डॉ. नवीन जोशी
देशवासियों को देश आंदोलनों से मिला। उत्तराखंड वासियों को अलग प्रदेश आंदोलनों से मिला। और विशुद्ध अहिंसात्मक आंदोलनों से मिला। देश में असहयोग और सविनय अवज्ञा जैसे और उत्तराखंड में कुली बेगार, कुली उतार व कुली बरदाइश जैसी कुप्रथाओं का अंत करने वाली बागेश्वर की ऐतिहासिक रक्तहीन क्रांति, पेड़ों को बचाने के लिये दुनियाभर में चर्चित चिपको आंदोलन, देश को नया वन अधिनियम देने वाले वनांदोलन और नशा नहीं-रोजगार दो जैसे सफल आंदोलनों का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन आज इन आंदोलनों का जिक्र इस प्रश्न के साथ कि देश के सफल आंदोलनों की इस कड़ी में दिल्ली में हुए अन्ना आंदोलन और पंजाब-हरियाणा से लेकर दिल्ली तक हुए उग्र किसान आंदोलनों के बाद देश में कोई भी बड़ा आंदोलन क्यों नहीं हो पा रहा है और खासकर क्यों सफलता पाने के स्तर तक नहीं पहुंच पा रहा है। यह प्रश्न इस मौके पर उठा है कि देश में वक्फ बिल एक तरह से बिल्कुल खामोशी से संसद के दोनों सदनों में पारित होने के बाद राष्ट्रपति की मुहर लगने के साथ कानून भी बन गया है। जबकि देश में सीएए का कानून लागू होने और कश्मीर से धारा 370 के हटने की तरह इसके विरोध को लेकर भी देश भर में उग्र आंदोलनों की चिंता जतायी रही थी। खासकर धारा 370 के हटने के बाद जिस तरह कश्मीर में ‘तिरंगा उठाने वाला भी कोई नहीं बचेगा’ जैसी बातें की जा रही थीं, लेकिन इसके बाद तिरंगा झंडा और भी ऊंचा उठकर फहरा रहा है। सीएए का आंदोलन भी अपने उद्देश्य के प्रति निष्प्रभावी ही कहा जाएगा। ऐसे में बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि देश में क्या आंदोलनों की ताकत कुंद पड़ गयी है। यदि ऐसा हुआ है तो क्यों?
ऐसा लगता है कि हालिया दौर में हुए आंदोलनों ने और सरकारों के उनके प्रति कड़े रवैये के कारण आंदोलनों की धार कुंद पड़ गयी है। अब बड़ी से बड़ी जेन्युइन, महत्वपूर्ण-जरूरी समस्याओं के लिये कोई भी आंदोलन करना आसान नहीं रह गया है। आप निकट भूत काल में पीछे मुड़कर देख लीजिए और याद करने की कोशिश कीजिए कि देश-प्रदेश में कौन सा आंदोलन सफल रहा है ? ऐसा लगता है कि आंदोलनों के असफल होने की शुरुआत अन्ना आंदोलन से हुई थी। एक ओर जहां पूरे देश में चर्चित हुए केंद्र की तत्कालीन कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के दौर में भ्रष्टाचार के विरुद्ध और लोकायुक्त की मांग पर अगस्त 2011 में हुए इस आंदोलन में केंद्रीय सरकार की असंवेदनशीलता के कारण देश के आधुनिक गांधी के रूप में उभरे वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे की 13 दिनों तक आंदोलन करने के बाद जान पर बन आयी थी। बाबा रामदेव को महिलाओं के वस्त्रों में मंच से कूदकर भागना पड़ा था। लेकिन इस आंदोलन का क्या परिणाम रहा। देश में सत्ता परिवर्तन हो गया लेकिन देश में भ्रष्टाचार में कितनी गिरावट आई, कहना मुश्किल है। देश में लोकायुक्त आज तक भी नहीं आ पाया। अलबत्ता इस आंदोलन का फायदा उठाकर ‘आम आदमी पार्टी’ के नाम से पैदा हुई एक पार्टी दिल्ली में 10 वर्ष राज कर गयी और एक समय देश की प्रतिष्ठा लाल किले तक चढ़ आने के बावजूद किसान आंदोलन की समर्थक रही इसी आम आदमी पार्टी ने ही आखिर पंजाब में किसान आंदोलन के तंबू उखाड़कर आखिरी कील ठोकी। इसी तरह उत्तराखंड में हाल में संसद में तक उठे खनन के मुद्दे पर ‘गंगा सदन’ हरिद्वार के कम से कम दो संत आमरण अनशन कर अपनी जान दे चुके हैं। लेकिन यह समस्या भी निसंदेह खनन से राज्य की आय बढ़ाने के बावजूद जस की तस बनी हुई है।
