पुष्प रंजन
27 महीने के आपातकाल में निश्चित रूप से लोकतंत्र का गला घोंटा गया था। सत्ता विरोधी लोगों पर सितम ढाये गये थे. 1975 से 1977 के काले कालखंड के विरुद्ध ढोल पीटिये जमकर। नई पीढ़ी को याद दिलाइये, कि देखो वो कितने बेहिस, और बर्बर थे. लोकतंत्र को रौंद देने वाले। लेकिन, क्या मोदी राज इमरजेंसी से कम है ? सीएए-एनआरसी विरोध प्रदर्शनों से लेकर कुख्यात भीमा कोरेगांव गिरफ्तारियों तक, दीदे फाड़कर देख लीजिये।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में सैकड़ों ‘राजनीतिक कैदी’ सलाखों के पीछे हैं। मुकदमे अभी भी लंबित हैं। कुछ पता नहीं, कब छूटेंगे ? गुजरात दंगों में मोदी की भूमिका होने का आरोप लगा चुके पूर्व आईपीएस संजीव भट्ट फिलहाल कोर्ट से बाहर नहीं आ पाएंगे, क्योंकि वे 1990 के एक और मामले में जेल में उम्र-कैद की सजा काट रहे हैं। बिहार चुनाव सिर पर है, तो ‘इमरजेंसी में लोकतंत्र की हत्या’ वाली ढोल जोरों की बज रही है। जेपी को याद किया जा रहा है, जिनके फर्जी समाजवादी चेले आज सत्ता का सुख भोग रहे हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2022 के अंतिम डेटा से पता चलता है कि विचाराधीन कैदियों की संख्या 4,34,302 या कुल कैदियों का 75.8 प्रतिशत है। 2016 से 2020 के बीच 24,134 व्यक्तियों पर अकेले गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत आरोप लगाए गए हैं, जिनमें से केवल 386 को कथित तौर पर बरी किया गया है। वरवरा राव, नताशा नरवाल, देवांगना कलिता जैसे जो लोग जेल से छूटे, वो भय में जी रहे हैं। उन पर पहरा है। वे एकदम खामोश हैं।
यहाँ मोदी शासन के कुछ हाई-प्रोफाइल राजनीतिक कैदियों को जान लीजिये। उमर खालिद से खुर्रम परवेज तक, असंख्य नाम, जिनकी यातनाओं से देश को मतलब नहीं। गोदी मीडिया के दलाल ‘इमरजेंसी के 50 साल’ की ढोल बजा रहे हैं। कभी पूछते हो तानाशाह सरकार से कि कब तक इन्हें जेल में सड़ाओगे ?
1- उमर खालिद:
जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को फरवरी 2020 में हुए दिल्ली दंगों से पहले अपने भाषणों के माध्यम से लोगों को भड़काने के आरोप में सितंबर 2020 में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन्हें बिना जमानत के हिरासत में रखा गया है। उनके समर्थकों का दावा है कि उनके खिलाफ आरोप राजनीति से प्रेरित हैं और सिस्टम से असहमति को दबाने के उद्देश्य से हैं। वह दिल्ली की तिहाड़ जेल में कैद है।
2- सुरेंद्र गाडलिंग:
नागपुर के वकील और दलित अधिकार कार्यकर्ता सुरेंद्र गाडलिंग को जून 2018 में भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया था। उन्हें साजिश और देशद्रोह सहित कई आरोपों के तहत बिना किसी सुनवाई के वर्षों से हिरासत में रखा गया है। वह नवी मुंबई की तलोजा सेंट्रल जेल में कैद है।
3- रोना विल्सन:
राजनीतिक कैदियों की रिहाई के लिए समिति के एक कार्यकर्ता और जनसंपर्क सचिव रोना विल्सन को जून 2018 में भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। उन पर भाषणों के माध्यम से जाति आधारित हिंसा भड़काने और माओवादियों से संबंध रखने का आरोप लगाया गया है। वह नवी मुंबई की तलोजा सेंट्रल जेल में कैद है।
4- ज्योति जगताप:
दलित और आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता और कबीर कला मंच सांस्कृतिक समूह की सदस्य ज्योति जगताप को सितंबर 2020 में भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आईपीसी और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत आरोप लगाए गए हैं। वह मुंबई की बायकुला महिला जेल में कैद हैं।
