प्रतुल जोशी
कभी-कभी आप ऐसे सुखद संयोगों के स्वामी हो जाते हैं कि वह संयोग आपके जीवन की अमूल्य धरोहर बन जाते हैं। विगत 21- 22 जून को ऐसा ही कुछ मेरे साथ हुआ। नैनीताल के वरिष्ठ पत्रकार एवं ‘उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन’ के महासचिव प्रयाग पांडे जी द्वारा मुझे निमंत्रित किया गया था ‘उत्तराखंड श्रमजीवी पत्रकार यूनियन’ के समारोह में जो 21 जून को नैनीताल क्लब, नैनीताल में संपन्न हुआ। लेकिन नैनीताल पहुंचने से पूर्व ही नैनीताल के वरिष्ठ रंगकर्मी और हम लोगों के पारिवारिक मित्र ज़हूर आलम जी ने सूचित किया कि 22 जून को नैनीताल के जगदीश साह प्रेक्षागृह (सीआरएसटी इंटर कॉलेज) में नैनीताल की नाट्य संस्था ‘युगमंच’ के 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में नाटक ‘द ज़ू स्टोरी’ का मंचन होगा। मेरे लिए ऐसा संयोग अभूतपूर्व ही था। 22 जून की शाम 7 बजे मंचन प्रस्तावित था। इस मंचन से पूर्व ‘युगमंच’ के संस्थापक सदस्यों में से एक ज़हूर आलम जी ने ‘युगमंच’ संस्था की 50 वर्षों की यात्रा पर एक संक्षिप्त वक्तव्य दिया। यह एक ऐतिहासिक क्षण था क्योंकि 22 जून को 50 वर्ष पूर्व नैनीताल में जिस बीज का रोपण हुआ था, उसने इन वर्षों में एक विशालकाय वृक्ष का रूप ले लिया है। ‘युगमंच’ परिवार द्वारा इस अवसर पर वितरित पत्रक का एक अंश : “50 वर्ष की प्रतिबद्ध रंग यात्रा में युगमंच ने अनगिनत नाटक, नाट्य समारोह, लोकोत्सव, फ़िल्म फेस्टिवल आयोजित किए हैं। होली महोत्सव जैसी महत्वपूर्ण पहल के ज़रिए पहाड़ की परंपरागत होली, गायन व नर्तन की लुप्त प्रायः कुमाऊंनी विधा को युगमंच ने संजीवनी प्रदान की है।
युगमंच से नाटकों का अक्षरज्ञान लेकर दर्जनों कलाकार एनएसडी व एफटीआईआई जैसे संस्थानों के लिए चुने गए हैं। युगमंच ने भारत रंग महोत्सव, संगीत नाटक अकादमी के नाट्य महोत्सव सहित देश के तमाम राष्ट्रीय,अंतर्राष्ट्रीय नाट्य व कला महोत्सव में मंचन का गौरव प्राप्त किया है। युगमंच ने समय समय पर एनएसडी व अन्य संस्थाओं के साथ अनेक नाट्य कार्यशालाओं का अनवरत आयोजन किया है और प्रतिवर्ष बाल नाटक कार्यशाला का आयोजन भी अनवरत जारी है।”
कवि हेमंत बिष्ट के संचालन में संपन्न ‘युगमंच’ के इस आयोजन में नैनीताल शहर के अधिकांश रंगकर्मी एवं अकादमिक संसार के सदस्य मौजूद थे।
नाटक का मंचन
‘द ज़ू स्टोरी’ अमेरिकन लेखक Edward Albee द्वारा वर्ष 1958 में लिखा गया नाटक है। उस वक्त Albee की उम्र मात्र 29 वर्ष थी और इसका पहला मंचन वर्ष 1959 में बर्लिन में हुआ।
नाटक न्यूयॉर्क के सेंट्रल एवेन्यू पार्क की एक बेंच से शुरू होता है, जहां पीटर (Parag Sarmah) जो कि एक पब्लिशिंग हाउस में सीनियर एग्ज़िक्यूटिव हैं,एक दोपहर किताब पढ़ने के उद्देश्य से पार्क में आता है। पीटर दो लड़कियों का पिता है, घर में पत्नी, दो बिल्लियां और दो Parakeet(लंबी पूंछ वाला छोटा तोता)है। जब पीटर पार्क में बेंच पर settle हो रहा होता है तो वहां जैरी (सुमन वैद्य) पहुँच जाता है। जैरी, जीवन से निराश एक व्यक्ति है, वह एक मलिन बस्ती में रहता है।
लगभग सवा घंटे के इस द्विपात्री नाटक में दोनों पात्रों के मध्य लगातार संवाद चलता रहता है। जैरी बताना चाहता है कि वह Zoo क्यों गया था? लेकिन इस बात को बताने के क्रम में वह मूल बात को बताने के बजाय लगातार दूसरी बातें बताता रहता है। जैसे अपने परिवार के बारे में, उस बिल्डिंग के बारे में जहां वह रहता है, उस बिल्डिंग में रहने वाले पड़ोसियों के बारे में, अपनी ख़ूसट मकान मालकिन के बारे में, उसके कुत्ते के बारे में जो हमेशा जैरी को काटने की फ़िराक़ में रहता था और जिसे ज़हर देकर ख़त्म करने की जैरी ने कोशिश की, लेकिन कुत्ता मरा नहीं। नाटक के अंतिम 15 मिनट बेंच पर आधिपत्य को लेकर पीटर और जैरी के मध्य द्वंद्व को समर्पित थे। अंततः जैरी अपने बक्से से एक चाकू निकालता है और चाकू को( एक छोटी झड़प के बाद) पीटर को दे देता है और उस चाकू से ख़ुद को मार लेता है। लगभग सवा घंटे का यह नाटक आखिर है क्या? ‘महानगरों में व्याप्त संवादहीनता के मध्य जीवन से निराश एक व्यक्ति को अपनी व्यथा सुनाने के लिए किसी शिकार की तलाश? या पिछली शताब्दी के पांचवे दशक में लिखे गए Absurd थियेटर की एक कड़ी या जीवन और समाज के प्रश्नों को नाटक में घटना नहीं वरन संवाद के माध्यम से उद्घाटित करना। या मनुष्य द्वारा मूल बात कहने के बजाय इतर बातों में उलझ जाने की प्रवृत्ति।’ इस नाटक के कई Interpretation हो सकते हैं।लेकिन पूरी स्क्रिप्ट में मुझे एक बात खटकती रही कि लेखक ने आख़िर Jerry को एक dominant करेक्टर के तौर पर क्यों चित्रित किया और पीटर को एक बेहद weak चरित्र के तौर पर ।सवा घंटे के इस नाटक में लगभग 40 मिनट तो Jerry का monologue ही था। नाटक को देखते हुए कार्टून श्रृंखला Tom & Jerry की याद आ रही थी जहाँ नाटक में Jerry, Tom का किरदार अदा कर रहा था। अपने इस प्रश्न का जवाब मुझे इंटरनेट पर इस नाटक के बारे में पढ़ते हुए मिला। लेखक Edward Albee को भी यह बात खटकी कि उन्होंने पीटर के चरित्र के साथ न्याय नहीं किया है। एक साक्षात्कार में आपने कहा ” The Zoo Story is a good play. It’s a play that I am very happy I wrote. But it’s a play with one and a half characters. Jerry is a fully developed, three dimensional character.But Peter is a backboard. He’s not fully developed.Peter had to be more fleshed out.” अपनी इस उलझन को दूर करने के लिए, उन्होंने एक नया एकांकी लिखा Homelife.
‘His solution was to pen a new one act prequel, which he called “Homelife” that would zoom in on Peter’s seemingly comfortable domestic world on the Upper East side with his wife, Ann.Pairing these two one acts, ‘The Zoo Story’ and ‘Homelife’ made a complete full length play. That combination, then called “Peter and Jerry” (since rebranded ‘At home at the zoo). premiered at Hartford stage in 2004 before being produced off Broadway in 2007, to largely glowing reviews (Excerpts from article ‘For decades, Playwright was captivated by Zoo’. Writer Christopher Wallenberg).’
इस नाटक के निर्देशक उत्पल झा, अभिनेता सुमन वैद्य एवं पराग शर्मा तीनों ही एनएसडी के स्नातक हैं। सुमन ने रंगमंच की अपनी यात्रा ‘युगमंच’ से प्रारंभ की थी, इसलिए अपनी मातृसंस्था के 50 वर्ष पूरे होने के ऐतिहासिक क्षण के अवसर पर वह इस नाटक के साथ उपस्थित थे। दोनों ही अभिनेता मंजे हुए हैं। नाटक में सुमन वैद्य की अभिनय क्षमता अपने पूरे शबाब के साथ स्टेज पर थी। उत्पल झा नाटक के प्रदर्शन के एक दिन पूर्व गंभीर रूप से बीमार हो गए थे और उन्हें तुरंत नैनीताल से दिल्ली कार द्वारा वापस भेजा गया। उनकी अनुपस्थिति में रंगकर्मी दक्षिणा शर्मा ने लाइट एवं साउंड का दायित्व संभाला। नाटक में उत्पल झा ने बहुत सारे प्रयोग भी किए। जैसे नाटक का प्रारंभ मंच के backdrop में एक स्क्रीन पर मल्टीमीडिया से महानगर की ऊंची ऊंची इमारतों को प्रदर्शित करने का था, साथ में तेज़ आवाज़ में अंग्रेज़ी संगीत ( जिसके शब्द अधिकांश लोगों की समझ से बाहर थे)। अंग्रेज़ी संगीत के बार- बार के प्रयोग ने नाटक में प्रभाव डालने के बजाय उसे डिस्टर्ब ज़्यादा किया। इसी तरह नाटक के प्रारंभ में पार्क में कचरा साफ करने और झाड़ू लगाने के दृश्य के बिना भी काम चल सकता था।
इस नाटक को देखने के लिए युगमंच के पुराने कलाकार एवं वर्तमान में मुंबई में प्रवास कर रहे प्रख्यात अभिनेता ललित तिवारी भी नैनीताल आए थे, लेकिन एक सड़क दुर्घटना के चलते वह प्रेक्षागृह में उपस्थित नहीं हो पाए। दो दुर्घटनाएं( निर्देशक उत्पल झा की तबीयत खराब होना एवं फ़िल्म अभिनेता ललित तिवारी का एक्सीडेंट) आयोजकों के लिए बेहद मायूसी का सबब था, बावजूद इसके सब ने पूरे उत्साह से नाटक के मंचन को सफल बनाया। कुल मिलाकर युग मंच के 50 वर्ष पूर्ण होने की एक धमाकेदार शुरुआत विगत 22 जून को नैनीताल में हुई है। आयोजकों का कहना था कि अब वर्ष भर ऐसे ही आयोजन करने का उनका विचार है। युग मंच का ‘गोल्डन जुबली ईयर’ निश्चित रुप से हिंदी रंगमंच को समृद्ध करेगा। साथ ही नैनीताल में रंगमंचीय गतिविधियों को बढ़ावा देने की दिशा में यह महत्वपूर्ण कदम होगा। हमारे जैसे तमाम रंगप्रेमियों को ‘युगमंच’ के आगामी आयोजनों की प्रतीक्षा रहेगी।





























