विकाश इजा प्रयास
शायद 2007 या 08 की बात है, एक सांस्कृतिक समारोह में गिर्दा से मुलाकात और ढेरों बातें हुई। किसी साथी ने संस्कृति बचाने को लेकर सवाल किया कि हम कैसे बचा सकते हैं अपनी उत्तराखंडी संस्कृति को ये तो खत्म होने की कगार पर है? गिर्दा ने बीड़ी के धुएं के साथ दो टुक जवाब भी छोड़ा “बब्बा तुम बचा सकोगे ‘संस्कृति’, संस्कृति कोई एक पेड़, पहाड़, नदी है या कोई कपड़ा- लत्ता, ढोल-दमौं, हुड़का या कोई बोली,भाषा,गीत। संस्कृति को बचाया नहीं जाता पोषित किया जाता है अपनी बोली, भाषा, व्यवहार, विचार और लोक से। जब हम अकेले संस्कृति बना नहीं सकते तो बचाने की बात भी नहीं है।”
पिछले सप्ताह रुद्रप्रयाग, उत्तराखण्ड के सारी गांव में काफल फेस्टिवल का आयोजन टीम पंडौं, सारी ग्रामसभा, सारी के ज्यादातर होमस्टे और कुछ गिने चुने आयोजकों के मेलजोल से। फेस्टिवल क्या था मेला था, अच्छे लोगों का मेला, अच्छी सोच समझ और विचार का मेला, लोक और लोक के चहेतों का मेला, पर्यावरण और उसके संरक्षण का मेला, सवाल जवाब और जवाबों से उभरते नए सवालों का मेला, युवा और युवासोच का मेला, कविता और गीत का मेला, संस्कृति और उसके पोषण का मेला।
सारी गांव के खेतों में खुले आसमान के नीचे विशाल भीमकाय पत्थर पर जब मंच तैयार हो रहा था, तब ही ये विचार मन को बिना संगीत के झंकृत कर रहा था कि यहां कुछ अद्भुत होने जा रहा है। एम्फ़िथिएटर नुमा इस प्रांगण के सीढ़ीदार खेतों में जब दर्शक धीरे धीरे बैठना शुरू हुए तो ऐसा महसूस हुआ जैसे गांव में बारात को देखने चौक, डिंडयाली में पूरा गांव इकट्ठा हो रहा हो। गांव के लोगों द्वारा बनाए गए अरसे, रोटाने, जलेबी पूर्व में हुए किसी मेले की याद को जीवंत कर रहे थे। जब तक मालू के पत्ते, अरसे, जलेबी रहेंगी संस्कृति पोषित होती रहेगी।
पानी की व्यवस्था से लेकर भोजन की व्यवस्था तक सभी पर्यावरण के अनुकूल थी, जहां पानी के लिए मिट्टी के घड़ों का इस्तेमाल हुआ, खाने के लिए ऐसी थाली का जो धरती को नुकसान नहीं पहुंचाएगी, तो जलेबी पकौड़ी के लिए मालू के पत्ते इस्तेमाल में लाए गए। प्लास्टिक का न्यूनतम इस्तेमाल हुआ और उसे भी उसके गंतव्य तक पहुंचाया गया। डस्टबिन के तौर पर रिंगाल की बनी टोकरियों/डोक्का या ड्वाक का इस्तेमाल किया गया। हम आज में होते हुए भी सदियों पीछे की परंपराओं को निभा रहे थे। जब तक ये परंपरा रहेगी संस्कृति पोषित होती रहेगी।
युवाओं का इस फेस्टिवल को बनाने, संवारने और सफल करने में बड़ा हाथ रहा। इसकी कल्पना से लेकर इसके सफल आयोजन तक पंडौं ने रतजगों वाली मेहनत की। और इस विचार को फलीभूत करने में बहुत से युवा साथियों ने अपना अपना योगदान दिया। फिर वो चाहें स्टेज, साउंड, फोटो, वीडियो, एंकरिंग जैसे स्किल काम हों या रजिस्ट्रेशन, स्वागत, साज सज्जा, सफाई और संयोजन जैसे जिम्मेदारी वाले काम। जब तक ऐसे युवा हैं संस्कृति पोषित होती रहेगी।
किसी भी पर्यावरणीय संसाधन को नुकसान पहुंचाए बिना और यह सुनिश्चित करते हुए कि आगे भी इसका इस्तेमाल सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय पहलुओं को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा ही सस्टेनेबिलिटी कहलाती है, ऐसा किताब में पढ़ा था लेकिन इसको महसूस करने मौका यहां मिला। राहुल कोठियाल और डॉ एस.पी. सती की बातचीत भी इसी दशा दिशा की ओर थी जहां पर्यटन, पर्यावरण और संसाधनों के दोहन और बेहतर उपयोग पर बेहतर चर्चा हुई। जन, जनप्रतिनिधि और जनकर्मियों के बीच ये जनसरोकार वाली खुलेमंच की चर्चा किसी एसी स्टूडियो में हुई चकड़ैती को मुंह चिढ़ाती हुई नज़र आई । जब तक ये आकाश के नीचे की चर्चाएं रहेंगी संस्कृति पोषित होती रहेगी।
कविताएं विचारों का सार हैं, और लोकभाषा में रची कविताएं उसी सार का छंदरूप । लोकभाषा इन कविताओं को ना सिर्फ ध्वनि देती है बल्कि एक तारतम्यता भी देती है जो सुनने वालों को की अलग अलग भावों में आनंदित और उद्वेलित करती है । एक कवि सम्मेलन ऐसा भी हुआ मंडुवे/कोदे/रागी के खेतों के बीच अपनी दानेदार कुरकुराहट छोड़ गया। मुरली दीवान जी और जगदंबा चमोला जी की कविता लंबे समय तक उनको मिली तालियों के लिए याद रहेगी। ये कविता, छंद, खिलखिलाहट और तालियां जब तक रहेगी संस्कृति पोषित होती रहेगी।
जब ईशान “उत्तराखंड मेरी मातृभूमि” गीत पर ढोल बजाना शुरू करता है तो आंखों के कोने में पानी जमा होना शुरू हो जाता है और गिर्दा को याद करते हुए अनचाहे ही ढलक पड़ता है। जब “गाजिणा” गीत पर बिना सोचे ही बड़े-छोटे सब अपनी अपनी जगहों पर थिरकने लगे, “फुलारी” के साथ सभी गुनगुनाने लगे और “घुघुति बासूती” पर अपने अपने बचपन को याद करने लगे। “यकुंलांस” के गीत पर लोगों की आँखें डबडबाती हुई मैंने भी देखी और “राधा” पर उन्हीं आंखों को हाथ पैर के साथ नाचता हुआ भी। जब तक खुले आकाश के नीचे खेतों में ऐसे गीत गाए और सुने जाएंगे संस्कृति पोषित होती रहेगी।
मुझे खुशी है कि मैं इस आयोजन का चश्मदीद बन सका, भोपाल आने के बाद वैसे भी पहाड़ों की याद बहुत तेज़ हो गई है और मैं इस मौके को बिल्कुल भी नहीं गवां सकता था। बहुत से नए लोगों से मुलाकात हुई और चहेते दोस्तों/दगड्यौं, बुजुर्गों और परिचितों से भेंट। ऐसे मौके बनाने के लिए पंडौं का धन्यवाद। ये मेल मिलाप ही मेलों का रूप लेकर आज फेस्टिवल की शक्ल ले पाया है। जब तक ऐसे दोस्त, मेल, मिलाप, मेले और फेस्टिवल हैं संस्कृति पोषित होती रहेगी।

































