भूपेन सिंह
नब्बे के दशक में उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान मैं पिथौरागढ़ में छात्र राजनीति में सक्रिय था. हम उस दौरान आंदोलन की केंद्रीय ताक़त बने छात्रों के मोर्चे से जुड़े थे. कर्मचारी, अभिभावक की तरह हमारे साथ थे. गढ़वाल विश्वविद्यालय के छात्र नेता एसपी सती तो कुमाऊं विश्वविद्यालय के गिरिजा पाठक इसकी मुख्य भूमिकाओं में थे. तब पहाड़ों में जहां-जहां छात्रों की रणनीतिक मीटिंंग होती थी हम वहां पहुंचते थे.
आंदोलन के दौरान कितनी बार लाठियां खाईं. कितनी ही बार पुलिस ने डिटेन किया. लेकिन ये बातें मैंने कभी सावर्जनिक तौर पर नहीं कही. पुराने साथी ज़रूर जानते हैं. जिनमें से कुछ तो आज “ब़ड़े नेता” बन गये हैं. हमारे यहां हर कोई अपने आप को एक-दूसरे से बड़ा राज्य आंदोनकारी घोषित करने लगता है. कई के पास तो सर्टिफिकेट भी हैं. ऐसे में चुप रहने में ही अपनी भलाई लगती रही है. लेकिन आज जब पहाड़ी राज्य की रजत जयंती के नाम पर एक यूफोरिया दिख रहा है तो कुछ बातें याद दिलाना ज़रूरी है.
दिल्ली में दो अक्टूबर की रैली की तैयारी के लिए हम लोग कई दिन पहले वॉलिंटियर बनकर वहां पहुंचे थे. और उस दिन जब लाल किले के पीछे मंच हथियाने को लेकर “सर्वदलीय घुसपैठ” की कोशिश हुई तब मैं भी स्टेज वॉलिंटियर के तौर पर वही पत्थर खा रहा था. गिरिजा भाई का तो माथा फट गया था. मेरे ख़्याल से यूकेडी के अलावा उस मंच पर तब किसी और नेता को आने का कोई अधिकार नहीं था.
लाल किले के पीछे लाखों की भीड़ के अनियंत्रित होने के बाद पीएसी की तरफ़ से जिस तरह हमारे ऊपर आंसू गैस के गोले दागे जा रहे थे. वो दहशत भरा माहौल था. मुजफ़्परनगर कांड की ख़बर हम तक कुछ तथ्यों और कुछ अफ़वाहों के साथ पहुंच रही थी. लोगों में गुस्सा था. आंसू गैस के गोले आंदोलनकारी वापस पुलिस के टैंट्स में फेंक रहे थे. जिससे उनके टैंट जल रहे थे. चारों तरफ़ आग-धुवां, चीख-पुकार, भागम-भाग थी. उस दिन पड़ी पुलिस की लाठियां मुझे आज तक याद है. वहां किसने हंगामा करवाया इसे जानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है.
शाम को हम कश्मीरी गेट से बसों में लदकर वापस उत्तराखंड की तरफ़ निकले. गजरौला में तब पहाड़ से आने वाले बस यात्रियों से ढाबे वाले मनमानी वसूली करते थे. वही ग़लती उस दिन भी वो दोहराने लगे तो उनके ढाबे ज़मीन में मिल गये और वे जान बचाकर भागे. टनकपुर पहुंचने पर पहाड़ों में मुजफ्फरनगर कांड के विरोध में बहत्तर घंटे का बंद शुरू हो गया था. कोई बस वाला पिथौरागढ़ की तरफ जाने का तैयार नही था. तब रोड़वेज़ डिपो से बस हथियाकर ख़ुद ही ड्राइव कर आंदोलनकरी पहाड़ों की तरफ़ निकले. लड़के छतों में भी बैठे थे. पहाड़ी रास्ते में जीने-मरने का कुछ ठिकाना नहीं था.
तब मैं छात्र संगठन आइसा में था. हम आज दो अभी दो, उत्तराखंड राज्य दो के नारे की बजाय राज्य कैसा होगा इस पर भी विचार करने के पक्षधर थे. बीजेपी और कांग्रेस धीरे-धीरे सर्वदलीय संघर्ष समिति का सगूफा छोड़कर आंदोलन में घुसपैठ कर रहे थे. पिथौरागढ़ में बीजेपी के ज़िलाध्यक्ष राम सिंह बसेड़ा रिश्ते में मेरे बूबू थे. पता नहीं वे कैसे छात्र-अभिभावक संघ के अध्यक्ष बन गये. उस मंच से दलितों के ख़िलाफ़ ज़हर उगलने का विरोध करने पर उनके सामने ही गुंड़ों ने मुझ पर हमला कर दिया था. मुझे आज भी याद है कि दिल्ली से लौटने वाले ऐसे कुछ महापुरुषों का तब वहां पर सम्मान हुआ था जो वहां रैली के बजाय जीबी रोड के चक्कर लगा रहे थे. इन पच्चीस सालों में सबकुछ उन्हीं जैसे लोगों के हाथ में तो रहा है!
हम पहाड़ी राज्य मांग रहे थे. इसका सीधा सा मतलब था कि उत्तर प्रदेश जैसे मैदानी राज्य में हमारी कोई सुनवाई नहीं होती. इसलिए हमें अलग राज्य चाहिए. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार जैसे क्षेत्रीय विकास के सवाल प्रमुख थे. लेकिन इस सवालों से खिलवाड़ करने वाले वे ही लोग थे जिन्होंने मैदानों को जोड़कर इसे उत्तरांचल बना दिया. राजधानी देहरादून बना दी. साथ ही एक अज़ीब रवायत की शुरुआत की जिसका खामियाज़ा आज तक पहाड़ी समाज झेल रहा है.
मैं आज भी मानता हूं कि उत्तराखंड को सचमुच में एक पहाड़ी राज्य ही होना चाहिए. इसे फिर से पहाड़ी राज्य बनाने की मांग होनी चाहिए. सिर्फ़ पहाड़ी. इसका मतलब ये नहीं कि राज्य सिर्फ़ पहाड़ियों का ही हो. बल्कि भूगोल के हिसाब से पहाड़ में बसे लोगों का हो. इसमें पहाड़ों की कीमत पर सत्ता और समृद्धि के टापू बन चुके देहरादून-हल्द्वानी भी न रहें, तो न सही! आंदोलनकारियों ने इस सब के लिए तो अपनी जान बिल्कुल नहीं गंवाई थी.
आज ये बात शिद्दत से महसूस कर रहा हूं कि पहाड़ी राज्य कैसा हो. पहाड़ की राजधानी कैसी हो. जब तक इस बारे में स्पष्टता नहीं होगी और गैरसैण की गद्दी पर भी उछल-कूद मचाते शातिर बंदर ही बैठेंगे तो वे किसी का भी गला रेत सकते हैं. फिर न पहाड़ी राज्य का मतलब है और न ही पहाड़ी राजधानी का. गैरसैण राजधानी की मांग करने वालों को भी ये ज़रूर सोचना चाहिए कि वे कैसी राजधानी चाहते हैं. क्या पहाड़ी शिल्प का नगर बसाने का कोई डिज़ाइन और उसे लागू करवा पाने की योजना उनके पास है. या इसे ही अनियोजित नर्क बनाकर ही ख़ुश हो जाएंगे?
फिलहाल जो लोग पहाड़ी राज्य के पच्चीस साल पूरे होने की ख़ुशी में नाच रहे हैं मैं उनमें शामिल नहीं हूं!





























