डॉ. हरीश चन्द्र अण्डोला
उत्तराखंड की संस्कृति एवं जनजीवन से ताल्लुक रखने वाली पारम्परिक काष्ठ से निर्मित वस्तुयें, मसलन दही जमाने के लिए ठेकी, दही फेंटकर मठ्ठा तैयार करने वाली ढौकली, अनाज मापन के लिए नाली व माणा तथा खाद्यान्न के संग्रहण के लिए भकार वगैरह अब संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रहे हैं। ये वस्तुएं सीमांत इलाकों के कुछेक गाँवों तक सिमट गई हैं। भले ही पुरानी वस्तुएँ अपनी अलग छाप छोड़ने के साथ ही असुविधा के दौर में मानव जीवन के लिए खासे मददगार रही हों, किन्तु आधुनिकता इन पर भारी पड़ी। इस कारण ये विलुप्ति की ओर बढ़ती जा रही हैं।
देवभूमि उत्तराखंड में मानवीय कार्यकलाप संस्कृति के उषाकाल से शुरू हो गए। ऐसा प्रमाण पाषाण कालीन उपकरण, विभिन्न स्थानों पर चित्रित शैलाश्रय और काष्ठ कला को समेटे दैनिक प्रयोग की अनेक वस्तुएं देती हैं। असुविधा के दौर में यहां मानव ने लकड़ी के खूबसूरत उपयोगी बर्तन व वस्तुएं इजाद कर डाले, जिनमें काष्ठ कला भी बेहतर है। पहाड़ में लकड़ी व रिंगाल की घरेलू काम की वस्तुएं बननी कब शुरू हुईं, इसका उल्लेख स्पष्ट नहीं है, मगर संग्रहालय की शोभा बने यह प्राचीन वस्तुएं करीब डेढ़ सौ से दो सौ साल पुरानी हैं।
पहाड़ में दही जमाने के लिए ठेकी तथा दही से मठ्ठा तैयार करने के लिए डौकली व रौली बनाई, जो स्वास्थ्य लाभ पहुँचाने वाली सांगड़ व गेठी की लकड़ी से बनी। इसी प्रकार घी रखने के लिए हड़पिया, नमक रखने को आद्र्रताशोषक तुन का करुवा नामक छोटा बर्तन और तुन की लकड़ी के ही आटा गूँथने व अन्य कार्य को बड़ी पाई या परात का इस्तेमाल हुआ। यहाँ तक कि छोटे बच्चों को दूध पिलाने के लिए केतलीनुमा गणवे का प्रयोग हुआ। वहीं कटोरी के रूप में फरवा प्रयोग में रहा। अन्न भंडारण के लिए बड़े संदूकनुमा भकार व पुतका, अनाज की मापन के लिए नाली, पाली, माणा व बेल्का, आटे से बने पके भोजन को रखने के लिए छापरा का प्रचलन था।
पहाड़ी वाद्य यंत्र भी काष्ठ से ही तैयार होता है
इनमें से अधिकांश चीजें अब प्रचलन से बाहर हो गई हैं। इसके चलते ये वस्तुएं अब अपनी पहचान तक को तरसने लगी हैं। कतिपय चीजें काफी कम संख्या में सीमांत व दूरस्थ गांवों में सीमित मिलती हैं। इनके साथ ही काष्ठ कला के संरक्षण पर भी प्रश्नचिन्ह लग रहा है।
क्षेत्र में बिखरे पाषाणकालीन उपकरण, चित्रित शैलाश्रय और काष्ठ कला को समेटे वस्तुओं के संग्रह व अनुरक्षण के लिए सन् 1979 में ऐतिहासिक एवं सास्कृतिक नगरी अल्मोड़ा में स्थापित राजकीय संग्रहालय के प्रवेश द्वार का कक्ष दैनिक उपयोग की प्राचीन वस्तुओं को प्रदर्शित करता है, जिन्हें सुरुचिपूर्ण व वैज्ञानिक तरीके से प्रदर्शित किया गया है। रैका, बम व चंद राजवंश के शासनकाल में इस प्रकार के बर्तन अत्यधिक चलन में थे। बर्तन निर्माता वर्ग से विभिन्न करों की वसूली में इस प्रकार के लकड़ी के बर्तन लिए जाते थे। 5वीं तथा छठी सदी में मंदिरों में मूर्तियों का निर्माण काष्ठ से किया जाता था, इसका प्रमाण देघाट स्थित तालेश्वर मंदिर है।
