योगेश धस्माना
जाने माने पुरातत्व विज्ञानी, इतिहासकार और कला शिल्पी सतीश चंद्र काला का जन्म 1916 में ग्राम सुमाड़ी, जनपद पौड़ी गढ़वाल में पिता डॉ. भोलादत्त काला के घर पर हुआ था। उत्तराखंड के सर्वाधिक शिक्षित और जागृत गाँवों में एक, सुमाड़ी के मूल निवासी भोलादत्त काला गढ़वाल के पहले सिविल सर्जन भी थे। प्रारंभिक शिक्षा श्रीनगर (गढ़वाल) में प्राप्त करने के बाद उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पुरातत्व में पीजी परीक्षा उत्तीर्ण की और उसके बाद कलकत्ता विश्वविद्यालय से डी. फिल. की डिग्री हासिल की। इस योग्यता को हासिल करने वाले वे आज तक भी पहले उत्तराखंडी हैं।
प्रो सतीश चंद्र काला 1943 से 1957 तक इलाहाबाद म्यूजियम के संस्थापक और इसके क्यूरेटर रहे। 1958 से 1978 तक इसके प्रथम निदेशक भी रहे। एक शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने अनेक पुस्तकों की रचना की। इनमें प्रमुख रूप से ‘टेरेकोटा फाइग्रेंस ऑफ कौशाम्बी’, ‘भारतीय मूर्ति शिल्प’, ‘इंडियन मिनिएचर्श इन द इलाहाबाद म्यूजियम’ और ‘भरहुत वेदिका’ उल्लेखनीय रही हैं। टेरेकोटा पर किये गये उनके शोध की चर्चा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुई।
सतीशचंद्र काला को उत्तरप्रदेश सरकार ने 1956 में संग्रहालयों के अध्ययन और उनके विस्तार के लिए छात्रवृत्ति प्रदान की थी। 1969 में भारत सरकार द्वारा जापान और अमेरिका के म्यूजियमों के अध्ययन के लिए उन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका की प्रतिष्ठित फैलोशिप दी गयी थी। उनके स्वदेश लौट आने पर प्रो. काला को मूर्तिकलाओं के सर्वेक्षण के लिए 1973 में जवाहरलाल नेहरू फैलोशिप प्रदान की गई। इसके बाद 1983 में उन्हें मूर्तिकला में पक्षियों का अध्ययन के लिए भारतीय इतिहास और अनुसंधान परिषद की सीनियर फैलोशिप मिली।
वे कला-संस्कृति से संबंधित अनेक राष्ट्रीय ओर राज्य स्तरीय सलाहकार समितियों के सदस्य रहे थे। ब्रिटेन और आयरलैंड की प्रतिष्ठित रॉयल सोसायटी के फैलो रह कर उन्होंने भारत की एक विशिष्ट पहचान बनाई थी।
वे प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के बहुत निकट रहे थे। आनंद भवन की कला दीर्घाओं को उन्हीं के निर्देशन में सजाया गया था। देश के सभी म्यूजियमों को विश्वस्तरीय बनाने में उनका योगदान था। इसी के चलते उन्हें 16 मार्च 1985 को भारत सरकार ने पùश्री पुरस्कार से सम्मानित किया। हैरानी की बात यह है कि गढ़वाल के इस सपूत को गढ़वाल विश्वविद्यालय ने कभी सम्मान नहीं दिया।
प्रो. काला प्रति वर्ष गर्मियों में अपने घर पौड़ी आते रहते थे। उन्होंने 1985 में जिलाधिकारी और शिक्षा अधिकारियों से नगर में एक संगीत विद्यालय खोलने का सुझाव भी दिया था। उनके परिवार में उनके पुत्र डॉ अविनाश काला, पुत्री जयंतिका काला, मालविका काला ओर छोटे पुत्र संजय हैं। भोला दत्त काला जी के दूसरे पुत्र गिरीश चंद्र काला, उमेश चंद्र, अवकाशप्राप्त अपर जिलाधिकारी प्रफुल्लचंद्र, पुत्री दिनेश नंदिनी, दुर्गेश नंदनी और विधान चंद्र काला जी का क्रम आता है। अंतर्मुखी स्वभाव के चलते आज की पीढ़ी प्रो. सतीश चन्द्र काला को भूल चुकी है, उत्तराखंड सरकार भी।
क्या हमारे गढ़वाल और कुमाऊँ के विश्वविद्यालय ऐसी अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों के नाम पर ‘पीठ’ (चेयर) स्थापित कर, उच्चस्तरीय शोध के लिए छात्रवृत्ति देकर विश्वविद्यालय के स्तर को ऊंचा उठाने की कोशिश कर सकती है ?
(इस विवरण के लिए अनिल काला ओर 2011 में सुमाड़ी से प्रकाशित स्मारिका का आभार)

