देश-प्रदेश में सरकार जहां एक ओर एक वर्ग को हर सरकार की तरह महादमनकारी प्रतीत होती है और विपक्ष ‘कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं बचेगा’ जैसी और ‘ईंट से ईंट बजाने’ जैसी धमकियां देता है। वहीं हर बार बड़े से बड़े जन समस्याओं के मामले में विरोध उभरता-प्रकट होता तक नजर नहीं आता है। इसका कारण क्या है ? क्या सरकार इतनी मजबूत हो गयी है कि वह हर विरोध को दबा देती है या कि विरोध के मुद्दे और विरोध करने वाले ही इतने कमजोर और कुंद हो गये हैं। या वह जनता से इतने कट गये हैं, सरकार के हर कदम पर, देश-प्रदेश के हित में उठाये गये कदमों पर भी ‘विरोध के लिये विरोध कर’ अविश्वसनीय हो गये हैं। या कि वह जनता के नहीं, अपने निहित स्वार्थ के मुद्दे उठाते हैं, इसलिये उन्हें अपने आंदोलनों में जनता का समर्थन नहीं मिलता और उनके आंदोलन जनांदोलन नहीं बन पाते। बल्कि यह भी लगता है कि सरकार चाहे किसी की भी हो, उसने आंदोलनों की कमजोरी को समझ लिया है, पकड़ लिया है। आंदोलनों को दबाना सीख लिया है। उन्हें पता चल गया है कि अन्ना जैसा आंदोलन ही क्यों न हो जाए, उसकी एक सीमा होती है। कोई भी व्यक्ति-संस्था एक सीमा तक ही आंदोलन पर अडिग-टिक सकता या सकती है। एक सीमा तक ही क्रमिक-आमरण अनशन किया जा सकता है। और इससे पहले ही आंदोलन पर प्रश्न उठाने के लिये सरकार के पास तमाम माध्यम-उपाय अस्त्र-शस्त्र होते हैं। यह भी दिखता है कि विरोध करने वाले भुक्तभोगियों की जगह आंदोलन को कोई अन्य निहित स्वार्थी लोग हाइजैक कर लेते हैं। अपने हाथों में ले लेते हैं। कई बार वह पिछले दरवाजे से सत्ता से समझौता कर लेते हैं। सत्ता में बैठे लोग भी ऐसे लोगों की पहचान करना और उन्हें दाने डालना बेहतर जानते हैं। कई बार विरोध करने वालों का विरोध भी व्यापक जनहित में नहीं, बल्कि निहित स्वार्थों के लिये होता है, और इन सभी कारणों से आंदोलनों की ताकत और सफलता कमजोर पड़ जाती है। खासकर विपक्षी राजनीतिक पार्टियां, जिन पर जनता की समस्याओं को सरकार के सामने पुरजोर तरीके से उठाने की जिम्मेदारी है, वे ऐसे विरोध करने वालों का सबसे बड़ा उदाहरण बन गयी हैं। ऐसा साफ लगता कि या तो वह बिना विषय को पूरी तरह से समझे, या जानबूझकर, या हर बात का विरोध कर अपने विरोध के स्वरों को भोथरा कर देते हैं और शायद केवल इतना भर चाहते हैं कि वह केवल प्रखर विरोध करते हुए दिखें। यानी दिखावे का कड़ा विरोध, इसके बदले वह सरकार से पिछले दरवाजे से अपने काम निकालने के रास्ते बनाते हैं। देश-प्रदेश में विरोध की ऐसी ही परिस्थितियां नजर आ रही हैं। खासकर उत्तराखंड की ‘मित्र विपक्ष’ कही जाने वाली प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस के नेताओं से जब इस बारे में पूछा जाये तो वह जनता पर ही मासूमियत से ठीकरा यह कहकर फोड़ते दिखते हैं कि जनता अपनी समस्याओं में ही इतनी घिरी पड़ी है कि महंगाई-बेरोजगारी जैसे मुद्दों पर भी उनके साथ आंदोलन में बैठने के लिये आगे नहीं आती, तो वे किसे लेकर आंदोलन करें। लेकिन उनकी कलई तब खुल जाती है, और यह उनकी ही नाकाबिलियत है कि राज्य में तीसरे विकल्प की तलाश की जा रही है और राज्य के कुछ युवा तीसरा विकल्प बनाते भी दिखते हैं, और उन्हें अच्छा जनसमर्थन भी मिलता दिखता है। वह आगे बढ़ें, अपने लक्ष्य को पूरा करें। उनके विरोध को कोई हाइजैक कर सत्ता से न मिल जाए, बस इसकी दुआ करनी होगी।

































