इस्लाम हुसैन
उत्तराखंड के गांधीवादियों और बड़ी संख्या में रहने शराब विरोधियों को इस बात से बहुत गुस्सा है कि उत्तराखंड सरकार शराब का बढ़ावा देकर और उससे हासिल टैक्स के पैसों से उत्तराखंड के विकास का झूठा दावा कर रही है।
अगर यह बात सही भी है तो पूरी तरह अनैतिक है, यह बड़े आश्चर्य की बात है कि उत्तराखंड सरकार शराब पर प्रति बोतल/यूनिट पर 3 रुपए सेस/लेकर उसमें से 1 रुपया गौसेवा,1 रुपया महिलाओं के विकास और 1 रुपया खेलों के विकास पर खर्च कर रही है। गौ संरक्षण, महिला व खेल विकास का यह तरीका बहुत ही आपत्तिजनक और समाज के नैतिक पतन का द्योतक है।
गांधीवादियों को इस बात से भी ग़म और गुस्सा है कि सरकार एक तरफ शराब के टैक्स की कमाई बढ़ाकर खज़ाना तो भर रही है लेकिन इससे प्रदेश की जनता विशेषकर युवाओं का जीवन खोखला हो रहा है। नशे के सरकारी कारोबार के अलावा अवैध शराब, भांग चरस व नशीली दवाओं का कारोबार और इस्तेमाल दोनों बढ़ रहे हैं।
एक और शर्मनाक बात यह है की उत्तराखंड सरकार शराब की कुल बिक्री को उत्तराखंड के हर नागरिक से जोड़कर बदनाम और शर्मिंदा कर रही है, हर रिपोर्ट में बताया जाता है कि कुल राजस्व के आधार पर औसतन प्रदेश का हर नागरिक इतने रूपये की शराब “पीकर” प्रदेश के विकास में “सहयोग” कर रहा है। जैसे कि पिछले साल हर नागरिक ने करीब 4250 रूपये के राजस्व में हिस्सेदारी की है, यानी 4250 रुपए की शराब पी है। सरकार शराब पर करीब 50% टैक्स लगाती है, इस तरह यह आंकड़ा करीब 9000 हजार करोड़ रुपए का बैठता है।
शराब की दूकानों में एजेंट/ सेल्समैन द्वारा ओवर रेटिंग भी होती है, जिसके कारण प्रदेश भर में आए दिन जगह जगह शराबियों और शराब दूकानदारों की बीच झगड़े होते रहते हैं। ऐसे झगड़ों में कथित विद्यार्थी नेता और छुटभय्ये नेता शामिल रहते हैं। इस तरह प्रदेश भर में शराब और शराब से सम्बंधित कारोबार में करीब 10000 करोड़ रूपए का धंधा होता होगा। और प्रदेश सरकार इसी धंधे को लगातार बढ़ावा दे रही है। सरकार की नजरों में यही सबसे बड़ा कारोबार और रोजगार का जरिया है।
बताया जाता है कि शराब से राजस्व वसूली का लक्ष्य अगले साल 5000 करोड़ का कर दिया है। इस तरह देखा जाए तो हर नागरिक हर साल “इतने” रूपये शराब “पी” जाता है, या प्रदेश का हर नागरिक शराब की कमाई में इतनी हिस्सेदारी दे रहा है। सवाल यह उठ रहा है कि उत्तराखंड में गांधीवादियों के अलावा लाखों महिला, पुरुष, युवा बच्चे और और धार्मिक समूह जो शराब छूते नहीं है उनको शराब बिक्री से जोड़कर बेइज्जत क्यों किया जा रहा है ?

































