तक सभी शामिल थे। मसूरी व खटीमा गोलीकाण्ड, मुज्ज़फरनगर गोली काण्ड व महिलाओं से दुराचार के बाद पूरा उत्तराखंड राज्य आक्रोश से भर चुका था। अब अलग राज्य के आंदोलन को कुचल पाना नामुमकिन था। इस आंदोलन के बाद अलग राज्य का बनना तय हो चुका था।
तमाम औपचारिकताओं के बाद 9 नवम्बर 2000 को उतराखण्ड राज्य अपने अस्तित्व में आ गया। राज्य बनते ही राजधानी का मुद्दा फंस गया। आज की उत्तराखण्ड की अधिकांश समस्याओं की जड़ ही अस्थाई राजधानी है। हमारे सभी चुने हुए नेता पहाड़ सिर्फ वोट मांगने के लिए ही चढ़ते हैं। अपने जीवन निर्वाह व सुविधा के लिए हल्द्वानी, देहरादून में बस जाते हैं। राजधानी गैरसैंण उन्हें मंजूर नहीं। नेताओं के पीछे-पीछे अफसर बाबू भी केवल मैदानी जिलों में ही अपनी पूरी नौकरी कर लेते हैं। रोजगार के अभाव में पलायन की समस्या पहले से गम्भीर हो चुकी है। दूरस्थ गांव “भूतगांव” बनते जा रहे हैं। पहाड़ी और मैदानी जिलों में आर्थिक असमानता लगातार बढती जा रही है। पहाड़ों में अस्पताल और स्कूलों के भवन खण्डरों में तब्दील हो रहे हैं। कोई भी अध्यापक, डाक्टर पहाड़ों में नौकरी नहीं करना। इस बात का फायदा उठाकर नेताओं ने ट्रांसफर पोस्टिंग को सबसे बड़ा उद्योग बना दिया है।
हमारे नेताओं को विकास केवल ऑलवेदर रोड, रेल लाईन और चौड़ी सड़क में ही नजर आता है। इन चौड़ी सड़को से हिमालय को कितना दर्द हो रहा है। चारों तरफ से हिमालय रिस रहा है। ये दर्द हमारे नेता नहीं समझते। उत्तराखण्ड बनने के पहले दस साल अफसरशाही उत्तराखण्ड के जनपक्षीय भावनाओं को समझने हुए विकास योजनाएं बनाने की कोशिश करती थी। ये अफसर नेता अलग राज्य के लिए हुए आंदोलन को नजदीक से देख चुके थे। 2010 के बाद जो भी अफसर सत्ता के शीर्ष पर पहुँचे उनके लिए उत्तराखण्ड को सजाने संवारने और मानवीय द्रष्टिकोण से दूरस्थ पहाड़ में रहने वाले व्यक्ति को सुविधायें पहुंचाने की कोई गम्भीर व जनपक्षीय योजना नही थी। उत्तराखण्ड के ये अफसर उत्तर प्रदेश के समय में चौबटिया, रानीखेत के उद्यान विभाग के मुख्यालय को भी देहरादून ले गये।
उत्तराखण्ड को कभी उर्जा तो कभी पर्यटन प्रदेश बनाने की घोषणा होती रही लेकिन इन दिशाहीन नेताओं ने इसे खनन व शराब प्रदेश बना डाला। इन सारे नेताओं और अफसरों को खनन और शराब में ही सरकारी और निजी राजस्व नजर आया और पूरी सत्ता खनन और शराब के चारों तरफ घूमने लगी। उत्तराखण्ड बनने के पहले दस सालों में नारायण दत्त तिवारी के प्रयासों से सिडकुल उधमसिंह नगर व सिडकुल हरिद्वार में सैकड़ों औद्योगिक ईकाइयां स्थापित हुई थी इनमें से कई अव्यवहारिक जीएसटी व नोटबंदी के चलते या तो बंद हो चुकी हैं या पलायन कर चुकी है।
सरकारी शिक्षा व्यवस्था भले ही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी लेकिन देहरादून में ही डिग्रियां बेचने वाली सैकड़ों प्राइवेट दुकानें खुल गयी। जिन्हें हम प्राइवेट कालेज के नाम से जानते हैं। इन प्राइवेट कालेजों ने पिछले डेढ़ दशक से ऐसी पीढ़ी पैदा कर दी है जिसमें से अधिकांश में किसी भी तरह के काम करने योग्यता नहीं है और ये सब बेरोजगारों की कतार में खड़े है। इस साल उत्तराखण्ड राज्य भीषण आपदा से घिरा हुआ है। जीवनदायनी नदियां पहाड़ों से आये मलवे के कारण कहर बरपा रहीं हैं। आपदा हर बार आती है। लेकिन इस बार भयावह है। लेकिन इन आपदाओं से निबटने की कोई ठोस व दूरगामी योजना न तो बनी है। न बनाने का इरादा है।
पहाड़ में रहने वाले दो चार सौ लोग आपदाओं में मर-खप जायें इस हैलिकैप्टर सरकार को कोई फर्क नहीं पड़ता। पिछले कुछ सालों से पर्यटकों के नाम पर चारधाम यात्रा व पहाड़ों में बढ़ रही बेतहाशा भीड ने पर्यटकों के साथ-साथ यहां के पर्यटन व्यवसाय व स्थानीय निवासियों की पर्यटन प्रदेश की सुखद अवधारणा को ही चकनाचूर कर दिया है इस बेतहाशा भीड़ से पर्यटक, पर्यटन कारोबारी, स्थानीय लोग व सरकारी पुलिस सब परेशान है। नियत्रित पर्यटन के लिए सरकार के पास कोई दूरगामी योजना ही नहीं है। पूरे गर्मियों के सीजन में पर्यटकों को नैनीताल मसूरी आने से रोका गया, इन स्थानों पर नये पार्किंग स्थल विकसित किये जाने के दावे हवा हवाई हैं।
इन पच्चीस सालों में सबसे ज्यादा निराशा उत्तराखण्ड क्रांति दल से हुई। उतराखण्ड की पहली विधानसभा में कांगेस व भाजपा लगभग 40 विधायक उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन से जुड़े थे तथा उक्रांद के 4 विधायक चुनाव जीते थे। उक्रांद राष्ट्रीय राजनैतिक दलों के भंवर में फंस गया। उसकी ढुलमुल नीति व कमजोर संगठन के कारण उत्तराखंड की जनता ने उसे नकार दिया।
पिछले पच्चीस सालों में उत्तराखण्ड की कोई की सरकार जमीनों की पैमाईश ही नहीं करा सकी। कोई उद्यान नीति नहीं बन सकी। फलों का उत्पादन लगातार कम होता जा रहा है। कीमती जमीनों में बड़े बड़े रिजार्ट उग आये है। जमीनों के मूल मालिक उन ऐशगाहों में मजदूर बने हुए हैं। हमें लगता है। जब उत्तराखण्ड की राजधानी गैरसैंण में होगी मुख्यमत्री, अफसर, नेता सब वहाँ स्थाई रूप से बैठेंगे तो वो पहाड़ की अंदरून समस्याओं की गम्भीरता को समझेंगे। सख्त भू कानून लागू होने के बाद पहाड़ों की पहाड़ियत बची रहेगी।

































