अशोक पांडे
बरसातों में घूमना, पहाड़ों की लम्बी यात्राओं पर निकल पड़ना अच्छा लगता था. विकास को पता लगा तो उसने सारे पहाड़ों में सड़कों को इतना चौड़ा करने की ठानी कि बरसातों के दौरान सफ़र शुरू करने से पहले आदमी को दस बार सोचना पड़े – क्या पता कहाँ से पहाड़ टूट कर सड़क पर आ गिरे, मुंडी पर पत्थर टकरा जाए. गेम ओवर! अब बरसातें आतीं हैं तो घर में घुसा रहता हूँ. घिग्घी बंधी रहती है.
इलाके में बहुत सारे पुराने मंदिर हैं. ज़्यादातर हज़ार साल से पुराने हैं. उन्हें देखने जाना अच्छा लगता था. पत्थरों पर की गई बारीक कारीगरी और चमत्कारी वास्तुशिल्प को देखना हैरानी और कौतुहल से भरता था. विकास को पता लग गया. उसने टाइलों, लाउडस्पीकरों, प्लास्टिक की मालाओं और चमचम की मदद से एक-एक कर तमाम मंदिरों की गत बिगाड़नी शुरू कर दी. अब जाओ तो लगता है पिंडारियों वाला समय बेहतर रहा होगा.
आधी जवानी ऊंचाइयों में घूमते भटकते बिताई. जंगलों को घर माना, हिमालय को अपना पुरखा जाना, नदियों में माँ का चेहरा देखा. विकास को ख़बर हो गई. अब यह है कि साल में आठ महीने हिमालय काला पड़ा रहता है. वैज्ञानिक बताते हैं हमने पर्यावरण का कचूमर निकाल दिया है, मौसम का चक्र बिगड़ गया है. नदियाँ रास्ते बदल रही हैं, ग्लेशियर पिघल रहे हैं, बाघ आँगन में आ कर बच्चों को उठा ले जा रहा है. कभी पूरे गाँव बह जाते हैं, कभी महीनों सूखा पड़ा रहता है. आंकड़े बताते हैं बालू, पानी और खड़िया जैसी चीज़ों पर माफ़िया क़ाबिज़ है. किसी की शिकायत करोगे तो पुलिस पकड़ कर ले जाएगी.
गाँव में बीमार पड़ो तो विकास कसबे में रेफर करेगा, कसबे में पड़ो तो जिला मुख्यालय में. जिला मुख्यालय का मरीज या तो हल्द्वानी भेजा जा रहा है, या देहरादून. उससे आगे बरेली-दिल्ली. आख़िरी रेफरल सब का वहीं का होता है जिसके आगे कोई रेफरल नहीं चलता.
हल्द्वानी के जिस मोहल्ले में रहता हूँ, उसमें नब्बे फीसदी रिटायर्ड सरकारी कारिंदों के घर हैं. हर घर के बाहर सड़क है. मेरे घर के सामने जो सड़क है, उसे पिछले पंद्रह सालों से लगातार खोदा जा रहा है – अंतिम बार उसे पानी की नई लाइन के लिए उस दिन खोदा जाना शुरू हुआ था जब मेरी माँ को गए एक हफ्ता हो गया था. इस टाइमिंग के लिए मैंने विकास को शुक्रिया कहा कि कहीं पंद्रह दिन पहले खुदाई चालू हो गई होती तो आधी रात उसे एम्बुलेंस में अस्पताल कैसे ले जाता. दस महीने से सड़क वैसी ही है – गड्ढों से भरपूर. कोई कहता है अभी सड़क फिर खुदेगी सीवर लाइन पड़नी है. पूरी तरह कब ठीक होगी, कब बनेगी किसी को नहीं पता. मुझे पच्चीस बरस पुराना कच्ची मिट्टी वाला वह रास्ता याद आता है जिस पर माँ-पिताजी सुबह शाम टहलने निकलते थे.
हर जगह डीजे बज रहा है, बच्चे रील बना रहे हैं, छोकरे-छोकरियाँ गिटार लेकर उत्तराखंड को अपनी मातृभूमि-पितृभूमि बताते नहीं थक रहे.
विकास मुझसे कहता है देखो तो गाँवों तक में बेकरी और ब्यूटी पार्लर खुल गए. स्टेट में इतना टूरिस्ट आ रहा है सीज़न के दौरान हर सड़क जाम हो जाती है. टैक्सी-होटल वालों की ऐश है.
हर जगह मनहूस चेहरा बनाए रहते हो, कभी तो खुश दिखा करो! मेरा बर्थडे है. आज तो हँस लो!






























