गोविंद पंत ‘राजू’
5 अगस्त 2025 की दोपहर डेढ़ बजे तक उत्तरकाशी जिले में भागीरथी किनारे के धराली में सब कुछ सामान्य था। वहां एक स्थानीय मेले की भी तैयारी थी और इस वजह से आसपास के गांव के कई लोग भी धराली आए हुए थे। लेकिन दोपहर 1:50 पर भयंकर गर्जन और रफ्तार के साथ आए पानी मिट्टी और पत्थरों के प्रचंड सैलाब ने धराली के बहुत बड़े आबाद हिस्से को कब्रगाह में बदल दिया। 50 से अधिक छोटी बड़ी इमारतें और निर्माण कई लाख घन मीटर मलवे के नीचे दब गए। जान बचाने के लिए भागते अनेक लोग जल प्रवाह की चपेट में देखते-देखते समा गए। इमारतें तिनकों की तरह ढह गईं। जान माल की क्षति का आकलन होने में तो अभी वक्त लगेगा लेकिन हरसिल और सुखी टॉप में मौजूद भारतीय सेवा ने तत्काल बचाव कार्य शुरू कर दिया और अब एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें भी वहां पर पहुंच चुकी हैं, लेकिन खराब मौसम और अंधेरे के कारण बचाव दल के लिए कुछ अधिक कर पाना फिलहाल संभव नहीं दिख रहा है।
जिस छोटे से पहाड़ी नाले ने इस भयावह आपदा को जन्म दिया उसे स्थानीय लोग खीर गाड़ भी कहते हैं। यह एक छोटा पहाड़ी नाला है जो 10-12 किलोमीटर ऊपर की पहाड़ियों के पन ढालों से निकलने वाली कई जलधाराओं से मिलकर बनता है। बरसात को छोड़कर साल के ज्यादातर मौसम में इसमें बहुत कम पानी रहता है। इसी के जल ग्रहण क्षेत्र में कहीं बादल फटने के कारण अचानक तेज गति के साथ बहने वाले पानी ने अपने साथ आई गाद, मिट्टी और पत्थरों के जरिए धराली को तबाह कर दिया। इस तबाही को लाने वाले सैलाब की गति इतनी तीव्र थी कि इसने थराली के लोगों को जान बचाने का भी मौका नहीं दिया। भागते-भागते लोग इस तबाही की चपेट में आ गए।
खीर गाड़ या खीर गंगा जहां पर भागीरथी से मिलती है, उसी जगह पर धराली की बसासत है। 1990 से पहले भटवाड़ी गंगोत्री मोटर मार्ग पर धराली बहुत छोटी बस्ती थी। एफसीआई के एक-दो गोदाम, पंचायत भवन, 2-4 कच्ची पक्की दुकानें और एक स्कूल के अलावा वहां पर कुछ नहीं था। वहां से एक पैदल रास्ता मां गंगा के शीतकालीन निवास मुखवा के लिए जाता था। जिस पर खीर गाड़ पार करने के लिए लकड़ी के छोटे-छोटे दो-तीन पुल बने हुए थे और खीर गंगा वहां पर लगभग चार पांच सौ मीटर के दायरे में फैली हुई थी। इस पूरी दूरी में बड़े छोटे पत्थरों का जमावड़ा था और उनके बीच में कहीं-कहीं बहुत छोटी-छोटी जलधाराएं दिखाई देती थी। पत्थरों और रेत के उस विशाल रौखड़ से यह तो अवश्य लगता था कि पूर्व में कभी ना कभी इस नदी ने वहां पर अपना प्रचंड रूप दिखाया होगा और पत्थरों के रूप में प्रकृति ने अपनी चेतावनी छोड़ दी होगी। लेकिन हाल के वर्षों में पर्यटन की अंधी दौड़ और सैलानियों के प्रवाह ने स्थानीय लोगों को उस चेतावनी को भूलने पर मजबूर कर दिया। आपदा के प्रारंभिक वीडियो में साफ दिखता है की पानी के प्रवाह में आने वाले ज्यादातर भवन इस इलाके में बने हैं जिसे प्रकृति ने अपनी चेतावनी के रूप में छोड़ा था। आपदा की चपेट में आने वाले अधिसंख्य भवन होमस्टे या स्थानीय लोगों के छोटे-छोटे होटल हैं। कुछ बड़े होटल भी आपदा की चपेट में आए हैं और आपदा का शिकार होने वाले ज्यादातर भवन नए बने हुए हैं।
