शिरीष मौर्य
कितनी बारिश होगी हर कोई पूछ रहा है
कुछ पता नहीं हर कोई बता रहा है
बारिश तो बारिश की ही तरह होती है
पर लोग लोगों की तरह नहीं रहते
रहना रहने की तरह नहीं रहता
भीगना भीगने की तरह नहीं होता
नदियां मटमैले पानी से भरी बहने की तरह बहती हैं
बहने के वर्षों पुराने छूटे रास्ते उन्हें याद आने की तरह याद आते है
वे लौटने की तरह लौटती हैं
पर उनकी आंखें कमज़ोर होती हैं
वे दूर से लहरों की सूंड़ उठा कर सूंघती हैं पुराने रास्ते
और हाथियों की तरह दौड़ पड़ती हैं
बारिश नदियों को
हाथियों का बिछुड़ा झुंड बना देती है
जो हर ओर से चिंघाड़ते बेलगाम आ मिलना चाहते हैं
किसी पुरानी जगह पर
जहां उनके पूर्वजों की अस्थियां धूप में सूखती रहीं बरसों-बरस
नदियों के पूर्वज पूर्वर्जों की तरह होते हैं
पुरखों की ज़मीन जिस पर आ बसे नई धज के लोग
नई इमारतें
वहां से उधेड़ी गई मिट्टी, काटे गए पेड़ और तोड़ी गई चट्टानें
पहाड़ पानी के थैले में बांध देते हैं दुबारा
वहीं तक पहुंचाने को
वापिस लौटाने होते हैं रास्ते
बारिश की इसी बंदोबस्ती में
लोगों की तरह नहीं रहने वाले लोगों को
छोड़नी पड़ती है ज़मीन
जो पीछे नहीं हटता ग़लती या ख़ुशफ़हमी में
मारा जाता है
नदियां हत्यारी नहीं होतीं
हत्यारी होती हैं लोगों की इच्छाएं सब कुछ हथिया लेने की
बारिश तो बारिश की ही तरह होती है
पहाड़ों पर
मैं भी इसी बारिश के बीच रहता हूं
भीगता हूं भीगने की ही तरह
मेरी त्वचा गल नहीं जाती ढह नहीं जातीं मेरी हड्डियां
मैं ज़्यादा साफ़ किसी भूरी मज़बूत चट्टान की तरह दिखता हूं
उस पर लगे साल भर के धब्बे धुल जाते हैं धुलने की तरह
कुछ अधिक तो नहीं मांगती
मेरे पहाड़ों से निकल सुदूर समन्दर तक जीवन का विस्तार करती नदियां
बस लोग लोगों की तरह
रहना रहने की तरह
छोड़ देना कुछ राह जो नदियों की याद में है याद की तरह
नदियों की पूर्वज धाराओं की अस्थियों पर बसी बस्तियां
स्थायी नहीं हो सकतीं
पर स्थायी होती है नदियों की याददाश्त
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2015
मुश्किल दिन की बात

































