बसन्त पाण्डे
राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था में जीडीपी का सर्वाधिक प्रतिशत कमाने वाली कृषि को लेकर जहां एक तरफ देशभर में राजनीति चरम पर है वहीं दूसरी तरफ छोटी-छोटी जोतों के मालिक करोंडो किसान किस प्रकार सरकारी नीतियों के चलते हांशिये पर धकेल दिये गये है इसकी एक बानगी उत्तराखण्ड के सबसे बड़े गावं बिन्दुखत्ता के किसान है। भारत सरकार के नियमों के अनुसार केवल खाता-खतौनीधारी किसानों की उपज की ही सरकारी खरीद के नियम के चलते देश भर के छोटी जोत के कई खत्तावासी किसान अपनी उपज निजी हाथों में औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर है। नैनीताल जिले के पचपन हजार बिन्दुखत्तावासी धान, सोयाबीन गेहूं व अन्य कृषि उत्पादनों की सरकारी खरीद योजना के लाभ से वंचित है । इसकी आड़ में मिनी फाइनैंस व बनिया यहां के किसानों को लूट रहा है। उनकी किस्मत पूरी तरह बिचैलियों के ऊपर ही निर्भर है।
यहां सभी छोटी जोत के किसान हैं जिनके ऊपर नंगा क्या नहायेगा और क्या निचोड़ेगा वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। क्षेत्र में खरीफ की प्रमुख फसल धान की प्रति कुंतल लागत 2000 रुपये आती है परंतु बिचैलिया सिर्फ 1200 से 1300 के बीच खरीद रहे हैं। जबकि किसान के सिर पर बीज, खाद, जुताई आदि के निमित्त बाजार से लिये गये ऋण की अदायगी भी शेष है। इससे वह हर साल कर्ज में लगातार डूबता जा रहा है। उसके लिए खेती की लागत पूरी करना बहुत ही कठिन होता जा रहा है।
बिन्दुखत्ता में मिनी फाइनैंस के नाम पर बहुत सारे बड़े इजारेदार (पॅूजीपति)व साहूकार आ गये हैं जो अनाप-शनाप चक्रवृद्धि ब्याज पर कर्ज से यहां के गरीब किसानों को लूट रहे हैं। लिये गये ऋण की समय पर अदायगी नहीं कर पाने वाले गरीब किसान की जमीन को हड़प रहे हैं। विडंबना यह भी है कि यहां किसान के पास कोई ऐसा मंच भी नहीं है जहां वह अपनी व्यथा कह सके या उसे मदद मिल सके। क्षेत्र के प्रमुख राजनीतिक दल और जन प्रतिनिधि भी किसानों की मांग पर मुंह बंद किये हैं। यह वही गांव है जहां पंडित नारायण दत्त तिवारी की सरकार के समय विद्युतीकरण, पक्की सड़कें, राजकीय इंटर कालेज, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र, राजकीय आइटीआइ, सरकारी सस्ता गल्ला, पशु चिकित्सालय, बैक व डाकघर खुलवाये गये थे। यही नहीं यहां पर रबी व खरीफ की फसलों की सरकारी समर्थन मूल्य पर खरीद के लिए सरकारी कांटे भी लगाये जाते थे।
स्थानीय खत्तावसी पूर्व सैनिक किसान शंकर सिंह चुफाल का कहना है रबी हो या खरीफ की फसल दोनों फसलों को हमें बिचैलिये के हाथों औने-पौने दामों में बेचना पड़ रहा है। वर्तमान में धान की खरीद के लिए निजी बिचैलियांे द्वारा तय कीमत 1200 रूपये प्रति कुन्तल है जोकि सरकारी मानक से प्रति कुन्तल 600 रूपये कम है। यदि हम यहां से कहीं भी बेचने जाते है तो हमारा धान नहीं खरीदा जाता है। केवल राइस मिल के व्यापारी ही खरीद रहे है।
जीत सिंह ठकुन्ना ने बताया की उनकी लागत भी नहीं निकल पा रही है। जिससे खेती के प्रति उनकी उदासीनता बढने के चलते वे जमीन बेचने पर मजबूर है। किसान गोपाल सिंह कन्याल के अनुसार अब खेती नाममात्र की रह गयी है, जो अनाज उगाते है उनकी लागत भी नही निकल रही है। प्रताप सिंह बिष्ट ने कहा कि यदि सरकारी क्रय केन्द्र नहीं खोलती है तो वह इन बिचैलियों पर लगाम कसे ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य गरीब किसानों मिल सकें। दलित वर्ग से आने वाले किसान शंकर राम ने कहा कि बिचैलिये की वजह से अनाज का दाम नहीं मिल पा रहा है और लागत को पूरा करने के लिए ऋण लेना पड़ता है, इस ऋण के लिए सरकारी बैंक मना कर देती है शो मजबूरी बस निजी फाइनैंर्सर से उचित ब्याज दर पर ऋण लेने के लिए हम मजबूर है।
इस विषय में क्षेत्रीय विधायक नवीन दुम्का ने दूरभाष पर कहा कि भूमि के दस्तावेज न होने के चलते उक्त क्षेत्र में सरकारी खरीद नहीं हो सकती है। गत वर्ष रबी की प्रमुख फसल गेहूं के समय कांटे लगाये गये थे परंतु कोई भी किसान गेहूं लेकर कांटे पर नहीं आया। वहीं संभागीय आयुक्त कुमाऊॅ मण्डल ललित मोहन रयाल ने कहा कि भारत सरकार ने 4-5 वर्ष पूर्व सरकारी खरीद के लिए खाता-खतौनी अनिवार्य कर दी जिसके कारण बिन्दुखत्ता में अब सरकारी कांटे नहीं लग रहे हैं।
इस प्रकार बिन्दुखत्ता के किसानों के सम्मुख बहुत बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है। यदि केन्द्र व राज्य सरकारों ने यहां की भूमि व उनकी फसल खरीद के उचित प्रबंध नहीं किये तो इससे यहां के किसानों को गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा।
फ़ोटो : फाइनांशियल एक्सप्रेस से साभार