मुकेश नौटियाल
हिंदी कथा साहित्य के महान शिल्पी और हमारे समय को कहानियों में प्रामाणिकता से दर्ज करने वाले कथाकार सुभाष पंत का जाना एक युग का अवसान जैसा है। वृद्धावस्था के चलते शारीरिक रूप से वे कुछ शिथिल जरूर हो गए थे, लेकिन बौद्धिक स्तर पर पूरी तरह चैतन्य थे। हाल में ही उन्हें ‘उत्तराखंड साहित्य गौरव’ सम्मान मिला था और तब मेरी उनसे दो लंबी मुलाकातें हुई थीं। इसी महीने उन्होंने किसी दिन मुझे समय देने का भरोसा दिया था, ताकि मैं उनका एक लंबा इंटरव्यू कर सकूं। लेकिन ऐसा होता, इससे पहले ही वे चले गए।
सुभाष पंत की कहानियों में आम भारतीय के संघर्षों का यथार्थपूर्ण उद्घाटन होता है। वे हमेशा आम जन के साथ खड़े रहे और उन्हीं की बात करते रहे। उनकी कहानियां उस दिन तक प्रासंगिक रहेंगी, जब तक इस धरती पर मेहनतकश समाज का अस्तित्व शेष रहेगा।
सुभाष पंत का 86 वर्ष का सुदीर्घ जीवन अनेक तूफानों से घिरा रहा। युवावस्था में वे गंभीर बीमारी की चपेट में आकर सेनेटोरियम में भर्ती रहे। समय-समय पर शरीर उनकी ऊर्जा और चेतना को ललकारता रहा, लेकिन पंत जी हमेशा विजयी होकर निकले। दर्जन भर कथा संग्रह और “पहाड़ चोर” जैसे कालजयी उपन्यास रच कर उन्होंने भावी पीढ़ियों के लिए मनुष्यता और उसके डट कर लड़ने की क्षमता का अद्भुत खाका खींचा है। इस नज़रिए से वे अर्नेस्ट हेमिंग्वे के क़रीब नज़र आते हैं।
साल 1972 में “सारिका” में उनकी पहली कहानी “गाय का दूध” छपी थी। उसके बाद वे निरंतर सृजनरत रहे। विज्ञान के विद्यार्थी होने के कारण वे तार्किक प्रवृत्ति से लबरेज थे। यह बात उनकी कहानियों को पढ़ते हुए समझ में आती है। मनुष्य की तमाम समस्याओं के लिए वे समाज, सत्ता प्रतिष्ठान और भौंडी परंपराओं को जिम्मेदार ठहराते हैं। उनकी कहानियों के नायक और नायिकाएं समाज के उस वर्ग से आते हैं, जो अमूमन हाशिए पर रहने को अभिशप्त रहा है। पंत जी की कहानियों की सजीवता और जीवंतता का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि वे मनुष्य की परिस्थितियों से मुठभेड़ की जिन कहानियों को बुनते हैं, उन कहानियों के घटनाक्रम को उन्होंने स्वयं भी भोगा था। स्वर्गीय साहित्यकार विद्यासागर नौटियाल की स्मृति में दिए जाने वाले पहले सम्मान से जब उनको नवाजा गया, तब उन्होंने कहा था कि लेखक होना किसी भी समाज में सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। एक लेखक ही है, जिस पर पक्ष से लेकर प्रतिपक्ष तक भरोसा करता है। यह अलग बात है कि जिसको लेखक अपने पक्ष में नजर आता है, वह उसकी तारीफ करता है और जिस पक्ष को लेखक अपने विरोध में दिखता है वह उसकी आलोचना करना शुरू कर देता है। लेकिन लेखक का कर्तव्य है कि वह तमाम प्रलोभनों और दुश्चिंतताओं से बचते हुए ईमानदारी से अपनी बात कहे।
सुभाष पंत जी से मेरा संबंध पुराना है। वह बेहद सरल और सहज प्रवृत्ति की इंसान थे। उनको न लुभाया जा सकता था और न ही भरमाया जा सकता था। अपनी समझ के हिसाब से वे अपना पक्ष स्वयं निर्धारित करते थे। दो सप्ताह पहले, अप्रैल माह के अंत में अपनी कुल जीवन-यात्रा पर एक साक्षात्कार आयोजित करने के मेरे निवेदन को स्वीकार करते हुए प्रश्नावली मांगी थी। मैं उनके लिए प्रश्न बना ही रहा था कि 7 अप्रेल की सुबह एक प्रश्नवाचक चिन्ह छोड़ कर वे स्वयं चुपचाप इस जगत से कूच कर गए।

































