वजीर हस्सा
बलिया नाला के साथ-साथ बायीं ओर से एक मोटर रोड हल्द्वानी से आती है और दाहिनी ओर से दूसरी सड़क भवाली से। जिस जगह पर ये दोनों सड़कें मिलती हैं, उस जगह पर तीन-चार साल पहले तक नैनीताल का बस अड्डा था। नैनीताल निवासी इस स्थान को ‘डाँठ’ नाम से जानते हैं। इसके ठीक-नीचे नैनी झील का पानी बहने से रोकने के लिये दरवाजे हैं, जिससे इसे ‘डाट’ कहा गया गया होगा। मगर अब यह ‘डाँठ’ है। नैनीताल के पुराने चित्रों में यह बहुत छोटा दिखाई देता है और यहीं पर एक पुल, जिसे ‘लेक ब्रिज’ कहा जाता था, पार कर माल रोड शुरू हो जाती थी। पिछली शताब्दी के पचास के दशक में कभी बलिया गधेरे के दरवाजों से हट कर, तालाब के दक्षिणी हिस्से में आर.सी.सी. काॅलम और उन पर लेण्टर डाल कर ‘डाँठ’ को थोड़ा विस्तार दिया गया।
नैनी झील और फ्लैट्स की तरह डाँठ भी नैनीताल का एक महत्वपूर्ण स्थान है, जिस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। मगर फिलहाल उसकी सुविधा नहीं है। आजकल नैनीताल का डाँठ अपनी दो गांधी प्रतिमाओं के कारण चर्चित हो रहा है। गांधी जी की प्रतिमायें भारत के हर शहर में तो होंगी ही, दुनिया के दर्जनों देशों में भी मौजूद हैं। मगर जिस तरह नैनीताल के डाँठ में दस मीटर के दायरे में गांधी जी की दो मूर्तियाँ आमने-सामने खड़ी हैं, वैसा तो दुनिया में शायद कहीं नहीं होगा। बाहर से आने वाले लोग इन मूर्तियों को देख कर चैंकते हैं, अचरज करते हैं और कुछ तो जानना भी चाहते हैं, मगर उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता।
एक मूर्ति में गांधी जी लाठी लेकर कहीं आगे जाने की कोशिश में हैं। ये गांधी कृशकाय हैं, जैसा कि वे वास्तव में थे और मलिन हैं। हालाँकि वर्ष 1972 में केन्द्रीय मंत्री के.सी. पन्त द्वारा अनावरित होने से इस स्थान पर खड़े हैं, मगर इन दिनों देख-रेख के अभाव में और भी ज्यादा सुस्त हो गये हैं। दूसरे गांधी हट्टे-कट्टे हैं, चमकदार हैं और बैठ कर चर्खा कात रहे हैं। नजदीक ही उनके तीन बन्दर भी मौजूद हैं। कोई छः महीने पहले वे एकाएक इस स्थान पर अवतरित हुए थे।
कृशकाय गांधी की स्थापना गांधी शताब्दी वर्ष, 1969 में नगरपालिका द्वारा पारित एक प्रस्ताव के बाद हुई थी, क्योंकि इसी स्थान पर महात्मा गांधी ने वर्ष 1929 में नैनीताल की जनता को सम्बोधित किया था। पचास साल बाद नैनीताल के जिला प्रशासन को ये पुराने वाले कृशकाय गांधी अखरने लगे। उन्होंने उन्हें यहाँ से हटा कर ताकुला, जहाँ वर्ष 1929 और 1931 में गांधी जी ने प्रवास किया था, भेज देने और यहाँ चैराहे के बीचोंबीच एक हट्टे-कट्टे, भव्य गांधी स्थापित करने निर्णय किया। योजना दरअसल यह बताई गई कि बढ़ते हुए टैªफिक के दृष्टिगत डाँठ के इस चैराहे को चैड़ा करना जरूरी है। मगर हर शहर में कुछ अड़ियल लोग होते हैं, जो पर्यावरण, परम्परा, विरासत जैसे मुद्दों पर अड़ंगा लगाते रहते हैं। वर्षों से वे मालरोड पर ट्रैफिक कम करने और उसे पैदल चलने वालों के लिये निरापद बनाने, गाड़ियों को शहर से बाहर रोकने आदि मुद्दों पर आवाज उठाते रहते हैं। उन्होंने जिला प्रशासन के इस प्रयास का भी विरोध किया। उन्हें डर था कि इस मूर्ति के ठीक नीचे बलिया गधेरे के पानी की निकासी के गेट हैं। यहाँ पर भी गाड़ियाँ चलने लगेंगी तो उनके कम्पन से ये गेट क्षतिग्रस्त हो सकते हैं। उन्होंने मल्लीताल रिक्शा स्टैण्ड पर स्थित भारतरत्न पं. गोविन्द बल्लभ पन्त की मूर्ति हटाने और वर्ष 1872 में स्थापित तल्लीताल डाकखाने की हेरिटेज इमारत को तोड़ने का भी विरोध किया। दो महीने तक इस मुद्दे पर आन्दोलन होता रहा। आन्दोलनकारी हर शाम गांधी जी मूर्ति के आगे मोमबत्ती जला कर रामधुन गाते रहे। इस पर भी प्रशासन नहीं झुका तो वे एक जन हित याचिका लेकर उच्च न्यायालय पहुँच गये, जहाँ उन्हें स्थगनादेश मिल गया।
इस स्थगनादेश के बावजूद जिला प्रशासन ने एक दिन यहाँ पर गांधी जी की नयी मूर्ति स्थापित कर दी। कुछ समय तक यह प्रतिमा ढँकी हुई रही। फिर वह खोल दी गई, उसके निकट तीन बन्दर रख दिये गये और रंग-रोगन, फूल-पौधों से गांधी जी को सजा-सँवार भी दिया गया। मजेदार बात यह है कि इस प्रतिमा का औपचारिक अनावरण भी नहीं हुआ है, जबकि इस बीच दो-तीन बार तो उत्तराखण्ड के मुख्यमंत्री ही नैनीताल के दौरे कर चुके हैं।
अब ये दोनों मूर्तियाँ नैनीताल आने वालों को अचम्भे में डाले हुए हैं। यह तो स्वाभाविक है कि पुराने कृशकाय, मलिन गांधी की तुलना में नये, हट्टे-कट्टे, भव्य गांधी पर्यटकों को ज्यादा आकर्षित कर रहे हैं। उनके साथ फोटो खिंचवाने और सेल्फी लेने वालों की संख्या अधिक है।

































