नवीन बेगाना
कुमाऊँ की बैठ होली केवल एक लोकगीत परंपरा नहीं, बल्कि यह भारतीय शास्त्रीय संगीत की समृद्ध विरासत का जीवंत उदाहरण है। इसमें राग, ताल, लय और भाव, इन चारों का अत्यंत सुंदर संगम देखने को मिलता है।
रागात्मक आधार
बैठ होली का मुख्य आधार हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत है। होली गायन में विशेष रूप से निम्न रागों का प्रयोग होता है-
राग काफी, खमाज, पीलू, भीम पलासी, देश, जोगिया, विहाग तथा अन्य।
बैठ होली का मुख्य आधार हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत है। होली गायन में विशेष रूप से निम्न रागों का प्रयोग होता है-
राग काफी, खमाज, पीलू, भीम पलासी, देश, जोगिया, विहाग तथा अन्य।
इन रागों का चयन ऋतु (वसंत), समय और भाव के अनुसार किया जाता है। विशेष रूप से काफी और खमाज थाट आधारित रागों का प्रयोग अधिक होता है, क्योंकि इनमें श्रृंगार, भक्ति और उल्लास का सुंदर मिश्रण मिलता है। बैठ होली में तालों की विविधता इसे और भी समृद्ध बनाती है। चाँचर, तीन ताल, सितरखानी, केहरुवा ताल का प्रयोग गीत की भावनात्मक तीव्रता और लयात्मक सौंदर्य को बढ़ाने के लिए किया जाता है। मंद से मध्यम लय में गाया गया होली गायन श्रोताओं को आनन्दमग्न कर देता है।
बैठ होली की गायन शैली में स्पष्ट रूप से निम्न प्रभाव दिखाई देते हैं- ध्रुपद शैली, खयाल अंग, ठुमरी और टप्पा का सौम्य प्रभाव दिखायी देता है। इस शैली में आलाप बोल-आलाप, मींड़, गमक का अत्यंत सुंदर प्रयोग होता है। गायन में भाव प्रधान प्रस्तुति होती है, न कि केवल तानों का प्रदर्शन।
बैठ होली में पारंपरिक और शास्त्रीय दोनों प्रकार के वाद्य यंत्र प्रयोग किए जाते हैं-
बैठ होली में पारंपरिक और शास्त्रीय दोनों प्रकार के वाद्य यंत्र प्रयोग किए जाते हैं-
हारमोनियम, तबला ताल संगति के लिए, मंजीरा और लोटा लय सौंदर्य के लिए। वाद्यों का प्रयोग अत्यंत मर्यादित और सौम्य होता है, जिससे मुख्य फोकस गायन पर बना रहता है।
पद एवं भाव पक्ष कृष्ण-राधा, ब्रज होली, भक्ति एवं श्रृंगार रस ,दार्शनिक भाव पर आधारित होते हैं। भाषा में मुख्यतः ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली और स्थानीय कुमाउँनी शब्दों का सुंदर समन्वय मिलता है। बैठ होली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि यह एक साधना रूप भी है। गायन के समय वातावरण में भक्ति, प्रेम, माधुर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत अनुभव होता है।
पद एवं भाव पक्ष कृष्ण-राधा, ब्रज होली, भक्ति एवं श्रृंगार रस ,दार्शनिक भाव पर आधारित होते हैं। भाषा में मुख्यतः ब्रजभाषा, अवधी, खड़ी बोली और स्थानीय कुमाउँनी शब्दों का सुंदर समन्वय मिलता है। बैठ होली केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि यह एक साधना रूप भी है। गायन के समय वातावरण में भक्ति, प्रेम, माधुर्य और आध्यात्मिक शांति का अद्भुत अनुभव होता है।
कुमाऊँ की क्लासिकल बैठ होली का संगीत पक्ष शास्त्रीय अनुशासन, लोक आत्मा, भक्ति रस, अद्वितीय सांगीतिक परंपरा का समन्वय है। यह परम्परा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक अनमोल रत्न है, जिसे सहेजना और आगे बढ़ाना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है।
फोटो इंटरनेट से साभार

