एक दौर में विशेष महत्व रखने वाली प्राचीन वस्तुओं का प्रयोग अब विलुप्त सा हो गया है। राजकीय संग्रहालय में काष्ठ से बनाई गई दैनिक उपयोग से जुड़ी अनेक प्राचीन वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं। ये वस्तुएं दीर्घकाल तक संरक्षित रहें, इसके लिए इन्हें विशेष ट्रीटमेंट के लिए लखनऊ स्थित प्रयोगशाला में भेजा जाता है। काष्ठ कला से जुड़े ऐसी प्राचीन वस्तुओं को तलाशने व उनका संग्रहण करने का काम जारी है।
उत्तराखण्ड में प्राचीन काल में प्रयोग होने वाले चमत्कारिक मिट्टी और लकड़ी के विशेष बर्तनों में भोजन पकाने और भोजन करने की सलाह पारम्परिक स्थानीय वैद्य देते थे। वह चिकनी मिट्टी ऊँचे पहाड़ों की चोटी के आसपास या साफ नदियों के किनारे की हुआ करती थी। बर्तन बनाने वाले में भी विशेष महारत होती थी। वैद्य के दिशा निर्देशनानुसार जड़ी-बूटियों को मिला कर कुम्हार बर्तन तैयार करता था। इन बर्तनों में भोजन करने या पकाने से कई कृमि, प्लीहा, कोढ़, कफ और प्रदर जैसी घातक बीमारियाँ समाप्त हो जाती थीं। बुराँश की लकड़ी के बर्तनों का प्रयोग दूध, दही, मक्खन और घी के लिए किया जाता था, जो कि समाज में सामान्य सी दिनचर्या थी। आज भी उत्तराखण्ड के गाँवों में बुराँश की ठेकी (सामान्यतः दही जमाने या रखने के काम आने वाला बर्तन), पर्या (दही मथने का बड़ा बर्तन) और रोड़ी या रोड़ (लकड़ी की मथनी) प्रयोग में लाये जाते हैं। बुराँश की लकड़ी को इसके औषधीय व रासायनिक गुणों के कारण ठेकी तथा पर्या के रूप में प्रयोग किया जाता है।
मथनी के लिए आवश्यकतानुसार छः प्रकार के विशेष पेड़ों की सपाट टहनियाँ उपयुक्त मानी गयी हैं। जहाँ बुराँश उपलब्ध नहीं होता था, वहाँ पर अन्य प्रकार की लकड़ी के बर्तनो का प्रयोग हुआ करता था। लेकिन कुछ को छोड़ कर उनमें बुरांश जैसे औषधीय गुण नहीं हुआ करते हैं। विशेष वृक्ष के पत्तों के पूड़े (कटोरियाँ), भोजन परोसने के लिए अपना अलग औषधीय स्थान रखते थे। सबसे लाभकारी विशेष प्राकृतिक वनस्पति के बर्तनो और विशेष जड़ी-बूटियों से मिश्रित मिट्टी के बर्तनों का ही प्रयोग ही करते थे। इस प्रकार के ज्ञान को राजवैद्य गोपनीय रखते थे। उत्तराखण्ड में छोटे-छोटे गढ़ या स्वतन्त्र राज्य हुआ करते थे। वहाँ के वैद्यों को प्राकृतिक चिकित्सा में महारत हासिल थी। लेकिन राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक परिवर्तनों के चलते यह ज्ञान सिर्फ कुछ पांडुलिपियों या ताम्र पत्रों तक ही सीमित रह गया है।
काष्ठ कला के हस्तशिल्पियों को प्रशिक्षण देने के लिए श्रीनगर के पापड़ी में खुला काष्ठ कला केंद्र बन्द पड़ा है। अब यहाँ पर न तो प्रशिक्षण दिया जाता है और न ही काष्ठ कला को बढ़ावा देने के लिए कोई गतिविधियाँ चल रही है। यदि सरकार इस केन्द्र का विस्तारीकरण कर शिल्पियों को आधुनिक तकनीक का प्रशिक्षण दे तो अनेक लोगों को रोजगार मिल सकता है।

































