हिमांशु जोशी
यह किताब यात्रा और शोध की बुनियाद पर खड़ी एक जीवंत कृति साबित हुई है।
‘उत्तराखण्ड का पर्वतीय समाज और बदलता आर्थिक परिदृश्य’ पुस्तक के सह-लेखक अरुण कुकसाल एक अनुभवी यायावर हैं और उनके साथ शोधकर्ता चन्द्रशेखर तिवारी हैं। इन दोनों की यात्रा के अनुभव और गहन शोध का संयोजन इस पुस्तक को विशिष्ट बनाता है।
लेखक दल ने तीन दशक पूर्व उत्तराखंड के ग्रामीण अंचलों में की गई अपनी यात्रा को दोहराने का प्रयास किया, जिससे अनेक चौंका देने वाले तथ्य उजागर हुए। पहले के समय में टूटी-फूटी सड़कें, वन्यजीवों द्वारा फसलों को नुकसान, शैक्षणिक संस्थानों की दयनीय हालत और जलसंकट जैसे कारणों से ग्रामीण पलायन करते थे। वर्तमान में यद्यपि सड़कों की स्थिति में सुधार हुआ है, किंतु अन्य समस्याएं गंभीर रूप धारण कर चुकी हैं, और बेहतर परिवहन सुविधाएं पलायन को और सरल बना रही हैं।
इस पुस्तक के लेखकों की दृष्टि किसी विदेशी अन्वेषक के समान प्रखर है। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र द्वारा प्रकाशित इस कृति को पढ़ते हुए कई बार ऐसा प्रतीत होता है मानो उत्तराखंड के दुर्गम गाँवों की कहानी किसी वैश्विक यात्रा वृत्तांत का अंश हो। लेखकों ने इन क्षेत्रों की यथार्थपरक स्थितियों को इस प्रकार उकेरा है, जो पूर्व में असंभव प्रतीत होता था। पुस्तक में स्थानों का विवरण इतना जीवंत है कि पाठक स्वयं को उस भूगोल में खड़ा पाता है, वहीं पशुधन और मानव आबादी के सटीक आँकड़े आश्चर्यचकित करते हैं।
*पहाड़ का प्रतिबिम्ब: आवरण चित्र*
पुस्तक का मुखपृष्ठ पर्वतीय जीवन की चुनौतियों को चित्रित करता है। पश्चात के आवरण पर लेखकों का संक्षिप्त परिचय उपलब्ध है, जो वर्तमान प्रकाशन प्रथाओं के अनुरूप है और पाठकों के लिए उपयोगी भी। बीके जोशी द्वारा रचित ‘आमुख’ और लेखकों के ‘कहो! कैसे हो पहाड़’ अध्याय पठनीयता को बढ़ाते हैं, साथ ही पर्वतीय संघर्षों को समझने की अनिवार्यता रेखांकित करते हैं। ‘अनुक्रम’ से ज्ञात होता है कि पुस्तक 1986 और 2016 के दो कालखंडों पर केंद्रित है।
*रेखाचित्रों की मौन भाषा*
डॉ नन्द किशोर हटवाल और निधि तिवारी द्वारा बनाए गए रेखाचित्र पुस्तक की सौंदर्यात्मक गहराई बढ़ाते हैं। 1986 और 2016 के अध्यायों के प्रारंभ में प्रयुक्त ये चित्र दोनों कालों के पर्वतीय जीवन के अंतर को स्पष्ट करते हैं। प्रत्येक शीर्षक के साथ लघु रेखांकन पुस्तक के प्रति आकर्षण जगाते हैं।
*समय के साथ बदलाव की पड़ताल*
प्रारंभिक अध्यायों में लेखक देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में तीन दशकों में आए परिवर्तनों का विश्लेषण करते हैं। उदाहरणार्थ, ‘पहले ब्लॉक ऑफिस तक पहुँचने में खेतों से गुजरना पड़ता था, अब वहाँ चमकदार दुकानें हैं’ जैसी पंक्तियाँ परिवर्तन की गति को दर्शाती हैं। गाँवों की भौगोलिक स्थिति, जैसे समुद्रतल से ऊँचाई और आसपास के परिवेश का वर्णन, पाठकों को यात्रा का अनुभव कराता है।
*आँकड़ों के माध्यम से समस्याओं का विवेचन*
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुपालन के ह्रास को आँकड़ों सहित प्रस्तुत किया गया है, जैसे—’पूर्व में प्रत्येक परिवार के पास औसतन एक जोड़ी बैल थी, जबकि वर्तमान में 50 परिवारों में से मात्र 10 के पास यह साधन शेष है’। योजनाओं के क्रियान्वयन में ग्रामीणों की भागीदारी के अभाव को हैंडपंप और निष्क्रिय जल संरचनाओं जैसे उदाहरणों से समझाया गया है। स्वास्थ्य सेवाओं की दयनीयता पर एक ग्रामीण का कथन ‘यहाँ मौत आसान है, बीमारी नहीं’, मन को झकझोर देता है।
*समाधान की ओर संकेत*
लेखकों ने केवल समस्याएँ ही नहीं, उनके संभावित निवारण भी सुझाए हैं। महिपाल सिंह जैसे प्रगतिशील किसानों की सफलता तकनीकी समावेशन की आवश्यकता को रेखांकित करती है। शिक्षा प्रणाली पर टिप्पणी ‘वर्तमान शिक्षा ग्रामीण परिवेश के अनुकूल नहीं, जिससे रोजगार के लिए पलायन अनिवार्य हो गया है’, व्यवस्था में सुधार की गुंजाइश दिखाती है।
*एक गहन ग्राउंड रिपोर्ट की छाप*
‘मानिला का डांडा’ जैसे प्रकरणों में शराब जैसी सामाजिक बुराई और प्रशासनिक उदासीनता का खुलासा किया गया है। वर्षा और बाघ के साथ सामना जैसी घटनाओं ने लेखकों की यात्रा को रोमांचक बनाया है। हालाँकि कुछ अंश दोहराव प्रतीत होते हैं, परंतु पुस्तक उत्तराखंड के पलायन के कारणों की पड़ताल में सफल रही है।
*आवरण के पीछे का सार*
पुस्तक के अंत में अध्ययन किए गए गाँवों का विवरण और लेखकों के सहयोगियों की टिप्पणियाँ संग्रहित हैं। नवीन जोशी, प्रदीप टम्टा, देवेंद्र मेवाड़ी और गीता गैरोला जैसे व्यक्तित्वों के विचार पुस्तक के महत्व को प्रतिबिंबित करते हैं। अरुण कुकसाल को उनकी पूर्व पुस्तक ‘चलें साथ पहाड़’ हेतु ‘राहुल सांकृत्यायन पर्यटन पुरस्कार’ प्राप्त हो चुका है। वर्तमान कृति से भी पर्वतीय समस्याओं के समाधान की अपेक्षाएँ जुड़ी हैं।

