5- हनी बाबू:
दिल्ली विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान के प्रोफेसर हनी बाबू को जुलाई 2020 में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किया गया था। उन्हें माओवादी संगठनों से संबंध रखने, और जाति आधारित हिंसा भड़काने के आरोपों तहत हिरासत में लिया गया था। वह नवी मुंबई की तलोजा सेंट्रल जेल में कैद हैं।
6- सागर गोरखे:
गायक, दलित अधिकार कार्यकर्ता, और कबीर कला मंच सांस्कृतिक समूह के सदस्य सागर गोरखे को भीमा कोरेगांव मामले में सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। माओवादी कार्यकर्ताओं के साथ उन्हें आईपीसी और यूएपीए की विभिन्न धाराओं के तहत हिरासत में लिया गया है। वह नवी मुंबई के तलोजा सेंट्रल जेल में कैद है।
7- महेश राउत:
भूमि अधिकार कार्यकर्ता और प्रधानमंत्री के पूर्व ग्रामीण विकास फेलो महेश राउत को भीमा कोरेगांव मामले के सिलसिले में जून 2018 में गिरफ्तार किया गया था। माओवादी संगठनों से कथित संबंध और जाति आधारित हिंसा भड़काने के लिए उन पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए गए हैं। राउत के समर्थकों ने आरोप लगाया है कि नवी मुंबई के तलोजा सेंट्रल जेल में उन्हें उचित चिकित्सा सहायता नहीं दी गई है।
8- रमेश गाइचोर:
दलित अधिकार कार्यकर्ता और कबीर कला मंच सांस्कृतिक समूह के एक अन्य सदस्य रमेश गाइचोर को भीमा कोरेगांव के सिलसिले में सितंबर 2020 में गिरफ्तार किया गया था। बिना किसी मुकदमे के लंबे समय से कारावास का सामना करना पड़ रहा है। वह नवी मुंबई के तलोजा सेंट्रल जेल में कैद है।
9- आसिफ सुल्तान:
कश्मीरी पत्रकार और ‘कश्मीर नैरेटर’ पत्रिका के पूर्व संपादक आसिफ सुल्तान को अगस्त 2018 में ‘राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़ने’ जैसे आरोपों के तहत गिरफ्तार किया गया था। उनकी हिरासत ने क्षेत्र में प्रेस की स्वतंत्रता के बारे में व्यापक चिंताएँ पैदा कीं।
10- खुर्रम परवेज:
48 साल के खुर्रम परवेज एक कश्मीरी मानवाधिकार कार्यकर्ता और ‘एशियन फेडरेशन अगेंस्ट इनवॉलंटरी डिसअपीयरेंस’ के अध्यक्ष हैं। खुर्रम परवेज ‘जम्मू कश्मीर सिविल सोसायटी गठबंधन’ (जेकेसीसीएस) के कार्यक्रम समन्वयक भी रहे हैं। खुर्रम परवेज को नवंबर 2021 में यूएपीए के तहत राष्ट्रीय जांच एजेंसी द्वारा गिरफ्तार किया गया था। उन पर टेरर फंडिंग करने और राज्य के खिलाफ साजिश रचने का आरोप है। मानवाधिकार संगठनों ने राजनीति से प्रेरित बताकर उन आरोपों की व्यापक रूप से आलोचना की है। खुर्रम परवेज दिल्ली की रोहिणी जेल में कैद है।
11- संजीव भट्ट:
गुजरात कैडर के पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट वर्तमान में राजकोट सेंट्रल जेल में बंद हैं, जहाँ उन्हें जामनगर में 1990 में हिरासत में हुई मौत के मामले में आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई है। उन्हें 1996 के एक मामले में भी 20 साल की सजा सुनाई गई है, जिसमें उन पर आरोप है कि उन्होंने पालनपुर में राजस्थान के एक वकील को नारकोटिक्स ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस अधिनियम के तहत झूठा मामला बनाने के लिए नशीले पदार्थ देकर फँसाया था। पूर्व आईपीएस अधिकारी संजीव भट्ट का सबसे बड़ा गुनाह यह है कि उन्होंने 2002 के गुजरात दंगों में तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी की भूमिका पर ऊँगली उठाई थी।

