बहुत तीव्र ढलान में बहने वाली खीरगाड़ का जलागम क्षेत्र बहुत अस्थिर नहीं है और वहां किसी तरह का मानवीय दखल भी नहीं है। हर की दून की तरफ जाने वाले कुछ पर्वतारोहियों और स्थानीय पशु चारकों के अलावा उस इलाके में लोगों की ज्यादा आवाजाही भी नहीं है। इसलिए प्रारंभिक तौर पर यह कहा जा सकता है कि आपदा का जन्म प्राकृतिक कारणों से हुआ है, लेकिन आपदा का सबसे अधिक दुष्प्रभाव जिस इलाके में हुआ वह प्रकृति के साथ मानवीय घुसपैठ का परिणाम है।
खीर गंगा के अलावा हरसिल के ऊपरी इलाकों में भी कुछ छोटी नदियों में इसी तरह की बादल फटने की घटनाएं सामने आई हैं। कुछ सैनिक इलाकों को भी नुकसान की खबरें हैं और इन सबसे ज्यादा डराने वाली खबर यह है कि हरसिल के पास भागीरथी का प्रवाह थम सा गया है और वहां पर एक झील बनने की आशंका है।
गंगा के मायके में भागीरथी नदी का यह जल ग्रहण क्षेत्र पहले भी इस तरह की घटनाओं का गवाह रहा है। 6 अगस्त 1978 को धराली से कुछ किलोमीटर नीचे भागीरथी नदी की ही एक बहुत छोटी सहायक कनोडिया गाड़ में बादल फटने के कारण एक अस्थाई अवरोध बन गया था । जिसने टूट कर अंततः भागीरथी के जल प्रवाह को रोक दिया और बाद में 6 और 10 अगस्त को वह पूरी भागीरथी घाटी में एक बहुत बड़ी बाढ़ के रूप में तबाही लेकर आया।
17 जून 2013 को भी उत्तराखंड में अचानक हुई मूसलधार वर्षा 340 मिलीमीटर रिकॉर्ड की गयी जो सामान्य 65.9 मिमी से 375 प्रतिशत ज्यादा थी। जिसके कारण बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हुई। इसी दौरान अचानक उत्तरकाशी के डोडी ताल इलाके में बादल फटने के बाद असी गंगा और भागीरथी में जल स्तर बढ़ गया था। लगातार होती रही बारिश की वजह से गंगा और यमुना का जल स्तर भी तेजी से बढ़ा। कुमाऊं हो या गढ़वाल मंडल, बारिश ने हर जगह तबाही मचाई। 16 और 17 जून 2013 को केदारनाथ क्षेत्र में सर्वाधिक तबाही हुई। केदारनाथ मंदिर सहित पूरी केदार घाटी में तीर्थयात्रियों सहित 5000 से अधिक लोगों की जान गई। हजारों घर, पुल, सड़कें और गांव तबाह हो गए।
इस वर्ष भी अब तक ऐसी अनेक घटनाएं हो चुकी हैं। उत्तरकाशी जिले के बड़कोट-यमुनोत्री मार्ग पर बलिगढ़ में 28 जून की रात को बादल फटने की घटना ने भारी तबाही मचाई।इस प्राकृतिक आपदा के कारण एक निर्माणाधीन होटल को व्यापक नुकसान पहुंचा है। घटना में 9 मजदूरों की जान चली गई। बादल फटने के कारण अचानक बढ़ गए पानी ने यमुनोत्री हाइवे को भी भारी नुकसान पहुंचाया। रुद्रप्रयाग और चमोली जनपद में स्थित बद्रीनाथ और केदारनाथ क्षेत्र में भारी वर्षा के कारण मंदाकिनी और अलकनंदा नदी घाटियों में भी बादल फटने और भूस्खलन की अनेक घटनाएं हुई हैं। बागेश्वर और पिथौरागढ़ जिलों में भी बादल फटने से तबाही के समाचार हैं। इन घटनाओं में जनधन की भारी हानि हुई है।अनेक इलाकों में खेती की जमीन खत्म हो गई है और पशुओं को भी जान गंवानी पड़ी है।
वैसे तो बादल फटने और आकाशीय बिजली गिरने की दोनों ही घटनाएं प्राकृतिक आपदाएं हैं लेकिन हाल के वर्षों में इन दोनों की संख्या और तीव्रता जिस तरह से बढ़ रही है उसके पीछे ग्लोबल वार्मिंग को भी एक कारण माना जा रहा है।लेकिन विशेषज्ञों की राय में अनियंत्रित मानवीय हस्तक्षेप, प्रकृति के साथ मनमानी छेड़छाड़ और पर्यावरण के खिलाफ काम किए जाने की बढ़ती प्रवृत्ति मुख्य रूप से जिम्मेदार है।
































